लेखक-निर्देशक : अभिजीत देवनाथ

कलाकार : राजीव खंडेलवाल, चैल्सी प्रैस्टन क्रेफर्ड, उषा जाधव

रेटिंग : 2.5/5

बॉलीवुड अब इतनी बड़ी-बड़ी महाकाय फिल्में बनाने लगा है कि हम उन्हें हर शुक्रवार देखते और झेलते हुए बेहद छोटी ‘इंडी’ फिल्में देखने का शऊर भूलते जा रहे हैं. राजीव खंडेलवाल की ‘सॉल्ट ब्रिज’ देखते वक्त सबसे निरंतर आने वाला ख्याल यही था.

‘सॉल्ट ब्रिज’ का न तो शिल्प आज के जमाने की फिल्मों सा है. न स्टाइल, न रफ्तार, न गाने, न नाटकीयता, और न ही टिपिकल-सी नजर आने वाली उसकी प्रेम-कहानी. ‘आउटडेटिड’ कहकर इसे आसानी से खारिज किया जा सकता है क्योंकि बॉलीवुड के मैन्युफेक्चर किए ‘इवेंट युग’ में फंसा दर्शक ऐसी छोटी फिल्मों को अब देखने का आदी नहीं रहा. हॉलीवुड की तरह ही बॉलीवुड में भी बेहद कम बजट (या जीरो-बजट) में बनी कमजोर क्राफ्ट वाली इंडिपेंडेंट फिल्मों का दौर लगभग खत्म हो चुका है.

नागेश कुकनूर की ‘हैदराबाद ब्लूज’ (1998) याद कीजिए. सोचिए कि अगर आज के वक्त में फिल्में बनाने के क्राफ्ट से अंजान कोई नौकरीपेशा आदमी सिनेमा के प्रति अपने जुनून को पूरा करने के लिए कोई जीरो-बजट फिल्म बनाएगा, तो क्या उसे आज का मल्टीलेवल पार्किंग में पैसे देकर गाड़ी खड़ा करने वाला मल्टीप्लेक्स का दर्शक स्वीकारेगा?

नहीं. इसीलिए, जब 2019 के पहले शुक्रवार भू-विज्ञानी से फिल्मकार बने एनआरआई अभिजीत देवनाथ की स्वभाव से भी शांत ‘सॉल्ट ब्रिज’ चुपचाप रिलीज हुई, तो फिल्मी खबरों से पटी रहने वाली इंटरनेट की दुनिया तक में कोई हलचल नहीं हुई. न किसी को इसके आने की भनक लगी है और न ही अब जाने की लगेगी.

दुखद यह भी है ट्विटर पर लगातार सक्रिय रहने वाले फिल्म के हीरो राजीव खंडेलवाल तक ने अपनी इस फिल्म का प्रमोशन वहां नहीं किया. 2015-16 से बनकर तैयार यह इंडो-ऑस्ट्रेलियन फिल्म उनके लिए भी महत्वपूर्ण नहीं रही क्योंकि अपने आसपास यह भव्य इवेंट खड़ा करने में सफल नहीं हुई. और इस बहाने शायद उन्हें कपिल शर्मा के शो तक भी नहीं पहुंचा पाई. इंडस्ट्री से अंजान उन जुनूनी प्रतिभाओं के लिए जो किसी कश्यप की शरण में नहीं जाना चाहते और न ही किसी प्रसिद्ध संस्थान से फिल्ममेकिंग सीखे हुए हैं, उनके लिए आज का दौर बेहद जालिम वक्त है. इस बाजारू समय में उनके द्वारा बनाई शुद्ध इंडिपेंडेंट फिल्में न जाने कैसे अपना अस्तित्व बचा पाएंगी!

‘सॉल्ट ब्रिज’ की कहानी हाल ही में ऑस्ट्रेलिया पहुंचे एक प्रवासी हिंदुस्तानी (राजीव खंडेलवाल) के बारे में है. कार चलाना सीखने के दौरान उसकी एक शादीशुदा ऑस्ट्रेलियन महिला (चैल्सी प्रैस्टन क्रेफर्ड; प्रभावशाली अभिनय) से दोस्ती होती है और विदेश में बसा हिंदुस्तानी समाज उनकी इस दोस्ती के गलत मायने निकालने लगता है. तमाम दबावों के बीच नायक किसी बात की सफाई नहीं देता और इस वजह से एक अनजान मुल्क में अपने ही लोगों की कम्युनिटी से दूर कर दिया जाता है. ‘सॉल्ट ब्रिज’ इस बहाने न सिर्फ रिश्तों पर एक दिलचस्प नजरिया पेश करती है, बल्कि प्रवासियों की जिंदगी में आने वाले संघर्षों पर भी बात करती है.

निर्देशक अभिजीत देवनाथ हिंदुस्तान में पढ़े भू-विज्ञानी हैं जो कि ऑस्ट्रेलिया जाकर पहले इसी पेशे से जुड़े और फिर आईटी तथा बैंकिंग सेक्टर से. अब जब वे स्वतंत्र फिल्मकार बने हैं तो उनकी फिल्म देखकर समझा जा सकता है कि प्रवासियों की अंदरूनी पॉलिटिक्स का जो चित्रण उन्होंने किया है वह उनका खुद का देखा-महसूस किया अनुभव होगा. हालांकि ‘सॉल्ट ब्रिज’ ऑस्ट्रेलिया आधारित होने के बावजूद नस्लभेद पर कोई टिप्पणी नहीं करती और उसका यह पलायनवाद अखरता भी है. लेकिन अकेले पड़े प्रवासियों की कहानी आपको ‘नेमसेक’ फिल्म से लेकर झुम्पा लाहिड़ी के प्रवासियों पर आधारित उपन्यासों और लघु कहानियों की याद तो दिला ही देती है.

फिल्म में उषा जाधव नायक की पत्नी बनी हैं और विदेशी मूल की एक्ट्रेस चैल्सी प्रैस्टन क्रेफर्ड नायक की दोस्त. फिल्म के शुरुआती लंबे हिस्से तक आपको यह कास्टिंग और कहानी काफी स्टीरियोटाइप्ड लगती है. कि एनआरआई नायक एक सांवले रंग की ऊंची आवाज में ही बात करने वाली हिंदुस्तानी और घरेलू पत्नी के साथ रहने को मजबूर है और कार चलाना सीखने के दौरान एक बेहद खूबसूरत और सौम्य ऑस्ट्रेलियन महिला की तरफ आकर्षित होता है. लेकिन फिल्म जल्द ही इन क्लीशों और स्टीरियोटाइप्स को सर के बल खड़ा कर आपको हैरत में डाल देती है और एक ऐसा दिलचस्प नजरिया व विचार पटकथा में पिरोती है, जिसे देखने की हमें आदत नहीं है.

इसलिए भले ही ‘सॉल्ट ब्रिज’ का क्राफ्ट कमजोर हो, एडिटिंग नौसिखियों वाली हो, कई सीन खराब तरीके से फिल्माए गए हों, सेकेंड हाफ जरूरत से ज्यादा लंबा हो, क्लाइमेक्स सुस्त हो, रफ्तार इत्मीनान वाली हो, और ये आज से आठ-दस साल पहले बनने वाली कम-बजट इंडी फिल्मों की याद दिलाती हो. फिर भी, केवल इस विचार को परदे पर आकार लेते हुए देखने के लिए यह फिल्म देखी जा सकती है.

फिल्म में एक पंक्ति इसी विचार के इर्द-गिर्द बुनी हुई मिलती है– ‘हमारी दोस्ती का ये अंजाम नहीं होता, गर तू लड़का होती या मैं लड़की होता’. ‘साल्ट ब्रिज’ देखकर जब आप इस पंक्ति का मतलब समझेंगे तो इस फिल्म के केंद्रीय विचार की बुद्धिमत्ता को नकार नहीं पाएंगे.

कुछ नहीं तो राजीव खंडेलवाल की एक और ईमानदार व दमदार परफॉर्मेंस के लिए फिल्म देख लीजिए. आप देखेंगे, कई लोग देखेंगे, तो वे अपनी ही फिल्म को ट्विटर पर यूं अनाथ नहीं छोड़ेंगे!