मनमोहन जी, आपने खुद को एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर के साथ एक्सीडेंटल फायनेंस मिनिस्टर भी कहा. ऐसा क्यों?

देखिए, जिसका एक बार हो गया हो, क्या उसका दोबारा एक्सीडेंट नहीं हो सकता!... और जितनी बार एक्सीडेंट होगा, उतनी बार ही कहा जाएगा न...इसमें ठीक-ठीक लगाने जैसा भी कुछ है क्या!

एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर और एक्सीडेंटल फायनेंस मिनिस्टर में से क्या बनना कम दुखदाई था?

(खीजते हुए) क्या आप बता सकती हैं कि आपके लिए टांग टूटना कम दुखदाई होगा या फिर हाथ टूटना! हद है, आप किसी से ये कैसे पूछ सकती हैं... हर एक दुर्घटना की अपनी अलग तकलीफ होती है.

आखिर दो इतने बड़े एक्सीडेंट आपके साथ ही क्यों हुए?

इसका जवाब घायल होने वाला भला कैसे दे सकता है,...ये सवाल तो आपको दूसरे लोगों से करना चाहिए कि आखिर दोनों बार उन्होंने मुझे ही क्यों ठोका!

मनमोहन जी, आपने यह क्यों कहा कि आपको मीडिया वालों से बात करने में डर नहीं लगता था. यदि ऐसा था तो फिर आपकी छवि बात न करने वाले प्रधानमंत्री की कैसे बन गई?

पत्रकारों से डर मुझे कभी इसलिए नहीं लगा क्योंकि मौन व्रत रखने वालों को कैसे भी पेचीदा सवालों से डर नहीं लगता! रही बात मेरी छवि की...तो चुप रहने वाले व्यक्ति की छवि मौनी बाबा की नहीं तो फिर किसकी बनेगी!

अच्छा यह बताइए, आपने केन्द्र सरकार और रिजर्व बैंक के संबंधों को पति-पत्नी जैसा संबंध क्यों कहा?

क्योंकि दोनों के बीच बात-बात पर मतभेद और टकराव होते रहते हैं!

द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टरफिल्म के बारे में आपको क्या कहना है?

मैं तो एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर बनने पर ही कुछ नहीं कह सका, फिर फिल्म पर क्या ही कहूंगा!... दूसरी बात ये है कि कई खबरों के मुताबिक इस फिल्म को बनाने में काला-धन लगा है और आप तो जानती ही हैं कि घोटाले और गड़बड़झालों पर वैसे भी मैं कोई टिप्पणी नहीं करता.

मनमोहन जी, क्या आप चाहते हैं कि देश में इस फिल्म पर प्रतिबंध लग जाए?

फिल्म पर प्रतिबंध का तो पता नहीं, लेकिन देश में एक्सीडेंटल पीएम बनने पर अब बैन लगना चाहिए!

इस फिल्म में आपका किरदार निभा रहे अनुपम खेर के बारे में आपको क्या कहना है?

अनुपम खेर क्या, दुनिया का कोई भी अभिनेता एक्सीडेंट के दौरान और उसके बाद के दस साल के दर्द और उफ्फ तक न कर पाने की मजबूरी को पर्दे पर नहीं उतार सकता!

अनुपम खेर का कहना है कि इस फिल्म में आपकी आवाज की कॉपी करना सबसे मुश्किल था. इस पर आप क्या कहेंगे?

चुप्पी को कॉपी करने में भला कैसी मुश्किल?...शायद किसी बातूनी के लिए मौनी बाबा की भूमिका निभाना वैसा ही कठिन होता होगा, जैसे मौनी बाबा के लिए लगातार बातें करना!

यह बताइए नरेन्द्र मोदी को आप कैसा प्रधानमंत्री मानते हैं?

एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर!

हैं! वह भला क्यों?

मैं वो था जिसका एक्सीडेंट हुआ...वे वो हैं जो एक्सीडेंट करते हैं. मोदी जी दिल से शिकारी हैं...अर्र...मेरा कहने का मतलब सिर्फ इतना ही है कि वे शेर दिल वाले हैं.

आपमें और नरेन्द्र मोदी में सबसे बड़ा फर्क क्या है?

मैं मजबूर प्रधानमंत्री था, वे मगरूर प्रधानमंत्री हैं!

मनमोहन जी, ऐसा महसूस हो रहा है कि अपने प्रधानमंत्रित्व काल से ज्यादा आप आजकल बोलने लगे हैं. क्या इसकी कोई खास वजह है?

देखिए, न तो मैं जन्म से गूंगा हूं...और न ही उज्जैन के मौनी बाबा की तरह मैंने कोई मौन व्रत रखा है. रही बात ये कि आजकल बोलने लगा हूं, तो ये मेरी मर्जी पर है कि मैं कब और कितने समय के लिए मौनी बाबा बन जाऊं और कब दूसरों के मौन पर उंगली उठाऊं. वर्तमान प्रधानमंत्री का मुंह खुलवाने के लिए यदि मुझे अपना मुंह खोलना पड़े तो मैं खोलूंगा...कम से कम अब तो मुझे मुंह खोलने के लिए किसी की तरफ देखना भी नहीं है!

1996 में संयुक्त मोर्चा ने कांग्रेस के समर्थन से जिन एचडी देवेगौड़ा को प्रधानमंत्री बनाया था, उनका कहना है कि वे भी एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर थे. इस बारे में आपको क्या कहना है?

सिर्फ मैं और देवेगौड़ा जी ही नहीं, कांग्रेस पार्टी में परिवार से अलग जो भी प्रधानमंत्री बने वे सब एक्सीडेंटल ही हैं...फर्क सिर्फ इतना ही है बाकी सबने अपने एक्सीडेंट छिपा लिए, हम दोनों ने बता दिए. वैसे भी एक्सीडेंट बताने की चीज है छिपाने की नहीं. ये ठीक है कि एक्सीडेंट से मिला दर्द कोई कम या खत्म नहीं कर सकता, लेकिन सहानुभूति का मजा भी कोई चीज है.

अच्छा यह बताइए, क्या आप राहुल गांधी को अगला प्रधानमंत्री बनने के योग्य मानते हैं?

सबसे पहली बात तो ये है कि हमारे देश में योग्यता सिर्फ आईएएस या दूसरी परीक्षाएं पास करने के लिए ही चाहिए होती है; नेता, मंत्री या प्रधानमंत्री बनने के लिए नहीं! दूसरी बात ये है एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर्स को छोड़ दें, तो कांग्रेस में प्रधानमंत्री बनने की बुनियादी योग्यता, सिर्फ गांधी परिवार में पैदा होना है... और ये योग्यता राहुल बाबा पूरा करते हैं.

लेकिन आपसे अलग नरसिम्हा राव भी हैं जो गांधी परिवार से नहीं थे और वे एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर भी नहीं बने थे. इस बारे में आप क्या कहेंगे?

देखिए, फर्क सिर्फ इतना ही है कि मैंने और देवेगौड़ा जी ने अपने दुर्घटनाग्रस्त होने की बात स्वीकार कर ली लेकिन नरसिम्हा राव जी ने ऐसा कभी नहीं किया. पर उनकी तो रूह तक इस दुख से घायल होगी कि प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनकी अंत्येष्टि राजकीय सम्मान से नहीं हो सकी.

संजय बारू के बारे में आप क्या कहेंगे?

वे खुद को सुपरहिट पटकथा लेखक समझ रहे होंगे, पर मेरे लिए तो वे आस्तीन का सांप निकले! यह अफसोसजनक है कि एक मीडिया सलाहकार को इतनी भी समझ नहीं कि जैसे अंधे को अंधा कहने पर दुखता है, वैसे ही एक एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर को एक्सीडेंटल कहो तो कितनी छाती फटती है! पर यहां सबके सब ‘एक्सीडेंट एक्सपर्ट’ बने घूम रहे हैं... एक्सीडेंट करने वाले भी, उस एक्सीडेंट का आंखों-देखा हाल लिखने वाले भी, और उस आंखों-देखे हाल को पर्दे पर उतारने वाले भी.

मनमोहन जी, क्या आप वर्तमान राजनीति के बारे में कुछ कहना चाहेंगे?

राजनीति के बारे में तो कुछ नहीं, लेकिन हां, मैं एक मुहावरा जरूर बदलना चाहूंगा. मैं चाहता हूं कि ‘मजबूरी का नाम महात्मा गांधी’ को बदलकर ‘मजबूरी का नाम मनमोहन सिंह’ कर दिया जाए. इस एक बदलाव से इतिहास में मेरे मौन का सही-सही मूल्यांकन हो जाएगा!