इस पुस्तक के अध्याय ‘मन की बात’ का एक अंश -

‘मैं शायद अपनी मां जैसी कुर्बान मां न बन पाऊं, या शायद मैं बनना ही नहीं चाहती. मैं न तो व्यस्त होना चाहती हूं कि अपने बच्चों को भूल जाऊं और न ही उतना अभ्यस्त होना चाहती हूं कि खुद को भूल जाऊं. दोनों के बीच का रास्ता निकालना चाहती हूं. मैं चाहती हूं कि अपने बच्चों की ज़िन्दगी के साथ-साथ मैं अपनी ज़िन्दगी भी भरपूर जियूं. मैं वो सब करूं जो मैं अपने लिए करना चाहती हूं. दुनिया घूमूं, लिखूं, पढूं या वो हर काम जो मैं करना चाहूं. लेकिन क्या वाकई में अपने लिए जीने का मतलब है कि अपने बच्चे को अनदेखा कर देना? क्या हम साथ-साथ नहीं चल सकते?

क्या सिर्फ समर्पण और ज़िम्मेदारी से पूरी तरह बायकॉट दो ही रास्ते हैं? क्या कोई बीच का रास्ता नहीं है? जिसमें मैं और मेरा बच्चा एक साथ बड़े हों. जहां उसे मेरी ज़रूरत हो वहां मैं उसके साथ हूं, और जहां मुझे उसकी जरूरत हो वहां वो मेरे साथ.


पुस्तक : मैं से मां तक

लेखिका : अंकिता जैन

प्रकाशन : राजपाल

कीमत : 175 रुपए


खास भारत के संदर्भ में बात करें तो यहां आज भी लड़कियों के जीवन का पहला स्वाभाविक लक्ष्य शादी करना माना जाता है. उसी कड़ी में उनका दूसरा लक्ष्य मां बन जाना होता है. ‘बच्चे पैदा करने की चाहत’ जैसी कोई सोच या सवाल अभी हमारे समाज का हिस्सा दूर-दूर तक नहीं है. बल्कि स्थिति यह है कि बच्चे पैदा करने के बाद ही हमारे यहां शादी का सामाजिक रजिस्ट्रेशन हुआ माना जाता है. हर एक घर-परिवार की महिलाएं मां बनती हैं, लेकिन न तो वे मां बनने से जुड़े सवालों, दिक्कतों, विकल्पों के बारे में बहुत ज्यादा सोचती हैं और न ही उस पर खुलकर बात ही करती हैं. यह किताब वर्तमान में मां बनने से जुड़ी चुनौतियों, उलझनों और सवालों पर बात करते हुए एक मां के अंर्तमन में झांकने की ईमानदार सी कोशिश करती है.

बेटे की चाहत ने कितनी मांओं से उनका मातृत्व सुख छीना है, इस बात का सही-सही अंदाजा तो खुद उस सुख से वंचित रहने वाली मांओं को भी ठीक से नहीं होगा. शहरी, ग्रामीण, शिक्षित, अशिक्षित हर एक तबके में बेटे के जन्म की चाहत गहरे तक दबी है. यह चाहत हर एक गर्भवती स्त्री और बेटियों की मां के लिए अभिशाप बन जाती है. इस किताब की लेखिका देश के अलग-अलग हिस्सों में हुए बेटे की अंधी चाह से जुड़े अनुभव को बांटते हुए लिखती हैं –

‘मैं अपनी अब तक की ज़िन्दगी में दिल्ली, पुणे जैसे मैट्रो शहरों में रही. भोपाल, इंदौर जैसे थ्री-टायर शहरों में रही, गुना जैसे छोटे ज़िलों में रही और भांती, ईसागढ़, खनियाधाना जैसे बहुत छोटे गांवों में भी रही. लेकिन ‘एक बेटे की चाहत’ में मुझे कहीं कोई खास बदलाव नज़र नहीं आया. हां, बड़े शहरों में लोगों ने स्टैण्डर्ड, एजुकेशन, ब्रांड्स की एक चादर ज़रूर ओढ़ रखी है, लेकिन उस चादर के पीछे अभी भी बहुत कुछ पुराना, सड़ा हुआ और दकियानूसी सोच बाकी है.’

हमारे समाज में लिंगभेद की जड़ें इतनी गहरी हैं कि उसकी छाप सभी संस्थाओं, मान्यताओं, सोच-विचार और व्यवहार में स्पष्ट देखी जा सकती है. बेटियों की मांओं को हमारे यहां बेटे की मांओं से हमेशा कमतर समझा गया है. बेटी को जन्म देने के कारण उन्हें बहुत जगहों पर कई किस्म की उपेक्षा से गुजरना होता है. यहां तक कि सिर्फ बेटियों को जन्म देने वाली मांओं की लड़कियों को आसानी से कोई अपनी बहू भी नहीं बनाना चाहता. इसके पीछे की दलील यह है कि यदि लड़की की मां ने बेटे को जन्म नहीं दिया, तो फिर उनकी लड़की भी बेटे को जन्म देने में सक्षम नहीं होगी! आज के शिक्षित और वैज्ञानिक युग में भी ऐसी घोर अतार्किक बातों के प्रचलित होने का उदाहरण देते हुए अंकिता लिखती हैं –

‘एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले लड़के के पिता, जो खुद एक पढ़े-लिखे व्यक्ति थे, नौकरीपेशा थे, उन्होंने मेरे लिए न कर दिया था. कारण था, ‘क्योंकि मेरी मां का कोई बेटा नहीं है’, इसलिए शायद मैं भी कभी बेटे को जन्म न दे पाऊं...अफसोस इस बात का था कि वैसे सिर्फ़ वे अकेले नहीं थे. उनके बाद दो-चार और भी ऐसे रिश्ते आये जिन्होंने बाद में यह कहकर मना किया कि ‘मेरा कोई भाई नहीं, जिसकी वजह से भविष्य में मेरे मां-बाप की ज़िम्मेदारी मुझे उठानी होगी.’

अंकिता जैन की यह किताब मां बनने के उनके निजी अनुभवों के साथ-साथ दूसरी महिलाओं के मातृत्व संबंधी विचारों, सोच, दिक्कतों पर भी बात करती है. हालांकि मां के तौर पर एक जागरूक और कामकाजी महिला के मातृत्व संबंधी सवालों और चुनौतियों पर वे बहुत व्यापकता से बात नहीं करतीं. मां बनने के दौरान पति की मदद कदम-कदम पर कितनी जरूरी और मददगार साबित होती है, इस बारे में लेखिका के अनुभव पढ़ते हुए कुछ-कुछ आत्मालाप से गुजरने जैसा पाठकों को महसूस होता है. मां बनने के बहाने लेखिका गरीब मांओं, कामकाजी मांओं और ग्रामीण मांओं के मातृत्व से जुड़े सवालों-मुश्किलों पर भी बहुत विस्तार से बात नहीं करतीं. हां, लेकिन शहरी मांओं से जुड़ी परिवार की अपेक्षाओं, बेटियों की मांओं की मुश्किलों, मां बनने की मानसिक जद्दोजहद, मां बनने से जुड़े टोटकों और दिक्कतों पर वे संवेदी चर्चा करती हैं.

अपने सहयोगी पति के साथ के कारण लेखिका का ध्यान इस बात पर ज्यादा महसूस होता है कि पिता को भी बच्चे के साथ आने वाले नए परिवर्तनों में सहयोग की जरूरत होती है. लेकिन गर्भावस्था और मां बनने के बाद पिताओं को कितनी बारीकी से मांओं की कदम-कदम पर क्या, कैसी और कितनी मदद करनी चाहिए, इस बारे में वे कुछ ज्यादा नहीं कहतीं. कुल मिलाकर यह किताब मातृत्व से जुड़े अनुभवों पर एक मां की मानसिक और भावनात्मक यात्रा का सीधा-सादा वृत्तांत है.