‘मुझे खुशी है इस बात की कि एक बार फिर सीबीआई से मिलने का मौका मिलेगा. पहले कांग्रेस ने सीबीआई से मिलने का मौका दिया था. इस बार भाजपा के लोग मिलने का मौका दे रहे हैं.’

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का यह बयान बीते रविवार को आया. हालांकि जिस खुशी की वे बात कर रहे थे वह उनके चेहरे पर कहीं दिख नहीं रही थी. दरअसल इससे पहले खबरें आई थीं कि अवैध खनन के मामले में आइएएस बी चंद्रकला के साथ 11 लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने के बाद सीबीआई अब अखिलेश यादव से भी पूछताछ कर सकती है. उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री के पास 2012-13 में खनन मंत्रालय का भी प्रभार था.

उधर, भाजपा ने अखिलेश यादव पर हमला बोला है. पार्टी नेता और उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने कहा है कि पूर्व सीएम के रिश्ते खनन माफिया से रहे हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि पूर्व सीएम छापामारी के समय पर सवाल न उठाएं, ये बताएं कि करोड़ों की लूट क्यों हुई?

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के आने से पहले के 12-13 वर्षों में नदियों की बालू और मौरंग ने मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, नेताओं, नौकरशाहों और छोटे-बड़े स्तर के दलालों तक को मालामाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. नदियों के पर्यावरण को तबाह करने वाले इस अवैध और काले कारोबार ने किसी बीपीएल कार्ड धारक को बीएमडब्ल्यू कार में चलने वाला बना दिया तो कोई उससे भी ऊपर लैंबाॅर्गिनी वाला हो गया.

पहले की सरकारों में भी यह काला धंधा होता तो था. मगर तब ठेकेदार और छुटभैये नेता ही इसमें शामिल हुआ करते थे. मायावती सरकार में यह परवान चढ़ा और बाबू सिंह कुशवाहा तथा नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे प्रभावशाली मंत्रियों तक के इससे जुड़े होने के किस्से सामने आने लगे. फिर जब अखिलेश यादव की सत्ता आई तो खनन का यह अवैध कारोबार मुख्यधारा का धंधा बन गया.

शुरुआत में खनन महकमा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पास ही था. जल्द ही गायत्री प्रसाद प्रजापति को यह विभाग मिला और उसके बाद से यह काला धंधा एक ऐसा संगठित कारोबार बन गया जिसे सरकार में सबसे ऊपर बैठे महानुभावों का पूरा संरक्षण था. चर्चाएं तो यहां तक थीं कि विधानसभा चुनाव से पूर्व यादव कुनबे में जो विवाद भड़के थे उनके पीछे भी खनन मंत्री गायत्री प्रसाद के संरक्षण में चल रहा अवैध खनन एक प्रमुख वजह थी.

मायावती और अखिलेश यादव की सरकारों में खनन मंत्री रहे बाबू सिंह कुशवाहा और गायत्री प्रसाद इस समय अलग-अलग आरोपों में जेल में हैं. लेकिन जैसे ही सीबीआई ने अवैध खनन के खिलाफ हमीरपुर की डीएम रहीं आईएएस अधिकारी बी चंद्रकला, समाजवादी पार्टी के एमएलसी रमेश मिश्र सहित 11 लोगों के ठिकानों पर छापामारी शुरू की तो इससे जुड़े रहे लोगों में भय का संचार हो गया. यहां तक कि समाजवादी पार्टी के मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इन छापों को अपनी गठबंधन की राजनीति से जोड़ दिया.

‘उत्तर प्रदेश में भाजपा विरोधी किसी भी प्रकार का गठबंधन न हो पाए इसलिए केंद्र की मोदी सरकार मुझ पर सीबीआई द्वारा छापामारी करवा रही है. पहले यूपीए के कार्यकाल में कांग्रेस ने सीबीआई से मुलाकात कराई थी और अब केन्द्र की एनडीए सरकार सीबीआई से मुलाकात करवा रही है.’

इसके बाद, हमीरपुर में अवैध तरीके से खनन के पट्टे देने से जुड़े इस मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया. पूर्व पुलिस अधिकारी राजेश राय पूछते हैं, ‘अभी तक की जांच में सीबीआई ने अखिलेश यादव के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं किया है. फिर अगर उनसे सीबीआई पूछताछ करती भी है तो इससे गठबंधन पर क्या फर्क पड़ने वाला है? क्या अखिलेश यादव को इस बात का डर है कि उन्होंने कोई ऐसी गड़बड़ की है जिसके लिए उन्हें कटघरे में खड़ा किया जा सकता है!’

राजेश राय के सवाल का जवाब इस प्रकरण की पृष्ठभूमि से ही ढूढ़ा जा सकता है.

अखिलेश यादव की सरकार आने के बाद उत्तर प्रदेश में जब सारे-नियम कानूनों को ताक पर रख कर खुलेआम खनन का अवैध करोबार होने लगा तो पर्यावरण की चिंता करने वाले लोगों ने इसकी शिकायत राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण यानी एनजीटी में की. एनजीटी ने जांच के बाद अवैध खनन तत्काल बंद करने के आदेश जारी कर दिए और राज्य सरकार से खनन नीति बनाने के लिए भी कहा. जब अखिलेश यादव की सरकार ने इस पर अमल नहीं किया तो पर्यावरण से जुड़े संगठनों ने इस पर इलाहाबाद हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की. 2013 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खनन के सभी नए आवेदनों की मंजूरी पर रोक लगा दी और अवैध खनन की सीबीआई जांच के आदेश दे दिए. अखिलेश सरकार इसके विरोध में सुप्रीम कोर्ट चली गई मगर उसे वहां से कोई राहत नहीं मिली.

इस बीच एक जनहित याचिका के जरिये यह मामला फिर से हाई कोर्ट में पहुंच गया और 15 अक्टूबर, 2015 को उसने उत्तर प्रदेश में नदियों से खनन के सारे पट्टे रद्द कर दिए. राज्य सरकार के यह दलील देने पर कि प्रदेश में कहीं भी अवैध खनन नहीं हो रहा है, हाई कोर्ट ने सैटेलाइट मैपिंग के जरिए इसकी जांच करने को कहा. जब अखिलेश सरकार ने ऐसा करने में असमर्थता जाहिर की तो उसने आठ जिलों में अवैध खनन के मामलों की सीबीआई जांच के आदेश जारी कर दिए. यह जांच उसकी निगरानी में ही की जानी थी. हाई कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में यह भी कहा कि ‘सरकार इस मुद्दे पर अदालत की आंखों में धूल झोंकने का काम कर रही है.’

इसके बाद सीबीआई ने 2016 में सात मामलों में प्रारंभिक जांच शुरू की थी. अब तक दो जिलों - कौशांबी और बांदा - में अवैध खनन से जुड़े मामलों में खनन अधिकारियों समेत 40 से अधिक लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बाद चार्ज शीट भी दायर हो गई हैं.

अब अगर अखिलेश यादव की सरकार के एनजीटी और हाईकोर्ट में बर्ताव को अगर उनके इस कथन के साथ रखें कि ‘अब केन्द्र की एनडीए सरकार सीबीआई से मुलाकात करवा रही है’ तो इससे उनके डर को लेकर कुछ संकेत तो मिलते ही हैं. इसके अलावा अवैध खनन की आरोपित आईएएस अधिकारी बी चन्द्रकला पर अखिलेश सरकार की मेहरबानी के बारे में सबको पता है. अप्रैल 2016 में उन्होंने अपने साथ सेल्फी लेने के लिए बुलंदशहर के एक युवक को जेल भिजवा दिया था. तब इस मामले में हाऊ कोर्ट में चंद्रकला का बचाव करते हुए अखिलेश सरकार ने उन्हें एक शानदार अफसर बताया था. तब उसने जनहित याचिका दायर करने वाले पर बदनीयती का आरोप भी लगाया था.

खनन के दूसरे बड़े खिलाड़ी गायत्री प्रजापति को बचाने के लिए तो अखिलेश यादव किसी भी हद तक जाने को तैयार थे. खनन के मामले में लोकायुक्त से उनकी शिकायत करने वालीं नूतन ठाकुर से समाजवादी कुनबा इतना कुपित था कि खुद मुलायम सिंह यादव ने उनके आईपीएस पति अमिताभ ठाकुर को फोन पर धमकी दी थी. इस मामले में मुलायम सिंह यादव के खिलाफ जांच जारी है.

अखिलेश यादव सरकार के कार्यकाल में ही हाई कोर्ट के कड़े रुख के कारण ये चर्चाएं होने लगी थीं कि घोटाले की आंच खनन मंत्री गायत्री प्रजापित तक ही नहीं, बल्कि सचिवालय में तैनात एक शक्तिशाली महिला अफसर सहित मुलायम सिंह के कुनबे तक भी पहुंच सकती है. शायद इसी वजह से अखिलेश सरकार सीबीआई जांच न कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई थी.

अवैध खनन के कारोबार की विशालता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 2014 में जब लोकायुक्त जस्टिस एनके मेहरोत्रा ने इसकी जांच की थी तो उन्हें एक जिले से हर माह डेढ़ सौ करोड़ से अधिक का अवैध खनन होने के प्रमाण मिले थे. इसके मुताबिक खनन के काले कारोबार में नेता, अफसर, पत्रकार और भूमाफिया बाकायदा सिंडिकेट बना कर काली कमाई कर रहे थे. इस जांच में मौजूद जानकारी के अनुसार हमीरपुर के 38 खनन पट्टों में कुल 2200 एकड़ क्षेत्रफल पर खनन किया रहा था. प्रति वर्ष इससे करीब 1300 करोड़ रुपये सरकारी खजाने में आने चाहिए थे. लेेकिन तीन साल में सरकार को इससे सिर्फ 450 करोड़ रुपये ही मिले. खनन रॉयल्टी की बाकी की रकम - 3450 करोड़ रुपये - सिंडिकेट के हिस्सेदारों में बंट रही थी.

कैग ने 2011 में सिर्फ बुंदेलखंड में खनिज रायल्टी के रूप में 258 करोड़ की राजस्व चोरी और वन विभाग के राजस्व में 300 करोड़ की हानि पकड़ी थी. इसी तरह 24 जुलाई 2018 को एनजीटी ने गोंडा की तरबगंज तहसील में हुए अवैध खनन के आरोपितो पर 212 करोड़ का जुर्माना लगाया था. इसमें 119 करोड़ रुपये पर्यावरण क्षति पूर्ति के लिए थे.

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में खनन भी एक बड़ा मुद्दा बना था. इसलिए सरकार बनने के बाद हाई कोर्ट के निर्देश पर अमल करते हुए योगी सरकार ने उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की अध्यक्षता में तीन मंत्रियों की एक समिति बनाई थी. इसकी सिफारिशों के आधार पर 30 मई, 2017 को प्रदेश की नई खनन नीति की घोषणा की गई. इसके बाद भी अवैध खनन पर कुछ हद तक ही रोक लग सकी है. अब अगर सीबीआई जांच निष्पक्षता से होती है और उसके जाल में बड़ी मछलियां भी फंसती हैं तो अवैध खनन के इस काले धंधे पर काफी हद तक रोक लगने की उम्मीद की जा सकती है.