केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला किया है. इस प्रस्ताव को केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी मिल गई है. मोदी सरकार के प्रस्ताव के मुताबिक आठ लाख रुपये से कम के सालाना आमदनी वाले अगड़ी जातियों के लोगों को केंद्र सरकार की नौकरियों और केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में आरक्षण का लाभ मिल पाएगा. यह आरक्षण पहले से आरक्षण के लिए तय अधिकतम 50 फीसदी की सीमा के अतिरिक्त होगा. यही वजह है कि इस फैसले को लागू करने के लिए संविधान संशोधन करना होगा. खबरें हैं इसके लिए मोदी सरकार संसद में संविधान संशोधन विधेयक पेश करने वाली है.

मोदी सरकार के इस फैसले की व्याख्या अलग-अलग ढंग से हो रही है. सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की ओर से इसे सबका साथ, सबका विकास की ओर बढ़ा हुआ एक मजबूत कदम माना जा रहा है. कहा जा रहा है कि यह सरकार अगड़ी जातियों के गरीबों के कल्याण के लिए भी प्रतिबद्ध है. वहीं विपक्ष और स्वतंत्र राजनीतिक विश्लेषक केंद्र सरकार के इस फैसले को 2019 लोकसभा चुनावों से जोड़कर देख रहे हैं. सरकार के इस फैसले का आलोचना करते हुए ये लोग जो कह रहे हैं, उसका सार यह है कि मोदी सरकार के लिए इस आरक्षण को लागू करना असंभव जैसा है.

आम तौर पर कैबिनेट की बैठक बुधवार को होती है. लेकिन यह निर्णय सोमवार को बैठक बुलाकर लिया गया. वह भी तब मंगलवार को संसद सत्र का आखिरी दिन है. ऐसे में अगर मंगलवार को केंद्र सरकार संविधान संशोधन विधेयक सदन में पेश भी कर दे तो यह पारित नहीं हो पाएगा. दूसरी अड़चन यह है कि लोकसभा में सरकार के पास बहुमत है लेकिन, राज्यसभा में उसके पास बहुमत नहीं है. इसलिए सरकार के इस प्रस्ताव का संसद से पारित होना मुश्किल लग रहा है. इस फैसले को लागू करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में संशोधन करना होगा.

इसके बाद एक और बड़ी अड़चन न्यायपालिका की है. पहले भी कई बार सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा है कि आरक्षण 50 फीसदी की सीमा से अधिक नहीं होनी चाहिए. ऐसे में माना यह जा रहा है कि अगर संसद से सरकार का यह प्रस्ताव पारित भी हो जाए तो न्यायपालिका से इसे मंजूरी नहीं मिलेगी. संविधान और कानून को जानने-समझने वाले लोग यह कह रहे हैं कि आरक्षण के मसले पर कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा है, उसके आधार पर इस प्रस्ताव का अदालती परीक्षण में पास होना असंभव सरीखा है. यानी थोड़ा हल्के-फुल्के अंदाज में कहें तो सवर्णों को यह आरक्षण मिलना हर नागरिक के खाते में 15 लाख रु आने से कम मुश्किल नहीं है

ऐसे में कहा यह जा रहा है कि हालिया विधानसभा चुनावों में अगड़ी जातियों के गुस्से की शिकार हुई भाजपा ने उन्हें अपने पाले में वापस लाने के लिए यह दांव चला है. अगड़ी जातियां संसद के रास्ते सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को पलटने की वजह से मोदी सरकार से नाराज बताई जा रही हैं. इस फैसले में शीर्ष अदालत ने एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज होने पर फौरन गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी.

सवर्णों को आरक्षण देने के दांव से भाजपा को अगले लोकसभा चुनावों में कितना फायदा होगा, यह तो चुनावों के दौरान ही पता चलेगा. लेकिन इस पैसले की राह में खड़ी अड़चनों को देखते हुए इतना तय है कि निकट भविष्य में इसका लागू हो पाना संभव नहीं है.