राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया और भाजपा का शीर्ष नेतृत्व एक बार फिर आमने-सामने होते दिख रहे हैं. इस बार वजह बना है राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष का पद. विधानसभा चुनाव के नतीजे आए एक महीना हो चुका है, लेकिन गतिरोध जारी है.

हाल ही में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में हुए विधानसभा चुनावों में शिकस्त मिलने के बाद पार्टी आलाकमान ने इन तीनों राज्यों के मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह और वसुंधरा राजे को केंद्र में बुलाने का मन बना लिया था. इस बात का सीधा मतलब था कि इन तीनों को उनके राज्य में नेता प्रतिपक्ष पद की जिम्मेदारी नहीं सौंपी जाएगी. पिछले सप्ताह हुई पार्टी की संसदीय बोर्ड की बैठक में इस फैसले पर मुहर भी लगा दी गई.

विश्लेषकों ने इस पूरी उठापटक को संगठन में शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह और वसुंधरा राजे का कद छांटे जाने की कवायद से जोड़कर देखा. मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा हाईकमान अपनी पसंद के नेता प्रतिपक्ष चुनकर अपनी इस मुहिम में सफल होता नज़र भी आया. लेकिन राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया थीं सो पेंच फंसना था और फंस ही गया.

सूत्रों की मानें तो वसुंधरा राजे सिंधिया राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी खुद संभालना चाहती हैं और ऐसा न होने की स्थिति में वे ज़ाहिर तौर पर अपने किसी विश्वस्त को इस पद पर बिठाना चाहेंगी. उनके लिए इस बार यह पद इसलिए भी अहम हो गया है कि उनके पूरे कार्यकाल में शीर्ष नेतृत्व से उनके रिश्ते कुछ खास नहीं रहे. ऐसे में जानकार आशंका जताते हैं कि यदि एक बार वसुंधरा राजे के पैर राजस्थान से उखड़ गए तो उन्हें प्रदेश में वापसी का मौका नहीं मिलेगा.

दूसरी तरफ पार्टी हाईकमान या सीधे कहें तो अमित शाह ने इस पद के लिए अपने पसंदीदा नेताओं की फेहरिस्त तैयार कर ली. इसमें पूर्व गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया का नाम प्रमुखता से शामिल है. लेकिन सूत्रों का कहना है कि वसुंधरा राजे को इस सूची का कोई नाम मंजूर नहीं. नतीजा यह है कि प्रदेश में नई सरकार बनने के करीब तीन सप्ताह गुज़रने और विधानसभा के पहले सत्र में हफ्ते भर का समय बचने के बावजूद राजस्थान में भाजपा अपने विधायक दल का मुखिया नहीं चुन पाई है. फिलहाल इस विवाद को सुलझाने का जिम्मा केंद्रीय वित्त मंती अरुण जेटली और प्रदेश प्रभारी अविनाश राय खन्ना को सौंपा गया है.

वसुंधरा राजे और हाईकमान के बीच रस्साकशी में कौन भारी पड़ेगा, इसे लेकर राजस्थान के राजनीतिकारों की राय पूर्व मुख्यमंत्री के पक्ष में जाती दिखती है. प्रदेश के अधिकतर वरिष्ठ पत्रकार इस बारे में एकमत होकर कहते हैं कि भाजपा के 73 विधायकों में से कुछेक को छोड़ बाकी सभी वसुंधरा राजे के साथ हैं. ऐसे में पूरी संभावना है कि इस मामले में अमित शाह को मन मसोस कर रहना पड़ेगा.

लेकिन यह पहली बार नहीं होगा जब अमित शाह ने राजस्थान के मामले में टांग फंसाकर अपनी किरकरी करवाई. इसकी ताजा बानगी के तौर पर विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण और पिछले साल पार्टी प्रदेशाध्यक्ष के चयन को देखा जा सकता है. जानकारों के मुताबिक इससे पहले अमित शाह को पिछले साढ़े चार साल में तब भी हर बार कदम पीछे हटाने पड़े, जब-जब वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री पद से हटाने की उनकी कोशिशों ने जमकर सुर्ख़ियां बटोरीं.

वैसे, अमित शाह भाजपा के इकलौते राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं हैं जिन्हें वसुंधरा राजे की वजह से असहजता की स्थिति का सामना करना पड़ा है. इस बार की तरह 2008 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा को राजस्थान की सत्ता से बेदखल होना पड़ा था. फिर 2009 के लोकसभा चुनाव में भी पार्टी सूबे में कुछ खास करने में असफल रही. तब वसुंधरा राजे राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष थीं. प्रदेश संगठन के लचर प्रदर्शन ने उनकी नेतृत्व क्षमता को कटघरे में ला खड़ा किया था. लेकिन वसुंधरा राजे ने इसका ठीकरा प्रदेशाध्यक्ष ओम माथुर और अपनी ही पसंद के संगठन मंत्री प्रकाश चंद के सर फोड़ दिया.

नतीजतन पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के कहने पर ओम माथुर और प्रकाश चंद को पद छोड़ना पड़ा. लेकिन वसुंधरा राजे आनाकानी करती रहीं और उन्होंने अपना इस्तीफा हाईकमान को तब तक नहीं सौंपा जब तक राजनाथ सिंह पार्टी अध्यक्ष बने रहे. इस दौरान उन्होंने अपने समर्थक विधायकों की दिल्ली में परेड तक करवा दी. ख़बरों के अनुसार उस वक्त भाजपा के 79 विधायकों में से 55 से 60 राजे के साथ थे.

वसुंधरा राजे की नाराज़गी के चलते राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष का पद लंबे समय तक खाली ही रहा. बाद में गुलाब चंद कटारिया को भारी गहमागहमी के बीच इस पद पर बिठाया गया. लेकिन, मई 2012 में जब कटारिया ने मेवाड़ इलाके में ‘लोक जागरण यात्रा’ निकालने की कोशिश की तो उसके विरोध में वसुंधरा ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा सौंप दिया. यहां तक कि पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी के लाख कहने पर भी नाराज वसुंधरा राजे उनसे मिलने दिल्ली नहीं पहुंचीं. बाद में भारी दबाव के मद्देनज़र कटारिया को अपनी यात्रा स्थगित करनी पड़ी. फिर अगला विधानसभा चुनाव वसुंधरा राजे की ही सरपरस्ती में लड़ा भी गया और जीता भी गया.

यानी अगर यह कहा जाता है कि राजस्थान में वसुंधरा ही भाजपा है तो यह बात कोई अतिश्योक्ति नहीं है.