अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर सौदे में कथित भ्रष्टाचार का मामला बिचौलिए क्रिश्चियन मिशेल के प्रत्यर्पण के बाद अलग-अलग वजहों के चलते चर्चा में बना हुआ है. भाजपा और केंद्र सरकार इसे लेकर कांग्रेस पर हमलावर हैं. इनका दावा है कि जांच एजेंसियों की क्रिश्चियन मिशेल से पूछताछ से बड़े तथ्य सामने आएंगे. वहीं, दूसरी तरफ़ जांच एजेंसियों के ही हवाले से रिपोर्टें आ रही हैं कि क्रिश्चियन मिशेल से हुई अब तक की पूछताछ में कोई बेहद अहम जानकारी नहीं मिली है.

क्रिश्चियन मिशेल को जब भारत लाया गया था, उस समय पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के लिए प्रचार अभियान चल रहा था. चुनाव के बीच में मुख्य विपक्षी दल से जुड़े विवादित मामले के आरोपित के प्रत्यर्पण को भाजपा ने खूब भुनाने की कोशिश की. सत्ताधारी दल के सबसे बड़े नेता और स्टार प्रचारक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ख़ुद अपनी चुनावी रैलियों में क्रिश्चियन मिशेल का ज़िक्र किया. इस दौरान उनका कहना था कि अब अगस्ता वेस्टलैंड मामले के भेद सामने आएंगे और वे किसी को नहीं बख़्शेंगे. हालांकि चुनाव नतीजों से साबित हो गया कि इस प्रत्यर्पण से भाजपा को कोई खास फ़ायदा नहीं मिला.

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के दावे पर सवाल

चूंकि लोकसभा चुनाव में अब कुछ ही महीनों का वक्त बचा है, ऐसे में इस बात की संभावना कम ही है कि यह मामला अंतिम नतीजे पर पहुंच जाए. जानकारों के मुताबिक़ संभव है कि तब तक किसी न किसी तरह इस मामले को खींचना जारी रखा जाएगा. जैसे ईडी ने हाल ही में अदालत में यह दावा किया उसकी पूछताछ के दौरान मिशेल ने ‘श्रीमती गांधी’ का नाम लिया था. लेकिन इसके साथ जांच एजेंसी ने यह भी कहा कि वह यह नहीं बता सकती कि मिशेल ने ‘श्रीमती गांधी’ का नाम किस संदर्भ में लिया. जांच एजेंसी ने कोर्ट को यह भी बताया कि मिशेल ने ‘इटली की महिला के बेटे’ का ज़िक्र करते हुए यह भी कहा था कि वह ‘भारत का अगला प्रधानमंत्री’ बनेगा.

यह स्पष्ट है कि ईडी ने अदालत में इन बातों का ज़िक्र करके साफ़-साफ़ नाम न लेते हुए भी कांग्रेस विरोधियों को सोनिया गांधी और राहुल गांधी को घेरने का मौक़ा दे दिया है. हालांकि कई लोगों ने ईडी के इस रुख़ को अजीब बताया है. उनका कहना है कि जांच एजेंसी ने अदालत में जो जानकारी दी, उससे यह बिलकुल स्पष्ट नहीं होता कि वह इस केस में सोनिया गांधी और राहुल गांधी की भूमिका पर सवाल उठा रही है. वहीं ‘श्रीमती गांधी’ को लेकर जिस कथित ‘संदर्भ’ का ज़िक्र उसने कोर्ट में नहीं किया, अगर वह इस सौदे को लेकर हुए कथित भ्रष्टाचार से जुड़ा है तो वह भी सामने आना चाहिए. और अगर उस संदर्भ का इस मामले से कोई संबंध नहीं है तो फिर ‘श्रीमती गांधी’ का ज़िक्र जांच एजेंसी ने अदालत में क्यों किया.

ढाई साल की जांच के बाद भी ईडी को आगे शायद ही कोई बड़ी सफलता मिले

हिंदी अख़बार दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट पढ़ने के बाद यह संभावना काफ़ी पुख़्ता लगने लगती है. रिपोर्ट के मुताबिक़ भले ही ईडी ने इस मामले में सोनिया गांधी का नाम लिया हो, लेकिन इसे साबित करने के लिए सबूत जुटाना उसके लिए मुश्किल हो सकता है. अख़बार के मुताबिक अभी तक की जांच में एजेंसियां गांधी परिवार तो क्या उनके किसी क़रीबी तक पहुंचने में भी विफल रही हैं. उन्हें भारत में तीन कंपनियों तक दलाली की रक़म पहुंचने के सबूत मिले हैं, लेकिन जांच उसके आगे नहीं बढ़ पा रही है. रिपोर्ट के मुताबिक़ ईडी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्वीकार किया है कि सिर्फ़ मिशेल के बयान के आधार पर किसी को आरोपित बनाना संभव नहीं है. अधिकारी ने कहा कि उसके लिए ठोस सबूत जुटाने होंगे.

रिपोर्ट आगे कहती है कि 2016 में ईडी ने उक्त कंपनियों के मुंबई, दिल्ली और हैदराबाद स्थित दस ठिकानों पर छापे मारे थे. उसने इन तीनों कंपनियों के कंप्यूटरों की हार्डडिस्क से लेकर तमाम दस्तावेज़ खंगाल लिए, लेकिन उसे ‘फै़मिली’ और केस को लेकर कुछ ख़ास नहीं मिला. ढाई साल की मशक़्क़त के बाद भी जांच एजेंसी के हाथ कुछ ठोस सबूत हाथ नहीं लगा.

उधर, मिशेल से भी ईडी को ख़ास मदद नहीं मिल रही है. रिपोर्टों के मुताबिक़ वह जांच एजेंसी के साथ सहयोग नहीं कर रहा है. सात दिन की हिरासत के दौरान उसने ईडी के हर सवाल पर यही कहा कि उसे कोई जानकारी नहीं है. ईडी ने मुख्य आरोपित के ड्राइवर नारायण से भी पूछताछ की है. लेकिन उससे भी उसे कोई अहम जानकारी नहीं मिली.

प्रत्यर्पण की कार्यवाही भाजपा के लिए राजनीतिक हथियार है

जांच एजेंसियों के हाथ अभी तक कुछ नहीं लगा है, लेकिन क्रिश्चियन मिशेल के प्रत्यर्पण का भाजपा ख़ूब राजनीतिक इस्तेमाल कर रही है. संसद में अरुण जेटली और निर्मला सीतारमण जैसे सरकार के प्रमुख मंत्री इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस को निशाना बना रहे हैं. वहीं, रफ़ाल मामले में कांग्रेस के आरोपों पर पलटवार करने में भी क्रिश्चियन मिशेल भाजपा के काम आ रहा है. प्रधानमंत्री मोदी ने भी हाल ही में एक इंटरव्यू में मिशेल के लिए ‘राज़दार’ शब्द का इस्तेमाल किया था.

कई जानकार कहते हैं कि क्रिश्चियन मिशेल ने भारत लाए जाने के समय जो बयान दिया था, उसी में उसके प्रत्यर्पण के पीछे का मक़सद छिपा है. उसका कहना था कि नरेंद्र मोदी सरकार ने पूर्व की यूपीए सरकार को इस मामले में दोषी बताकर कांग्रेस पर दबाव बनाने के लिए उसे इस केस में घसीटा है. ग़ौरतलब है कि इसी तरह की बात भाजपा की अहम सहयोगी शिव सेना ने भी कही है. बुधवार को अपने मुखपत्र ‘सामना’ में पार्टी ने अगस्ता वेस्टलैंड मामले में मोदी सरकार की मंशा पर सवाल उठाए थे. उसने कहा कि मिशेल के दावे, आगामी लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी को घेरने के प्रयास का हिस्सा हैं.

शिव सेना ने भाजपा पर आरोप लगाते हुए सामना के संपादकीय में लिखा है, ‘जब मिशेल का दुबई से प्रत्यर्पण हुआ था, उस वक़्त पांच राज्यों में चुनाव प्रचार चल रहा था और भाजपा ख़ुद ही परेशान थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ चुनावी रैलियों में इस बिचौलिए का ज़िक्र किया था और दावा किया था कि कुछ धमाकेदार जानकारी सामने आएगी. अब समझ आ रहा है कि उनका इशारा किस ओर था... यह कहा जा सकता है कि ‘मिशन मिशेल’ का उद्देश्य ‘2019’ है.’

ऐसा लगता है कि सरकार का ज़ोर मसलों के समाधान से ज्यादा प्रत्यर्पण पर है

शिव सेना की इस टिप्पणी पर ग़ौर करें तो भगोड़ा करार दिए गए विजय माल्या का मामला भी ध्यान खींचता है. उस पर आरोप है कि वह देश के बैंकों का 9,000 करोड़ रुपये का क़र्ज़ चुकाए बग़ैर विदेश भाग गया. सरकार अब उसे भारत लाए जाने के प्रयास में सफल होती दिख रही है. पिछले महीने ही ब्रिटेन की एक अदालत ने माल्या के प्रत्यर्पण को मंज़ूरी दी थी. तब से इसे मोदी सरकार की बड़ी कामयाबी बताया जा रहा है, लेकिन यह सवाल नदारद है कि माल्या से बकाया एनपीए कब तक वसूला जाएगा.

दरअसल विजय माल्या के बैंकों को क़र्ज़ नहीं चुकाने के मुद्दे पर यह आरोप हावी है कि उसे मोदी सरकार ने देश छोड़ने से क्यों नहीं रोका. आलोचकों का कहना है कि माल्या की भारत वापसी के तुरंत बाद 9,000 करोड़ रुपये बैंकों को नहीं मिलने वाले. उसके प्रत्यर्पण से तुरंत किसी को फ़ायदा होगा तो भाजपा और मोदी सरकार को होगा. वह चुनाव में बकाए क़र्ज़ का मुद्दा यह कहकर टाल सकेगी कि माल्या के प्रत्यर्पण का काम उसने कर दिखाया तो क़र्ज़ का मुद्दा भी हल हो जाएगा.

शायद यही वजह है कि विजय माल्या ने भी ब्रिटिश अदालत द्वारा उसके प्रत्यर्पण की मंज़ूरी दिए जाने के कुछ दिन बाद कहा था कि भारत सरकार की दिलचस्पी इस बात में नहीं है कि बैंकों का पैसा उन्हें वापस मिल जाए, बल्कि उसके प्रत्यर्पण में है. माल्या का कहना था, ‘मैं सुप्रीम कोर्ट में बहुत पहले, 2016 की शुरुआत से ही मामले को ख़त्म करने का प्रस्ताव दे रहा हूं. लेकिन बैंकों को सीबीआई और ईडी की तरफ़ से सख़्त निर्देश दिए गए थे कि वे मेरे हर प्रस्ताव को ठुकरा दें.’