लोगों में पुस्तक मेले में जाने का उत्साह पिछले कुछ सालों में ऐसा पनपा है कि बचपन में गांव के मेले में जाने के उत्साह को भी पीछे छोड़ रहा है. सोशल मीडिया पर किताबों के कवर की गंगा बह रही है और लोग मेले में अपने जाने के समय और तारीख की डुगडुगी पीट रहे हैं. कुल मिलाकर माहौल ऐसा हो रहा है कि कोई शरीफ आदमी जरा सा चूक जाए तो पुस्तक मेले की साहित्यिक चर्चा में फंस सकता है. इसी माहौल में हमें कई बरसों से पुस्तक मेला जाने वाले शख्स के नोट्स मिले हैं. ये नोट्स हम जस के तस आपके सामने रख रहे हैं:

साहित्य समाज का दर्पण होता है. पुस्तक मेले रवाना होने से पहले मैंने भी दर्पण के सामने ठीक-ठाक वक़्त गुजारा. अपनी योग्यतानुसार सजा-धजा. पहनने-ओढ़ने में काफी सावधानी बरती ताकि पुस्तक मेले के दौरान ली जाने वाली सेल्फियां आम ऐरी-गैरी सेल्फियों जैसी न हों बल्कि ऐसी हों कि साहित्यिक समालोचना में भी उनका उल्लेख किया जाय.

संगी-साथियों के साथ मेले जाने का आनंद ही कुछ और है. मेरे भी दोस्त फोन करके लगातार पूछते हैं - अरे, यार पुस्तक मेला चलना है. लेकिन इस बार मैंने तय कर लिया है कि उन्हीं चुनिंदा दोस्तों के साथ जाऊंगा जो पेशेवर तरीके से इस प्रकार के साहित्यिक महोत्सवों और जश्नों में शिरकत करते रहते हैं और बड़ी कुशलता से सेलिब्रेटी लेखकों से किताबों पर दस्तखत करवाकर अपने लिए कोई संदेश भी लिखवा लेते हैं. ऐसी फोटो फेसबुक पर पोस्ट करने से जब सैकड़ों लाइक और कमेंट्स मिलते हैं तो वही खुशी होती है जो किसान को अपनी लहलहाती फसल देखकर होती है. इसलिए इस बार उन दोस्तों से परहेज करूंगा जो वक़्त-बेवक़्त किताबों पर चर्चा शुरू कर देते हैं और इस चक्कर में नामधारी लेखकों और दामधारी प्रकाशकों संग फोटो मिस हो जाती है जोकि साहित्य की दुनिया में मेरे लिए अच्छा नहीं है.

वैसे, मैं पिछले कुछ पुस्तक मेलों में जा चुका हूं. लेकिन उस दौरान मैं खुद को पुस्तक प्रेम के कारोबार में इंटर्न ही समझता रहा. गुजरे पुस्तक मेलों के दौरान मेरे भीतर यह योग्यता नहीं आ पाई थी कि किसी स्वनामधन्य नवोदित लेखक या लेखिका से यह कह सकूं कि ‘आपकी सारी किताबें पढ़ीं हैं, भारतीय गांवों के बारे में आपका लिखा पढ़कर प्रेमचंद और रेणु की सीमाओं का एहसास होता है.’ मैं किसी कवियत्री से मुलाकात में यह भी नहीं कह पाता था कि ‘आपकी कविताओं में इतनी सरसता है कि इनके तो लोकगीत बनने का खतरा उत्पन्न हो गया है और मुझे तो डर तो इस बात का है कि कहीं इन कविताओं की लोकप्रियता प्ले स्कूलों तक न पहुंच जाए और बच्चे इन्हें नर्सरी राइम की तरह पढ़ने लगें.’

ऐसा कहने के कई फायदे होते हैं. लेखक अपनी नई पुस्तक की एक प्रति मुफ्त देते हैं. फिर बार-बार समीक्षा के लिए फोन करते हैं जिससे ‘आई एम समथिंग’ का एहसास होता है. मैं अपनी समीक्षा में उन्हें तुलसीदास लिखता हूं और उम्मीद करता हूं कि जब मेरी पुस्तक आएगी तो वे मुझे कालिदास लिखेंगे. इस प्रकार की साहित्यिक प्रशंसा प्रीमियम की तरह होती है और वक़्त आने पर अच्छा रिटर्न देती है. अब मैं काफी कुछ सीख गया हूं. मैं जान चुका हूं कि कैसे गैंग बनाये जाते हैं और कैसे साहित्यक शूट-आउट कर दबदबा बनाया जाता है. मौके-बेमौके कुछ उल्टा सीधा हो जाने पर यहां शरण भी मिल जाती है.

वैसे, मेरा मानना है कि मनुष्य में छपास रोग का जन्म प्रिटिंग प्रेस के आविष्कार के साथ ही हो गया था, लेकिन निरंतर पुस्तक मेलों और साहित्यिक महोत्सव के चलते अब यह संक्रामक हो चुका है. इस बार जैसे ही मेला पहुंचा, एहसास हुआ कि छपास रोगियों की संख्या खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी है. जानकारों का कहना है वैसे तो यह बीमारी लाइलाज है, लेकिन अगर हर साल पुस्तक मेले में एक किताब आ जाए तो रोगी को काफी राहत मिलती है. कुछ प्रकाशक तो इसको देखते हुए एक लेखक की हर साल पुस्तक की स्कीम भी निकाल सकते हैं. इस योजना के तहत निकली किताबों पर लिखा होगा- ‘छपास रोग नियंत्रण कार्यक्रम’ के तहत प्रकाशित. जानकारों का मानना है इस प्रकार की योजना छपास रोग में टीकाकरण यानी वैक्सीनेशन का काम करेगी और इसे पल्स पोलियो अभियान की तर्ज पर तब तक चलाया जा सकता है, जब तक लेखक की 20 पुस्तकें न आ जाएं.

पुस्तक मेले के दृश्य अद्भुत हैं. लेखक विमोचक को ढूंढ़ रहा है और ऐसे कैमरा एंगल को भी जहां से फ़ेसबुक लाइव किया जा सके. पुस्तकों पर पैनल चर्चा चल रही है. प्रकाशक को शक है कि पैनल वालों में से किसी ने भी पूरी पुस्तक पढ़ी नहीं है. श्रोताओं में ज्यादातर लेखक के यार-दोस्त हैं और बीच-बीच में तालियां बजा चर्चा को बोर होने से बचा रहे हैं और इस बात का प्रयास कर रहे हैं कि चर्चा खत्म हो और सेल्फी का शगुन आरंभ किया जाए. लेखक बीच-बीच में कुछ चुनिंदा लोगों को लिंक दे रहा है कि वहां बुक रिव्यू कर दे. अगर किसी ने किताब नहीं पढ़ रखी है और बिना किताब पढ़े रिव्यू लिखने की कला में पारंगत नहीं है तो उसके लिए रेडीमेड रिव्यू उपलब्ध है जो थोड़े फेरबदल के साथ चेपा जा सकता है. मैंने भी संकल्प ले लिया है कि अगले साल पुस्तक मेले में अपनी पुस्तक के साथ ही आऊंगा.

बाकी, सेल्फियां खिंच रहीं हैं, किताबें बिक रहीं हैं और ज्ञान पुस्तकों के बोझ से दबा कराह रहा है. वह पाठकों लेखकों की तरफ कातर निगाहों से देख रहा है, लेकिन सभी उसकी तरफ से मुंह फेर ले रहे हैं.