मध्य प्रदेश में अभी इसी महीने दो अहम घटनाएं हुईं. पहली- विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष का चुनाव. यानी मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी के विधायक दल के नेता का चुना जाना. दूसरा- विधानसभा अध्यक्ष का चुनाव. यूं तो संसदीय प्रक्रिया में दोनों सामान्य घटनाएं हैं, लेकिन मध्य प्रदेश के ताजा राजनीतिक हालात में ये दोनों घटनाएं बेहद अहम मानी जा सकती हैं. राज्य में पिछले दो चुनाव के बाद भाजपा के विधायक दल के सामने नेता चुनने का मौका ही नहीं रहा क्योंकि तब शिवराज सिंह चौहान पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार थे और सबको स्वीकार भी थे.

वहीं बीते पांच दशक (52 साल) में विधानसभा में भी कभी अध्यक्ष के चुनाव के नौबत नहीं आई. जो दल विपक्ष में रहा वह संख्या बल के लिहाज़ से या तो सत्ता पक्ष को चुनौती देने की स्थिति में नहीं रहा या फिर उसने संसदीय परंपरा का मान रखने काे तरज़ीह दी. लेकिन इस बार दोनों स्थितियां बदल गईं. वह भी ठीक ऐसे वक़्त जब तीन महीने बाद ही देश अगली सरकार चुनने वाला है.

लिहाज़ा इन बदली परिस्थितियों से आने वाले लोक सभा चुनाव के लिए निकले संकेतों को जानना ज़रूरी हाे जाता है और दिलचस्प भी. ख़ास तौर पर इसलिए भी कि बीते साल के आख़िर में जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए उनमें सबसे दिलचस्प और नज़दीकी मुकाबला मध्य प्रदेश में देखने को मिला. और फिर इस राज्य में लोक सभा की सीटें (कुल 29) भी कम नहीं हैं.

भाजपा और शिवराज

मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव के बाद शिवराज सिंह चौहान ने एक पत्रकार वार्ता काे संबोधित किया था. इसमें उन्होंने चुनाव में हुई हार की पूरी ज़िम्मेदारी जब अपने ऊपर ली तो उनसे सीधा स्वाभाविक सवाल पूछा गया, ‘क्या अब आप विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष होंगे?’ इसके ज़वाब में उन्होंने कहा, ‘नेता प्रतिपक्ष बनूं या न बनूं पर ‘नेता’ तो रहूंगा.’ फिर जब वे मुख्यमंत्री निवास छोड़कर नए सरकारी बंगले में पहुंचे तो वहां मिलने आए पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा, ‘आप लोग चिंता मत करना कि पार्टी चुनाव हार गई है तो अब हमारा क्या होगा. मैं हूं अभी. टाइगर ज़िंदा है.’ इसके बाद 2018 के आख़िरी दिन ओडिशा के जगन्नाथ पुरी में समंदर किनारे बैठकर उन्होंने एक लेख लिखा. इसमें प्रदेश के नए मुख्यमंत्री कमलनाथ को सीधी चुनौती दी, ‘पुरानी लकीर को मिटाकर छोटा करने के बजाय बड़ी लकीर खींचकर बड़े बनें.’

चुनाव के बाद से शिवराज प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा करते रहे हैं और ख़बरों में भी बने हैं. फिर चाहे वह वंदेमातरम विवाद का मसला हो या किसान कर्ज़ माफ़ी का. इसीलिए जब कमलनाथ सरकार ने शुरुआती तौर पर प्रदेश सचिवालय में महीने के पहले दिन वंदेमातरम गायन की परंपरा रोकी तो शिवराज ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया. उन्होंने कहा कि भाजपा के सभी 109 विधायक सात जनवरी को सचिवालय में वंदेमातरम गाएंगे.

हालांकि बाद में कमलनाथ सरकार ने वंदेमातरम गायन की नई व्यवस्था कर मसला ठंडा कर दिया. ऐसे ही वे कृषि कर्ज़ माफ़ी पर भी सवाल दाग रहे हैं, ‘कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश में सरकार बनने पर 10 दिन के अंदर किसानों का कर्ज माफ करने की घोषणा की थी. कांग्रेस की सरकार बन गई. उसे 23 दिन हो गए. लेकिन व्यावहारिक रूप से किसान के कर्ज का एक नया पैसा माफ़ नहीं हुआ. क्या कांग्रेस विधानसभा की ही तरह लोक सभा चुनाव भी किसानों को बहकाकर जीतना चाहती है?’

जानकारों की मानें तो शिवराज सिंह चौहान अब भी प्रदेश की राजनीति में ही अपनी संभावनाएं देख रहे हैं. इसकी वज़ह भी है. चूंकि भाजपा के पास विधानसभा में 109 विधायकों का संख्या बल है. यह सामान्य बहुमत से सात कम हैं. कांग्रेस के पास भी बहुमत (114) नहीं है. दो सीटें कम हैं. उसके अपने कई विधायकों में असंतोष है. समर्थन दे रहे सहयोगी भी खुलकर नाराज़गी जता रहे हैं. इसीलिए शिवराज को शायद लग रहा है कि देर-सबेर राज्य में फिर भाजपा की सरकार बन सकती है और वे स्वाभाविक तौर पर फिर मुख्यमंत्री बन सकते हैं.

लेकिन भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व का रुख़ शिवराज की मंशा के विपरीत दिख रहा है. इसके दो उदाहरण बिल्कुल अभी के हैं. पहला- शिवराज की इच्छा न होने (यह उन्होंने ख़ुद कहा था) के बावज़ूद उन्हें केंद्र की राजनीति में भेज दिया गया है. पार्टी ने उन्हें राजस्थान और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्रियों क्रमश: वसुंधरा राजे तथा रमन सिंह के साथ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया है. दूसरा- भाजपा विधायक दल के नेता का चुनाव. इस संदर्भ में यहां तक तो ये सही है कि शिवराज ने इस पद (नेता प्रतिपक्ष) की दौड़ से ख़ुद को दूर कर लिया था. लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि वे यह पद अप्रत्यक्ष रूप से अपने पास ही रखना चाहते थे. उन्होंने अपने विश्वस्त राजेंद्र शुक्ल या भूपेंद्र सिंह में से किसी को नेता प्रतिपक्ष बनवाने की कोशिश भी की. लेकिन बात बनी नहीं और गोपाल भार्गव भाजपा विधायक दल के नेता चुन लिए गए.

इसके अलावा केंद्र सरकर ने आर्थिक आधार पर सवर्ण जातियों को 10 फ़ीसदी आरक्षण दिया था, उसकी भूमिका से मध्य प्रदेश भाजपा और शिवराज का संबंध जुड़ता है. दरअसल पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम को लेकर एक अहम फ़ैसला दिया था. इसके मुताबिक किसी को महज़ शिकायत के आधार पर ग़िरफ़्तार करने के बज़ाय पहले प्राथमिक जांच को अनिवार्य बनाया गया था. विपक्ष ने इस मुद्दे को लपका और इसे जाति आधारित आरक्षण ख़त्म करने की साज़िश बता दिया. तब केंद्र सरकार ने कानून में संशोधन कर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला पलट दिया था. इधर मध्य प्रदेश और राजस्थान के चुनाव में ख़ास तौर पर इस मसले ने जोर पकड़ा और आदत के मुताबिक शिवराज जोश में आकर बोल गए, ‘मेरे रहते कोई माई का लाल आरक्षण नहीं हटा सकता.’

इसके बाद मध्य प्रदेश में तमाम जगहों पर सवर्ण समुदायाें ने प्रदर्शन किया. राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो कुछ हद तक सवर्ण समुदाय का एक हिस्सा इस वजह से भी भाजपा के खिलाफ हुआ. मुमकिन है कि ऐसा न होता तो शायद भाजपा और कांग्रेस के बीच सीटों का अंतर और कम होता. इस बात को भाजपा भी मानती है. चुनाव के बाद प्रदेश भाजपा के पूर्व उपाध्यक्ष और राज्य सभा सदस्य रहे रघुनंदन शर्मा ने खुले तौर पर स्वीकार भी किया कि शिवराज का ‘माई के लाल’ वाला बयान पार्टी पर भारी पड़ गया. यानी अब इस स्थिति में मध्य प्रदेश भाजपा और शिवराज पर भी लोक सभा चुनाव के लिए नरेंद्र मोदी और अमित शाह के इशारे पर चलने का दबाव है.

कांग्रेस और कमलनाथ

अब बात कांग्रेस और कमलनाथ की. कांग्रेस इस वक़्त संगठनात्मक रूप से फिर अधर में दिख रही है. पार्टी प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ मुख्यमंत्री बन चुके हैं. यानी अब वे दोहरी ज़िम्मेदारियां निभा रहे हैं. लेकिन उनकी प्राथमिकता में ज़ाहिर तौर पर सरकार ही होगी. इसकी कई वज़हें हैं. जैसे पहली तो यही कि कांग्रेस के पास बहुमत से दो सीटें कम हैं. साथ ही उसके पास इधर-उधर से जुटाए समर्थन के बल पर 121 सीटों के साथ आश्वस्ति देने वाला बहुमत भी है. फिर भी वह पूरी तरह आश्वस्त हो नहीं हो पा रही है. इसकी वज़ह है विपक्ष में 109 सीटों के संख्या बल के साथ बैठी भाजपा, जो अब किसी रीति-नीति, नियम-सिद्धांत पर चलने वाली पार्टी नहीं रही.

इसका ताज़ा उदाहरण है विधानसभा अध्यक्ष-उपाध्यक्ष का चुनाव. परंपरा तो ये है कि यह पद सत्ताधारी दल को मिलता है. साथ ही उपाध्यक्ष का पद मुख्य विपक्षी दल को. राजस्थान में इस परंपरा का पालन किया भी गया. लेकिन मध्य प्रदेश में ऐसा नहीं हुआ. इसे संख्या बल से उपजा दंभ ही कहना चाहिए कि भाजपा ने मध्य प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष पद के लिए अपना उम्मीदवार भी उतार दिया. फिर अपने आदिवासी नेता विजय शाह को जितवाने की आख़िरी समय तक कोशिश भी की लेकिन वह सफल नहीं हुई. लिहाज़ा अपनी निश्चित हार देख भाजपा विधायक सदन से बाहर चले गए लेकिन सदन के माहौल में शुरूआत में ही कड़वाहट भी घोलते गए. इसका नतीज़ा ये हुआ कि कांग्रेस के एनपी प्रजापति विधानसभा अध्यक्ष तो बने ही सत्ताधारी दल ने उपाध्यक्ष के पद पर भी अपनी उम्मीदवार हिना कांवरे को जितवा लिया.

हालांकि ये सफलताएं कमलनाथ के लिए आसान नहीं थीं. इस बार भी पूरी तरह, हर वक़्त पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ही उनके संकटमोचक की भूमिका में रहे. उन्होंने आख़िरी मौके तक यह सुनिश्चित किया कि कमलनाथ सरकार को समर्थन देने वाला काेई भी विधायक भाजपा की तरफ़ न ख़िसक जाए. इसमें वे सफल भी रहे. लेकिन इससे भाजपा की चुनौती ख़त्म हो गई है ऐसे मुग़ालते में शायद वे ख़ुद भी नहीं होंगे. क्याेंकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के ख़ास सिपहसालार और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय साफ़ शब्दों में कह चुके हैं, ‘यह सरकार (कमलनाथ की) पांच साल नहीं चलेगी. बस, ‘बॉस’ इशारा भर हो जाए, कमलनाथ सरकार 15 दिन में गिरा देंगे.’ यहां तक कि नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव भी कह चुके हैं कि जब तक ‘मंत्रियों के बंगलों में रंग-रोगन होगा, कांग्रेस सरकार गिर जाएगी.’

यही नहीं भाजपा के सिर पर मंडराती चुनौती के साथ-साथ कमलनाथ पर सरकार को समर्थन दे रहे विधायकों का दबाव भी है. बहुजन समाज पार्टी की पथरिया से चुनी गई विधायक राम बाई, निर्दलीय सुरेंद्र सिंह शेरा आदि सरकार पर लगातार उन्हें मंत्री बनाने का दबाव बना रहे हैं. खुले तौर पर बयानबाज़ी कर रहे हैं. मंत्री नहीं बनाए गए ऐदल सिंह कंसाना, केपी सिंह, राज्यवर्धन सिंह दत्तीगांव जैसे कांग्रेस के अपने नाराज विधायक भी हैं, जो कमलनाथ के साथ पार्टी का सिरदर्द बढ़ा रहे हैं. तिस पर कमलनाथ सरकार पर इस बात का दबाव भी है कि लोक सभा निर्वाचन से पहले विधानसभा चुनाव के वक़्त की गई कुछ बड़ी घोषणाएं पूरी हो जाएं.

यानी ये ऐसी स्थितियां हैं जिनमें प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष के तौर पर कमलनाथ पार्टी संगठन को ज़्यादा वक़्त दे पाने की स्थिति में नहीं हैं. इससे पार्टी के सामने दिशाहीन होने का ख़तरा है. वहीं सरकार के सिर पर दबाव और धमकियों के मंडराते ख़तरे के मद्देनज़र दिग्विजय सिंह जैसे नेता से अलग होकर कमलनाथ अपना विस्तार करने का जोख़िम भी नहीं ले सकते. वहीं कमलनाथ-दिग्विजय की मज़बूत होती जोड़ी के दबाव में पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे किसी स्वाभाविक दावेदार को प्रदेश अध्यक्ष भी नहीं बना पा रहा है. इससे सरकार और संगठन में अलग-अलग शक्ति केंद्र बन जाने की आशंका है.

इस तरह यह विरोधाभासी स्थिति कांग्रेस और कमलनाथ दोनों को लोक सभा चुनाव में भी विधानसभा के चुनावों की तरह अपेक्षित सफलता से कुछ या शायद काफ़ी पीछे भी रख सकती है.