केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पूरी तरह चुनावी मोड में आ चुकी है. सोमवार को ही मोदी सरकार ने आर्थिक रूप से पिछड़ी सवर्ण जातियों के लिए 10 फ़ीसदी आरक्षण का बंदाेबस्त किया. इस बाबत संविधान संशोधन विधेयक संसद में पेश होने वाला है. इसके बाद अब ख़बर है कि मोदी सरकार भारतीय वन सेवा (आईएफओएस) का नाम भी बदलने वाली है. द इकॉनॉमिक टाइम्स के अनुसार सरकार की इस कोशिश को भी लोक सभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है.

ख़बर के मुताबिक आईएफओएस का नाम अब आईएफटीएस (भारतीय वन एवं जनजाति सेवा) हो सकता है. बताया जाता है कि इस बाबत प्रक्रिया शुरू भी हो चुकी है. कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय ने अंतर-मंत्रालयीन नोट तैयार किया है. इसे विभिन्न संबंधित विभागों के बीच उनकी राय लेने के लिए बांटा गया है. उनसे वन सेवा का नाम बदलने के साथ बदली परिस्थितियों में उससे संबद्ध अधिकारियों/कर्मचारियों के प्रशिक्षण आदि पर भी राय मांगी गई है. मंत्रालय के वरिष्ठ सूत्र इसकी पुष्टि करते हैं.

एक वरिष्ठ अधिकारी की मानें तो वन सेवा के अधिकारियों/कर्मचारियों को जनजातियों के प्रति अधिक ज़वाबदेह और ज़िम्मेदार बनाने के लिए यह परिवर्तन किया जा रहा है. यह कदम राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (एनसीएसटी) के भी निर्देशों के अनुरूप है. आयोग ने अपनी पूर्ण बैठक में माना था कि वन सेवा के अधिकारियों का जनजातियों के साथ अक़्सर टकराव होता रहता है. ऐसे में उन्हें जंगलों में रहने वाले इस समुदाय के प्रति अधिक ज़िम्मेदार बनाने की बेहद ज़रूरत है.

एनसीएसटी के भी एक वरिष्ठ अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर इसकी पुष्टि करते हैं. उनके मुताबिक, ‘वन सेवा के कर्मचारी/अधिकारी सरकार और जनजातियों के बीच पहला संपर्क सूत्र हैं. लेकिन उनमें ही जनजातियों की विभिन्न समस्याओं के प्रति कोई जागरूकता नहीं है. बल्कि जनजातीय समुदाय ही उनसे मिली प्रताड़ना की शिकायत करता रहता है. ऐसे में ज़रूरी है कि उन्हें इस समुदाय से सीधे जोड़ा जाए. उसके साथ समन्वय के लिए प्रशिक्षित किया जाए.’