कहा जाता है कि भारत में नाट्य कला सिकंदर के साथ आई थी. तब यूनान में नाटक खेले जाते थे. दूसरी तरफ़ यह भी मत है कि मनुष्य द्वारा भाषा का ज्ञान प्राप्त करने से पहले भी यह कला अस्तित्व में थी. गुफ़ाओं-जंगलों में रहने वाले लोग जब शिकार करके वापस आते, तो अपने बच्चों से शिकार का वर्णन भाव मुद्राओं से करते या दीवार पर चित्र उकेर कर बताते.

पहले स्थापित नाटककार कालिदास से लेकर मौजूदा दौर तक के सफ़र में गुज़री सदी भारतीय नाटक कला का सुनहरा दौर कही जा सकती है. धर्मवीर भारती, हबीब तनवीर, बादल सरकार, मोहन राकेश और गिरीश कर्नाड के अलावा एक नाम और है जिसने इस विधा में नये आयाम जोड़े हैं. यह नाम है विजय तेंदुलकर का. मराठी रंगमंच को हमेशा के लिए बदलने वाले विजय तेंदुलकर वह नाटककार हैं जो जितने चर्चित रहे उतने ही विवादित भी.

पिछली सदी के 50 से 60 के दशक में नाटकों में से ‘नाटकीयता’ ख़त्म हुई और चरित्रांकन, शैली और भाषा में आमूलचूल बदलाव आये. जहां धर्मवीर भारती का ‘अंधा युग’ और गिरीश कर्नाड का ‘हयवदन’ पौराणिक और साहित्यिक कृतियों में मानवीय भावनाओं का मंचन है तो हबीब तनवीर के नाटकों में जीवन का विरोधाभास नज़र आता है, फिर वह चाहे ‘आगरा बाज़ार’ हो या ‘चरण दास चोर’. मोहन राकेश के नाटकों के पात्र ड्राइंग रूम में बैठकर चर्चा करते हैं तो बादल सरकार के नाटकों के मुख्य पात्र ‘एंटी एस्टैब्लिश्मेंट’ यानी व्यवस्था विरोध की बात उठाते हैं.

उधर, विजय तेंदुलकर ज़रा हटकर ‘बॉटम ऑफ़ द पिरामिड’ यानी समाज में सबसे नीचे की परत में ठुंसे हुए लोगों का जीवन मंच पर लाने के लिए जाने जाएंगे. समाज में सबसे नीचे का तबका वह है जिस पर यह पिरामिड टिका हुआ है. उसकी वजह से ऊपर बसे हुए लोग आराम से जी रहे हैं, पर उसके अहसान पर फ़रामोश हैं. विजय तेंदुलकर ने उस तबके का दर्द याद दिलाने के लिए लिखा.

उनके नाटकों में इंसान की आदिम प्रवृत्तियों और कुंठाओं का वर्णन है. विजय तेंदुलकर ने औरत के प्रति मर्द के हिंसक रवैये और उसे हर बार नंगा करने की पाशविक प्रवृत्ति को दिखाया. वे जाति से ब्राह्मण थे पर नाटकों में सबसे ज़्यादा प्रहार उन्होंने इसी जाति पर किया. उन्होंने मराठी भाषा में लिखा. उनके नाटक ‘शांतता!, कोर्ट चालू आहे’ (जिसका हिंदी रूपांतरण, ‘ख़ामोश! अदालत जारी है’), ‘सखाराम बाइंडर’, ‘घासीराम कोतवाल’, ‘जात ही पूछो साधू की’ और ‘गिद्ध’ बड़े चर्चित हुए. नाटकों के विषय और मंचन को लेकर वे कई बार मुश्किल में भी फंसे.

सखाराम बाइंडर’ ऐसे पुरुष की कहानी है जो हर बार नयी औरत को घर ले आता है. लाई गयी औरत से क़रार है कि उसे खाना और छत मिलेगी. इसके एवज में सखाराम उसके साथ संभोग करेगा, उसे लतियायेगा, गालियां देगा और मन भर जाने पर उसे घर से निकाल देगा. नाटक में गालियों का खुल्लम-खुल्ला उपयोग हुआ है. वे शब्द लिखे गए हैं जो आप और हम किसी ख़ास महफ़िल या अपने ज़ेहन में किसी से नाराज़ होने लिए इस्तेमाल करते हैं.

स्वाभाविक ही है कि विजय तेंदुलकर पर अश्लीलता का इल्ज़ाम लगा. आख़िर समाज ख़ुद को ऐसे बेलिबास होते हुए कैसे देख लेता, फिर चाहे वह हक़ीक़त ही क्यों न हो? बात मुंबई हाई कोर्ट पहुंची जिसने विजय तेंदुलकर के खिलाफ मामला रद्द कर दिया.

अपनी कहनियों में नग्नता परोसने के इल्ज़ाम की सफ़ाई में मंटो ने कहा था, ‘मैं वो लिखता हूं जो समाज की हक़ीक़त है’. विजय तेंदुलकर ने भी यही किया था पर समाज तो हमेशा से ही खुद को सभ्य मानता रहा है और इस ‘सभ्यता’ को उजागर करने वाले से बैर खाता रहा है.

‘खामोश! अदालत जारी है’ में एक ऐसी स्त्री का वर्णन है जिसका परिवार के एक सदस्य ने ही यौन शोषण किया है और बाद में उसका प्रोफ़ेसर भी यही करता है. उस औरत की कोख में एक औलाद है जिसे समाज नाजायज़ कहकर गिराने का आदेश देता है. अलग-थलग पड़ी हुए वह औरत इसके ख़िलाफ़ लड़ती है. यह उनका सबसे प्रसिद्ध नाटक है और अब तक इसके 6000 से ज़्यादा मंचन हो चुके हैं. इसकी अनुवादक सरोजिनी वर्मा कहती हैं, ‘पहली बार विजय तेंदुलकर ने इस नाटक के ज़रिए परंपरागत नाटक को प्रयोगधर्मी रंगमंच के साथ जोड़कर दर्शकों को सीधे पकड़ लिया’. ‘सखाराम बाइंडर’ के अनुवाद में इस्तेमाल की हुई भाषा शैली के निकट तक टिके रहने में सरोजिनी वर्मा को यकीनन काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी होगी और चुनिंदा ‘लफ़्ज़ों’ के इस्तेमाल में उन्होंने हिम्मत भी दिखाई है.

ऐतिहासिक काल पर आधारित नाटक ‘घासीराम कोतवाल’ को आज के समाज से जोड़ते हुए विजय तेंदुलकर ने कहा था, ‘मेरी निगाह में घासीराम कोतवाल एक विशिष्ट सामाजिक स्थिति की ओर संकेत करता है. वह स्थिति न पुरानी है और न नई. न वह किसी भौगोलिक सीमा-रेखा में बंधी है, न समय से ही. वह स्थल-कालातीत है, इसलिए ‘घासीराम’ और ‘नाना फड़नवीस’ भी स्थल-कालातीत हैं. सामाजिक स्थितियां उन्हें जन्म देती हैं, देती रहेंगी. किसी भी युग का नाटककार उनसे अछूता नहीं रह पाएगा.

विजय तेंदुलकर की लेखन शैली ने बॉलीवुड को भी ख़ासा अचंभित किया. आजकल के स्टार्ट अप्स में ‘क्राउड फंडिंग’ के विचार को सबसे पहले उन्होंने फिल्म ‘मंथन’ में दिखाया था, जहां कुछ महिलाएं अपनी पूंजी लगाकर दूध की सहकारी समिति चलाते हुए संघर्ष करती हैं. श्याम बेनेगल की इस फ़िल्म की पटकथा उन्होंने कैफ़ी आज़मी के साथ मिलकर लिखी थी. अपराध जगत और एक पुलिस अफ़सर के द्वंद पर बॉलीवुड की सबसे सशक्त फ़िल्म ‘अर्धसत्य’ और ग़रीब किसानों की स्त्रियों के शोषण पर बनी ‘आक्रोश’ जैसी फ़िल्मों की पटकथा उन्होंने ही लिखी थी.

विजय तेंदुलकर के नाटकों और फ़िल्मों की पटकथा में एक बात समांतर चलती है. वह यह कि वे अपने नाटकों में दिखती समाज की विसंगतियों और मानसिक बदहाली का हल नहीं बताते. समस्या का लेखांकन भर करके छोड़ देते हैं. वे मानो उस डॉक्टर की तरह हैं जिसने सर्जरी के दौरान ज़ख्म की तह तक पहुंचकर उसकी चीरफाड़ कर दी है पर वह उसे सिलता नहीं है. यह विजय तेंदुलकर की निर्ममता नहीं है. उनकी ईमानदारी है. आख़िर इंसान की कुंठाओं और कामनाओं का इलाज समाज या सरकार के पास नहीं है, उसे ख़ुद ही अपना उपचार करना होगा.