अब जो पश्चिमी पंचांग विश्वव्यापी हो गया उसके अनुसार नया वर्ष शुरू हो गया है. जनवरी में दो तारीखें आधुनिक भारत के इतिहास में बहुत महत्व रखती हैं- 26 और 30. पहली को हमारा संविधान लागू हुआ और हम एक लोकतांत्रिक गणतंत्र बने - उस गणतंत्र को अब 69 वर्ष हो जायेंगे. दूसरी को इस गणतंत्र के अधिष्ठाता महात्मा गांधी की हत्या हुई जो उस समय भारत की लगभग हर परिवार में मृत्यु की तरह मानी गयी थी, संघ-परिवार को छोड़कर.

रज़ा फ़ाउंडेशन की नयी सीरीज ‘गांधी मैटर्स’ में अमरीकी विद्वान् और शांति-कर्मी जेम्स डगलस ने ‘गांधी और अकथनीय: सत्य के साथ उनका अंतिम प्रयोग’ विषय पर बोलते हुए एक बार फिर गांधी-हत्या की रहस्यमयता का प्रसंग उठाया और सुशोधित ब्यौरों के साथ इसरार किया कि उस हत्या में कई शक्तियों की शिरकत थी. तत्कालीन केंद्र और बंबई की सरकारों ने उनकी हत्या के षड्यंत्र की ठोस खुफ़िया जानकारी को लगभग नज़रंदाज किया. सावरकर की परोक्ष पर अकाट्य हिस्सेदारी की अदालत ने अनदेखी की और हत्यारे गोडसे को लगभग नौ घंटे तक चला बयान देने की छूट दी, जिसमें उसने गांधी के विरुद्ध भयानक विष-वमन किया.

डगलस ने स्पष्ट किया कि गांधी की खोज यह थी कि राज्य आतंकवाद और क्रांतिकारिता से अलग उनका तीसरा रास्ता था सत्याग्रह, जिसमें साधन और साध्य के बीच कोई द्वैत संभव नहीं था. गांधी ने कहा था कि साधन और साध्य के बीच वही रिश्ता है जो बीज और वृक्ष के बीच होता है- ‘हम जैसा बोते हैं ठीक वैसा ही काटते हैं.’ गांधी प्रेम और सत्य की रूपांतरकारी शक्ति में अंत तक विश्वास करते रहे. अपनी मृत्यु के पहले उनके अंतिम शब्द थे - ‘हे राम’.

यह तो स्पष्ट है कि गांधी का भारत-विचार बुरी तरह से क्षत-विक्षत किया जा रहा है. जिन शक्तियों ने एक दुरभिसंधि की तहत उनकी हत्या की वे नया रूप धारणकर सत्तारूढ़ हैं. यह आकस्मिक नहीं है कि गोडसे ने जिस हत्या-हिंसा की अपने आखि़री बयान में अदालत के सामने वकालत की थी, उससे पिछले कुछ वर्षों में प्रेरणा पानेवाली शक्तियों ने सामाजिक नीति की तरह अपनाया और उस पर लगभग रोज़ाना अमल करती हैं. गोडसे ने कहा था कि स्वतंत्रता हासिल करने और फिर उसे बनाये रखने के लिए मारना ज़रूरी है, जिसमें हत्या करना भी शामिल है. अहिंसा आक्रमण का सामना नहीं कर सकती और राजकीय नीति के रूप में वह देश को बरबाद कर देगी. शत्रु को मारना ही चाहिये.

यह ख़याल दहशत से भर देता है कि गोडसे की हिंसा-हत्या के दर्शन से प्रेरित शक्तियां इस क़दर उभार पर हैं और उनका प्रतिरोध करने की शक्तियां पिछड़ रही लगती हैं. पर हो सकता है यह उभार अधिक मुखर-सक्रिय भले हो, अहिंसा और सत्य की शक्तियां भी हैं और अंततः वे ही हमारी सभ्यता को, स्वतंत्रता-संग्राम की हमारी परंपरा को बचायेंगी. एक नये तरह के सत्याग्रह, एक नये संघर्ष का समय आ चुका है. एक अर्थ में वह कभी कम नहीं हुआ, भले दृश्य न रहा हो.

जगमगाते भक्ति-काल में

भक्ति-काल हिंदी साहित्य में स्वर्णयुग माना जाता है. उसमें विकसित हुई देशज आधुनिकता को भी इधर लक्ष्य किया गया है और उससे यह भी स्पष्ट हुआ है कि हमारा मध्ययुग पश्चिमी मध्यकाल की तरह अंधेरा नहीं जगमगाता समय है. भला और इस काल में कहीं और कबीर, तुलसी, मीरा, सूर जैसी महान् विभूतियां संभव हुईं?

यह भी अब व्यापक रूप से माना जाता है कि भक्ति-युग साहित्य, समाज और धर्म सभी के जनतांत्रिकीकरण की शुरूआत का भी समय है. कविता ने धर्मों की रूढ़ अनुष्ठानपरकता से हट कर एक नया जनतांत्रिक सर्वजनसुलभ अध्यात्म भी विकसित किया जो हिंदी अंचल पर छा गया. सवर्णों के वर्चस्व को रचनात्मक चुनौती मिली और ऐसे अनेक लोक अभिव्यक्ति का अधिकार पा गये जो इससे वंचित रह आये थे. संस्कृत ने अपने को बोलियों के रूप में चरितार्थ करने का जोखिम उठाया. भक्ति-काव्य को, कुल मिलाकर,माया-प्रपंच, कलियुग के विपर्याय, ज्ञान के कठघरों, कालछाया, काम-क्रोध की हिंसा आदि के विरुद्ध प्रतिरोध या विद्रोह के रूप में पढ़ा-गुना जा सकता है.

यह ऐसा समय भी था जब कविता, चित्रकला, संगीत और नृत्य आदि में परस्परता थी और लगातार आदान-प्रदान था. कविता जीवन का उत्सव, ईश्वर का गुणगान आदि थी तो सामाजिक तौर और निजी सच्चाइयों और तनाव-बेचैनी आदि के मार्मिक नकूश उसमें उभरते रहे. शायद संस्कृत के मुक़ाबले कविता की सामाजिक व्याप्ति में भी अभूतपूर्व विस्तार हुआ. यह विस्तार, एक तरह से, अब तक बना हुआ है. हिंदी अंचल पर तुलसी और कबीर का आज भी राज्य है और करोड़ों उनकी कविता से सौंदर्य-नीति अध्यात्म का संस्कार पाते रहते हैं.

यों तो सभी भक्त कवियों में पर विशेष रूप से तुलसी और कबीर में कॉस्मिक दृष्टि और जीवन का घरेलू पड़ोस दोनों हैं. अकसर विश्वदृष्टि अपने को कविता में चरितार्थ करने के लिए सचाई के बिंब और अन्तध्वर्नियां घरेलू पड़ोस से ही चुनती है. भक्ति-काव्य ने ईश्वर को सामान्य जन का पड़ोसी बना दिया, उसे मंदिर-मस्जिद के कारागारों से मुक्त कर. चूंकि मुझे भुवनेश्वर में इसी सप्ताह आयोजित एक साहित्य समारोह में बोलना है तुलसीदास पर, मैंने ‘रामचरितमानस’ का अंतिम खंड उलटा-पलटा. उसमें दूध दुहने, नोई, दुहनेवाला,औंटाना, मथानी, मक्खन, दीपशिखा, किवाड़, प्रकाश, झरोखे, दीपक, कृपाण, खानें, कुदाल, चंदन, समुद्र, अमृत आदि बिंब हैं.

तुलसीदास की एक उक्ति का सहारा लेते हुए मैंने अपने बीजवक्तव्य का शीर्षक रखा है- ‘बर जहु भय बिसराई’. तुलसीदास मानवीय जीवन की अभ्यर्थना भी करते हैं- ‘बड़े भाग मानुष तनु पावा. सुर दुर्लभ सब ग्रन्थहिं गावा.’ उन्होंने यह भी कहा है- ‘बैर न बिग्रह आस न त्रासा. मुखमय ताहि सदा सब आसा’. राम से यह भी कहलाया गया है- ‘नहिं अनीति नहिं कुछ प्रभुताई. सुनहु करहु जो तुम्हहिं सोहाई.’

भोपाल में अभयारण्य

दशकों बाद इस बार वर्ष का लगभग अन्तिम सप्ताह हमने शुद्ध पारिवारिक स्तर पर भोपाल में बिताया. भेल के एक गेस्टहाउस में जहां सिर्फ़ हम ही थे. बरसों बाद जाड़ों की धूप में घंटों बैठना हुआ- कुछ पढ़ते, ज़्यादातर निठल्ले. याद आया कि कभी चित्रकार स्वामीनाथन हमारे भोपाल के सरकारी बंगले के लॉन में चुपचाप बैठकर पलाश से बातें करते थे. इस बार गेस्टहाउस के बगल में आकाशनीम का एक पेड़ था जिसे बहू प्रीति ने पहचाना. फिर याद आया कि सागर के कैंट ऐरिया में उसके बहुत से पड़े थे और उसका नाम पहली बार अज्ञेय जी से जाना था जो 1958 में सागर विश्वविद्यालय के छात्रसंघ का उदघाटन करने आये थे.

पोता ऋभु भोपाल देखना चाहता था सो वह बेटा-बहू के साथ मढ़ई, भीम बैठका, भोजपुर आदि गया. मैं उसे अपनी नज़र से भारत भवन दिखने ले गया. बेटी-नातिन की अनुपस्थिति खलती रही क्योंकि वे मीठी के इम्तहान होने के कारण नहीं आ पाये. हमारी तीनों बहनें, दो भाई उनके बच्चों आदि के साथ-साथ ग़प लगाते, गुज़रा वक़्त याद करते सहज बिताया. यह अद्भुत पारिवारिक मिलन साबित हुआ. हमारी बहनों को हमारे पिता की इतनी बातें पता और याद थीं जिनका मुझे पता न था. यह भी समझ में आया कि हमारे पूरे विस्तृत परिवार में प्रायः हर सदस्य में विनोद भाव है. कई प्रतिकूल परिस्थितियां बरदाश्त करने में शायद इस विनोद से मदद मिलती है. प्रायः सभी अपना भी खूब मज़ाक बनाते हैं जो निश्चय ही एक स्वस्थवृत्ति है.

हम इतने बरस भोपाल रहे, लगभग बीस बरस. पर कभी वहां बोटिंग नहीं की थी. उसकी तब विशेष व्यवस्था भी नहीं थी जो अब है. एक याटक़्लब था जो अब नष्टप्राय है. उसे क्लब में कभी-कभार डिनर पर जाने की याद है. पर इस बार पोते के इसरार पर हमने बड़े तालाब में घंटे भर बोटिंग की. पोते, कबीर और मैंने गाने भी गाये. मुझे गाने का क़तई अभ्यास नहीं है- फिर भी ‘वह सुबह कभी तो आयेगी’ वाला गाना एकाध बन्द गा पाया.

हमारा परिवार अलग-अलग बसा संयुक्त परिवार है जिसमें वर्चस्व बहनों का है. सारे अहम फैसले शादी-ब्याह के, मकान खरीदने-बदलने के, देशाटन आदि के बहनों की सहमति से ही लिये जाते हैं. भोपाल में रहनेवाली तीन बहनें अध्यापन कार्य करती रही हैं. एक छोटा भाई अनिल, जो मुझसे 3 बरस छोटा है, इन दिनों अशक्त है भोपाल आ गया है और बाहर बिलकुल नहीं निकलता. हमारे इसरार पर गेस्ट हाउस लंच पर आया और काफ़ी देर धूप में बैठा.

भोपाल में पहली बार ऐसा हुआ कि ध्रुव शुक्ल को छोड़कर किसी और लेखक या कलाकार से मुलाक़ात नहीं हुई. उनकी सोहबत को जो सैकड़ों बार होती रही है और जिसने मुझे समृद्ध किया है, मिस नहीं किया. लेखक वैसे भी दूसरा जीवन जीते हैं- कभी-कभी उनको उस जीवन को कुछ समय के लिए स्थगित कर सीधे मूल जीवन में जाना चाहिये. वह भी बहुत समृद्धिकर अनुभव है. इस मायने में भी कि तब अहसास होता है कि कितना सारा जीवन है जो साहित्य में कभी आ ही नहीं पाता. शायद आ ही नहीं सकता.