अमेरिका, रूस और चीन के बाद भारत संसार का चौथा ऐसा देश है, जिसके पास अंतरिक्ष की खोज, उसके उपयोग और वहां अपने यान भेजने का अच्छा अनुभव है. भारत ने 2008 के दौरान चंद्रमा की कक्षा में ‘चंद्रयान-1’ भेजकर पहली बार यह सफलता हासिल की थी. वहीं 2014 में भारत ने मंगल ग्रह की कक्षा में मंगलयान भेजकर पूरी दुनिया को चौंका दिया था. भारत अब 2022 में गगनयान परियोजना के तहत अंतरिक्ष में मानव भेजने की तैयारी में है.

हाल-फिलहाल की बात करें तो तीन जनवरी को चीन ने ‘चांग’ए4’ नाम का एक रोवर (एक रोबोटिक मशीन जो चांद की सतह पर घूम सकती और कुछ सीमाओं के साथ वहां प्रयोग भी कर सकती है) चंद्रमा की उस सतह पर उतारा है जो पृथ्वी से दिखाई नहीं पड़ती. चीन यह उपलब्धि हासिल करने वाला दुनिया का अकेला देश है. कुल मिलाकर अमेरिका, रूस, यूरोप और भारत के साथ-साथ कुछ और गिनेचुने देश अंतरिक्ष की इस दौड़ में शामिल हैं. और यह दौड़ है चंद्रमा-मंगल पर मौजूद खनिज पदार्थों या वहां के संसाधनों को हासिल करने की ताकि मनुष्य जाति अपना अस्तित्व बचाने के साथ-साथ सभ्यता का और विकास कर सके.

वहीं अंतरिक्ष में वर्चस्व की मुख्य दौड़ मंगल ग्रह पर पहुंचने और वहां अपनी बस्तियां बसाने की ही है. अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ 2030 वाले दशक में पहली बार मनुष्य को मंगल ग्रह पर भेजने की सोच रही है. यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ‘ईएसए’ भी 2050 तक अपने एक ऐसे ही अभियान को संभव मानती है. जबकि भारत 2021-22 तक अपना ‘मंगलयान-2’ वहां रवाना करना चाहता है. ये सभी अभियान कहने-सुनने में बहुत रोमांचकारी लगते हैं, लेकिन इनकी कुछ ऐसी चुनौतियां हैं जिन पर चर्चा करते हुए समझा जा सकता है कि मंगल तक की मानवयुक्त अंतरिक्ष यात्रा सभी देशों के लिए एक बहुत ही लंबी बाधा दौड़ है.

मंगल की तरफ यान रवाना करने का सबसे सही समय

मंगल ग्रह की दिशा में कोई यान भेजने का सही समय तभी होता है, जब सूर्य की परिक्रमा करते हुए वह पृथ्वी के सबसे निकट आ रहा होता है. यह निकटतम दूरी हर 26 महीने बाद देखने में आती है. ऐसा इसलिए है क्योंकि पृथ्वी और मंगल, सूर्य से अलग-अलग दूरियों पर स्थित परिक्रमा कक्षाओं में रहकर अलग-अलग गतियों के साथ उसकी परिक्रमा करते हैं. पृथ्वी तो 365 दिनों के अपने एक वर्ष में सूर्य का एक चक्कर लगा लेती है, जबकि मंगल को सूर्य का एक चक्कर पूरा करने में पृध्वी के 687 दिन, यानी हमारे क़रीब दो वर्ष का समय लग जाता है. इस तरह मंगल का एक वर्ष पृथ्वी के क़रीब दो वर्षों के बराबर है.

पृथ्वी और मंगल ग्रह के हर 26 महीने बाद ही एक-दूसरे के निकटतम होने का अर्थ है कि दोनों दिशाओं में हर उड़ान 26 महीनों की प्रतीक्षा के बाद ही हो सकती है. एक-दूसरे के आमने-सामने होने की यह निकटतम दूरी सिद्धांततः क़रीब पांच करोड़ 46 लाख किलोमीटर होनी चाहिये. किंतु अब तक के ज्ञात इतिहास में ऐसा कभी हुआ नहीं. अब तक देखी गयी निकटतम दूरी पांच करोड़ 60 लाख किलोमीटर थी, जिसे अगस्त 2003 में दर्ज किया गया था. इसलिए दोनों के बीच की सबसे कम दूरी वाले दिन की हर बार नई गणना करते हुए, तथा यान की गति, ईंधन की मात्रा और उड़ानपथ की लंबाई को ध्यान में रखते हुए उसे निकटतम दूरी वाले दिन से कम से कम 150 से 300 दिन पहले रवाना कर दिया जाना चाहिये, वरना अगले 26 महीनों तक हाथ पर हाथ धरे बैठे रह जाना पड़ जाएगा.

निकटतम दूरी वाले समय को चूकने का अर्थ है कि उसके बाद मंगल हर दिन पृथ्वी से दूर जाते हुए एक दिन 40 करोड़ 10 लाख किलोमीटर की अधिकतम दूरी पर चला जाएगा. दूरी बढ़ने के साथ यात्रा में लगने वाला समय न केवल बढ़ता जाएगा, हमारा सूर्य भी दोनों ग्रहों के बीच आड़े आते हुए यात्रा को लंबा व दुष्कर बनाता जाएगा. इन्हीं सब कारणों से मंगल पर पहुंचने के बाद तुरंत वापसी नहीं हो सकती. पृथ्वी पर वापसी के लिए भी न्यूनतम दूरी वाले सही समय की हर बार गणना और प्रतीक्षा करनी पड़ेगी.

भारहीनता के प्रतिकूल प्रभाव

पृथ्वी से मंगल ग्रह तक की दूरी और उसे तय करने में लगने वाला लंबा समय न केवल वैज्ञानिक-तकनीकी चुनौती है, इस दौरान अंतरिक्ष यात्रियों को तन-मन से स्वस्थ रखना भी एक बड़ी पहेली है. अब तक की लंबी अंतरिक्ष यात्राओं और भारहीनता के मानव शरीर पर होने वाले प्रभावों ने दिखाया है कि समय के साथ हड्डियों और मांसपेशियों का क्षरण होने लगता है. शरीर में कमज़ोरी आने लगती है. मस्तिष्क में भी अनचाहे परिवर्तन होते हैं. भारहीनता की अवस्था जितनी लंबी होती है, गंतव्य ग्रह या उपग्रह पर पहुंचने या पृथ्वी पर वापसी के बाद शरीर को गुरुवात्कर्षण शक्ति का फिर से अभ्यस्त बनाने में उतनी ही कठिनाई होती है.

इस समय की रॉकेट तकनीक को देखते हुए मंगल पर पहुंचने की एकतरफा यात्रा ही आठ से नौ महीनों की हुआ करेगी. अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ की एक रिपोर्ट बताती है कि लंबे समय तक अंतिरक्ष में रहने से शरीर की रोगप्रतिरक्षण प्रणाली (इम्यून सिस्टम) पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. अब तक के लंबे अंतरिक्ष प्रवासों के बाद यात्रिकों के रक्त में इस प्रणाली के ‘टी-सेलों’ सहित दूसरी कोशिकाएं भी बदली हुई पाई गई हैं. अंतरिक्ष में छह महीने बीतने तक इन कोशिकाओं की कार्यकुशलता काफी घट जाती है.

हड्डियों और मांसपेशियों का क्षरण

छह महीने या उससे अधिक समय को ही वर्तमान में लंबा समय माना जाता है. जर्मनी की अंतरिक्ष अनुसंधान एजेंसी ‘डीएलआर’ के वैज्ञानिकों की मानें तो भारहीनता के शारीरिक प्रभाव अंतरिक्ष में पहुंचने के कुछ ही घंटों या दिनों में दिखने लगते हैं. क़रीब दो-तिहाई अंतरिक्षयात्री तथाकथित ‘स्पेस एडैप्टेशन सिन्ड्रोम’ (अंतरिक्ष अनुकूलन संलक्षण) से पीड़ित होते हैं. उन्हें मितली और उल्टी होने लगती है. ये परेशानियां तो दो-तीन दिन बाद दूर हो जाती हैं लेकिन हड्डियों और मांसपेशियों का क्षरण जारी रहता है. यह क्षरण पृथ्वी पर लौटने के चार सप्ताह बाद तक भी चलता रह सकता है.

अंतरिक्ष की भारहीनता वाली अवस्था में हड्डियों और मांसपेशियों के क्षरण का मुख्य कारण शरीर के कमर से ऊपरी हिस्से में रक्त सहित सभी तरल पदार्थों का अधिक जमाव और निचले हिस्से में अभाव है. उदाहरण के लिए, चेहरा इस तरह फूल जाता है, मानो सूज गया है. रक्त सहित अन्य तरल पदार्थ पैरों तक ठीक से पहुंच नहीं पाते. पैरों की मांसपेशियों का पर्याप्त उपयोग नहीं हो पाने से टांगें सिकुड़ कर पतली व कमज़ोर हो जाती हैं. अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन ‘आईएसएस’ पर जाने और वहां कई-कई महीने बिताने वाले अंतरिक्षयात्रियों को इसी कारण हर दिन कम से कम दो घंटे कई प्रकार के व्यायाम करने पड़ते हैं. तब भी इन समस्याओं को पूरी तरह टाला नहीं जा सकता.

शारीरिक कमज़ोरी

सन 2000 से कार्यरत अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन ‘आईएसएस’ पर लंबा समय बिताने के बाद जो अंतरिक्षयात्री पृथ्वी पर वापस लौटते हैं, वे शुरू-शुरू में अपने कैप्सूल से अपने आप न तो बाहर निकल पाते हैं और न अपने पैरों पर खड़े हो पाते हैं. उन की सहायता के लिए तैनात लोगों की पूरी एक टीम उनकी देखभाल करती है. लेकिन जो अंतरिक्षयात्री आठ-नौ महीनों की उड़ान के बाद पहली बार मंगल ग्रह पर पहुंचेंगे, उन्हें उन के यान से बाहर निकालने और अपने पैरों पर खड़ा होने में सहायता देने वाला वहां कोई नहीं होगा. उन्हें कुछ समय अपने यान में रहकर ही वहां के गुरत्वाकर्षण का अभ्यस्त बनना पड़ेगा. ग़नीमत है कि वहां उन्हें अपना शरीर पृथ्वी के अपने वज़न की अपेक्षा लगभग तीन गुना हल्का लगेगा. इससे बाद में उन्हें चलने-फिरने में विशेष कठिनाई नहीं होनी चाहिये.

मंगल ग्रह का वायुमंडल पृथ्वी के हमारे वायुंमंडल से सौ गुना विरल है और 96 प्रतिशत कार्बन डाईऑक्साइड (CO2) गैस का बना हुआ है - यानी सांस लेने के पूरी तरह अयोग्य ही नहीं, जानलेवा भी है. मंगल के प्रथम यात्रियों को सांस लेने के लिए ऑक्सीजन वाली हवा की पहली खेप पृथ्वी पर से अपने साथ ही ले जानी पड़ेगी और शुरू में उसी से अपना काम चलाना होगा.

बेहद ठंड और रेडियोधर्मी विकिरण

मंगल ग्रह हमारी पृथ्वी के तकरीबन आधे आकार का है और चंद्रमा की अपेक्षा औसतन एक हज़ार गुना अधिक दूर है. उसका गुरुत्वाकर्षण बल पृथ्वी की अपेक्षा केवल 38 प्रतिशत होने से हर चीज़ का वज़न वहां लगभग दो-तिहाई कम हो जाएगा. उदाहरण के लिए, पृथ्वी पर 30 किलो भारी चीज़ का वज़न वहां क़रीब साढ़े 10 किलो ही रह जाएगा. वहीं मंगल का एक दिन पृथ्वी के एक दिन से केवल 39 मिनट अधिक लंबा होता है, पर सूर्य से बहुत अधिक दूर होने और हवा बहुत ही विरल होने के कारण औसत तापमान शून्य से नीचे 60 डिग्री सेल्सियस है. सर्दियों में उसके ध्रुवों के पास तापमान ऋण 125 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है, जबकि गर्मियों में उसकी भूमध्यरेखा के पास 21 डिग्री सेल्सियस तक चढ़ भी सकता है.

मंगल की भीषण ठंड जैसी ही एक दूसरी बड़ी समस्या है उसका अपना कोई चुम्बकीय क्षेत्र न होना और उस पर सौर और ब्रह्मांडीय विकिरण (रेडिएशन) की अनवरत बौछार. ऐसी बौछार पृथ्वी पर हमें नहीं झेलनी पड़ती. पृथ्वी का अदृश्य चुम्बकीय क्षेत्र इस विकिरण, जो रेडियोधर्मी परमाण्विक विकिरण के समान ही कैंसर पैदा करने वाला ख़ररनाक विकिरण है, से हमें बचाने वाले छाते का काम करता है. हमारी आंखों का लेंस इस विकिरण के प्रति कुछ ज़्यादा ही संवेदनशील होने से वह मंगल के यात्रियों की आंखों में मोतियाबिंद का कारण भी बन सकता है. जर्मन अंतरिक्ष एजेंसी ‘डीएलआर’ के वैज्ञानिकों का मानना है कि यह विकिरण मनुष्य के डीएनए में भी विकार ला सकता है.

मस्तिष्क की बनावट में बदलाव

जर्मनी के ही म्युनिक विश्वविद्यालय के एक अध्ययन से यह बात सामने आई है कि मंगल ग्रह की यात्रा की तैयारी के तौर पर रूस के जिन अंतरिक्षयात्रियों ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन ‘आईएसएस’ पर छह महीने या उससे अधिक बिताए, उनके मस्तिष्क की बनावट कुछ इस तरह से बदल गई थी कि इस बदलाव को न तो जल्द ही दूर करना संभव था और न ही वह अपने आप दूर हो रही थी. डर यह है कि अंतरिक्षयात्रा जितनी ही लंबी होगी, मस्तिष्क की बनावट में ये बदलाव भी उतने ही बड़े होंगे.

देखा यह गया कि मस्तिष्क के भीतर मुख्यतः तंत्रिका तंतुओं (डेन्ड्राइट) के बने तथाकथित ‘वाइट मैटर’ और तंत्रिका कोशिकाओं (न्यूरॉन) के बने उसे घेरने वाले ‘ग्रे मैटर’ की मात्रा, अंतरिक्ष में लंबे प्रवास से घट जाती है. महामस्तिष्क (सेरेब्रम) के ग्रे-मैटर की घटी हुई मात्रा में रूसी अंतरिक्षयात्रियों के पृथ्वी पर लौटने के सात महीने बाद कुछ सुधार ज़रूर हुआ था, पर कमी पूरी नहीं हुई थी. दूसरी ओर तंत्रिका तंतुओं और तंत्रिका कोशिकाओं के बीच बफर का काम करने वाले ‘लिक़र’ नाम के तंत्रिकाद्रव की मात्रा भी बढ़ी हुई थी.

इसका अर्थ यह लगाया जा रहा है कि अंतरिक्ष की भारहीनता वाली अवस्था में लंबे समय तक रहने पर ‘वाइट’ और ‘ग्रे मैटर’ की मात्रा घटने से मस्तिष्क में जो रिक्त स्थान बनता है, वहां तंत्रिकाद्रव ‘लिक़र’ भर जाता है. पृथ्वी पर लौटने के बाद ‘लिक़र’ काफी कुछ लुप्त हो जाता है, पर उसके विलोप से मस्तिष्क सिकुड़ कर थोड़ा छोटा भी हो जाता है. मस्तिष्क में होने वाले ये बदलाव ‘मैग्नेट रेज़ोनैन्स टोमोग्राफ़’ (एमआरटी) की सहायता से दस रूसी अंतरिक्षयात्रियों के सिर स्कैन करने से सामने आए. उन्होंने अंतरिक्ष स्टेशन ‘आईएसएस’ पर औसतन 189 दिन बिताए थे, जबकि मंगल ग्रह की एकतरफ़ा यात्रा में ही औसतन 240 दिन तक लग सकते हैं.

जर्मन और रूसी वैज्ञानिक यह कहने की स्थिति में अभी नहीं हैं कि मस्तिष्क की बनावट और उसके आकार में देखे गए इन परिवर्तनों से अंतरिक्षयात्रियों की बौद्धिक कार्यक्षमता पर भी कोई असर पड़ता है या नहीं. पर, वे इस बात की पुष्टि ज़रूर करते हैं कि लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने के बाद जो अंतरिक्षयात्री वापस आते हैं, उनकी आंखें पहले जितना साफ़ नहीं देख पातीं. उनकी नजर कमजोर हो जाती है. अनुमान है कि ‘लिक़र’ कहलाने वाला तंत्रिकाद्रव ही शायद इसके लिए भी ज़िम्मेदार है. हो सकता है कि अंतरिक्ष में प्रवास के समय जब उसकी मात्रा बढ़ जाती है, तब आंख के दृष्टिपटल (रेटिना) और दृष्टि तंत्रिका (ऑप्टिक नर्व) पर पड़ने वाला दबाव भी बढ़ जाता हो, इसलिए साफ़ दिखाई पड़ना कम हो जाता है.

सिरदर्द और कम दिखाई पड़ना

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ की इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जो अमेरिकी अंतरिक्षयात्री ‘आईएसएस’ पर छह महीने से अधिक समय बिताने के बाद वापस आए और 50 वर्ष से अधिक आयु के थे, उनकी नेत्रज्योति समय के साथ घटती गई थी. वे सिरदर्द और कम दिखाई पड़ने की शिकायत करते थे. अमेरिकी विशेषज्ञों का भी यही अनुमान है कि ऐसा आंखों के भीतर बढ़ गए दबाव के कारण हुआ होगा. यह भी देखा गया कि उनके मस्तिष्क की मध्यवर्ती दरार (सल्कस सेन्ट्रालिस) तंग हो थी. यदि तकनीकी बातों को दरकिनार कर दें, तब भी अब तक ज्ञात ये शारीरिक समस्याएं ही इतनी गंभीर हैं कि मंगल ग्रह की यात्रा एक विकट चुनौती बन जाती है. अब तक जो बातें सामने आई हैं, बहुत संभव है कि वे अंतिम या पूरी सच न हों.

मंगल ग्रह की यात्रा में लगने वाले समय को क्रांतिकारी ढंग से घटाने वाली क्रांतिकारी प्रौद्योगिकी जब तक विकसित नहीं हो जाती, तब तक वहां जाना स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर जोखिम बना रहेगा. स्वास्थ्य को जहां तक सौर और ब्रह्मांडीय रेडियोधर्मी विकिरण से ख़तरे का प्रश्न है, तो इसे अंतरिक्षयान की बाहरी दीवार और अंतरिक्षयात्रियों के लिए विशेष प्रकार की पोशाकों से कम किया जा सकता है. जर्मन अंतरिक्ष एजेंसी ‘डीएलआर’ ने ऐसी ही एक पोशाक तैयार की है. परीक्षण के तौर पर उसे, कई प्रकार के संवेदकों (सेंसरों) से लैस मनुष्यों जैसे दो पुतलों को पहनाकर, एक नये अमेरिकी अंतरिक्षयान ‘ओरायन’ के साथ 2020 में चंद्रमा पर भेजा जाएगा. इन दो में से एक पुतले को इजरायल में विकसित एक विकिरणरक्षक जैकेट भी पहनाई जाएगी.

मंगल के वायुमंडल में 96 प्रतिशत कार्बन डाईऑक्साइड है

प्रथम मंगल-गामी यात्री यदि अमेरिका के हुए तो वे अपने साथ ‘मॉक्सी’ (एमओएक्सआईई) नाम का या उसी के जैसा कोई ऐसा उपकरण ले जाएंगे जो वहां के वायुमंडल से कार्बन डाईऑक्साइड वाली हवा को खींचकर उससे सांस लेने लायक ऑक्सीजन बनाएगा. मंगल के वायुमंडल में 96 प्रतिशत कार्बन डाईऑक्साइड होने का एक अर्थ यह भी है कि वहां की 78 प्रतिशत ऑक्सीजन, कार्बन डाईऑक्साइड के रूप में बंधी हुई है. यानी भविष्य में वही शुद्ध ऑक्सीजन पाने का सबसे बड़ा स्रोत भी है. ‘नासा’ की एक योजना 2020 में वहां एक ऐसा रोवर भेजने की है जो ‘मॉक्सी’ वाली विधि से ही इतनी ऑक्सीजन बनाएगा कि एक आदमी अनिश्चित काल तक उसकी सांस लेकर जी सके. पर मंगल पर एक नहीं, कई लोगों को एकसाथ भेजना पड़ेगा.

अगस्त 2012 से मंगल की ज़मीन पर घूम-फिर रहे ‘नासा’ के ‘क्यूरिय़ॉसिटी’ रोवर ने वहां काफी मात्रा में ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन, गंधक और फ़ॉस्फ़ोरस होने का पता लगाया है. उसे जटिल क़िस्म के कार्बनिक अणु भी मिले हैं, हालांकि ठीक इस समय वहां बैक्टीरिया आदि के रूप में किसी जीवन के संकेत नहीं मिले हैं. ‘नासा’ के वैज्ञानिकों का कहना है कि तस्वीरों में मंगल भले ही सूखे मरुस्थल जैसा दिखता हो, उसकी मिट्टी के नीचे कुछ ही गहराई पर 60 प्रतिशत तक बर्फीला पानी है. उसके बहुत से क्रेटरों में भी जमी हुई बर्फ के रूप में पानी संचित है. यदि उसके ध्रुवों की बर्फ को ही पिघलाया जा सके, तो अकेले उसी से ग्रह का अधिकतर हिस्सा 10 मीटर तक पानी में डूब जायेगा. वहां के पानी से खाने लायक जलवनस्पतियों को उगाया जा सकता है.

ध्रुवों पर जमी बर्फीली कार्बन डाईऑक्साइड को पिघलाना होगा

मंगल ग्रह के वायुंमडल में 96 प्रतिशत तक कार्बन डाईऑक्साइड होने के बावजूद वहां पृथ्वी जैसा गर्माहट बनाए रखने वाला ग्रीन हाउस प्रभाव नहीं पैदा होता. ऐसा इसलिए है, क्योंकि वह सूर्य से, पृथ्वी की अपेक्षा, कम से कम पांच करोड़ किलोमीटर अधिक दूर है और उसके वायुमंडल में हवा का घनत्व पृथ्वी के सौवें हिस्से के ही बराबर है. इसी कारण वहां भयंकर ठंड पड़ती है.

वहां यदि मनुष्यों की बस्तियां बसानी हैं तो ग्रह का तापमान बढ़ाने के उपाय भी सोचने होंगे. एक सुझाव यह है कि वहां ऐसे विशालकाय सौर-दर्पण बनाए जाएं जो सूर्यप्रकाश को उसके ध्रुवों पर केंद्रित करते हुए ध्रुवों पर जमी हुई कार्बन डाईऑक्साइड को पिघला कर गैस बनाए. इससे उसके वायुमंडल में हवा का घनत्व और वायुपरत की मोटाई बढ़ेगी. तब वहां भी पृथ्वी पर तापमान बढ़ाने वाले ग्रीन हाउस प्रभाव पैदा होगा और तापमान लगातार बढ़ने लगेगा. एक अनुमान के अनुसार, ऐसा यदि हो सके तो 20 साल के अंदर तापमान बढ़ना शुरू हो जायेगा. ठीक इस समय भी मंगल की भूमध्यरेखा पर वहां की गर्मियों में दिन का तापमान शून्य से 21 डिग्री ऊपर चला जाता है, हालांकि रात में शून्य से इतना ही नीचे भी गिर जाता है.

मंगल पर कहां रहा जा सकता है

जहां तक मंगल पर रहने की सुविधाओं का प्रश्न है तो वहां पहुंचने वाले मंगलगामियों को आरंभ में तो अपने यानों में ही टिकना और ऐसे अंतरिक्ष-सूट पहने रहना होगा जो हर प्रकार के विकिरण से सुरक्षा प्रदान करते हों. वे अपने साथ हवा भर कर फुलाने लायक ऐसे घर या टेंट भी ले जा सकते हैं, जिनमें एकसमान वायुदाब बना रहे और जो विकिरण से भी बचाएं. लेकिन जल्द ही उन्हें ऐसी गुफाएं-कंदराएं ढूंढनी पड़ेंगी, जो उन्हें सौर एवं ब्रह्मांडीय विकिरण से अधिक सुरक्षा प्रदान करती हों.

‘नासा’ का कहना है कि मंगल ग्रह की मिट्टी ईंटें बनाने के लिए लगभग आदर्श मिट्टी है. इस मिट्टी में पॉलिमर प्लास्टिक मिलाकर और उसे माइक्रोवेव ओवन में पकाकर मनचाहे आकार की ईंटें बनाई जा सकती हैं और उन्हें जोड़कर घर भी बनाए जा सकते हैं. वैसे, संभावना यही है कि देर-सवेर सबको भूमिगत आवासों में रहना पड़ेगा.

वायुदबाव की कमी

पृथ्वी पर हमारे ऊपर हर समय क़रीब सात किलोग्राम के बराबर वायुमंडलीय दबाव रहता है. मंगल ग्रह पर वह नहीं के बराबर होगा. इसलिए अंतरिक्षयात्रियों की तरह वहां सिर से पैर तक ऐसे सूट पहने रहना होगा, जो वायुमंडलीय दबाव की कमी को पूरा करें. ऐसे सूट अभी से डिज़ाइन कर लिये गए हैं. समझा जाता है कि वहां के ध्रुवों के पास इस समय जमी हुई कार्बन डाईऑक्साइड को पिघला लेने पर वहां भी 2.3 किलोग्राम के बराबर वायुमंडलीय दबाव बन सकता है, जो जीवित रहने के लिए पर्याप्त होना चाहिये. पर वहां एक ऐसा वायुमंडल बनने में जो सांस लेने लायक भी हो, एक हज़ार से अधिक वर्ष लग सकते हैं.

हालांकि कहा जाता है मनुष्य परिस्थितियों के अनुसार अपने आप को ढालने में हमेशा माहिर रहा है. पाषाणयुग से चलकर आज के इलेक्ट्रॉनिक युग तक की हमारी विकास यात्रा इसकी गवाह है. इस लंबी यात्रा में हमारे जीन भी बदले हैं. जीवविज्ञान यदि हमें अपने जीनों को भी वश में करने की क्षमता दे पाया है, तो वह हमें मंगल ग्रह और दूसरे ग्रहों पर रहने की क्षमता भी प्रदान कर सकता है.