संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की धीमी गति पर भारत ने नाखुशी जताई है. बीते हफ्ते परिषद की सदस्य संख्या में विस्तार पर एक अनौपचारिक बैठक हुई थी. इसमें संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन ने कहा कि इस विस्तार की प्रक्रिया जड़ता की शिकार हो गई है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद संयुक्त राष्ट्र के छह प्रमुख अंगों में से एक अंग है जिसका उत्तरदायित्व है अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना. अभी इसमें पांच स्थायी सदस्य हैं - अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन. भारत काफी समय से इसमें जगह बनाने की कोशिशों में लगा है.

बहुत से जानकार मानते हैं कि भारत यह जगह किसी ख़ैरात में नहीं मांग रहा है बल्कि यह उसका हक है. भारत संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक सदस्य है. जनवरी 1942 में बने पहले संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र (चार्टर) पर हस्ताक्षर करने वाले 26 देशों में उसका भी नाम था. 25 अप्रैल 1945 को सैन फ्रांसिस्को में शुरू हुए और दो महीनों तक चले 50 देशों के संयुक्त राष्ट्र स्थापना सम्मेलन में भारत के भी प्रतिनिधि भाग ले रहे थे. 30 अक्टूबर 1945 को भारत की ब्रिटिश सरकार ने इस सम्मेलन में पारित अंतिम घोषणापत्र की विधिवत औपचारिक पुष्टि भी की थी.

इस सारी प्रक्रिया के दौरान स्वतंत्रता के बाद भारत को भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता दिये जाने की चर्चा हुई थी. हवा का रुख भारत के अनुकूल ही था. लेकिन तब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस संभावना पर पूर्णविराम लगा दिया. आइए, इस ऐतिहासिक चूक की कहानी जानते हैं.

चीन की सीट ताइवान को मिली

चीन उस समय च्यांग काई शेक की कुओमितांग पार्टी और माओ त्से तुंग की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच चल रहे गृहयुद्ध से लहूलुहान था. कम्युनिस्टों से घृणा करने वाले अमेरिका और उसके साथी ब्रिटेन तथा फ्रांस, किसी साम्यवादी चीन को सुरक्षा परिषद में नहीं चाहते थे. चीन के नाम की सीट 1945 में च्यांग काई शेक की राष्ट्रवादी चीन सरकार को दी गयी. लेकिन, गृहयुद्ध में अंततः चीनी कम्युनिस्टों की विजय हुई. एक अक्टूबर 1949 को चीन की मुख्य भूमि पर उन्हीं की सरकार बनी. च्यांग काई शेक को अपने समर्थकों के साथ भाग कर ताइवान द्वीप पर शरण लेनी पड़ी. वहां उन्होंने अपनी एक अलग सरकार बनायी. तभी से ताइवान, कम्युनिस्ट चीन के विरोधी चीनियों का ही एक अलग देश है.

इन्हीं परिस्थितियों के बीच 15 अगस्त 1947 को भारत जब स्वतंत्र हुआ तो प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की अंतरिम सरकार को भी सबसे पहले देश के बंटवारे वाली उथल-पुथल से निपटना पड़ा. नेहरू ही भारत के प्रथम विदेशमंत्री भी थे. समाजवाद की रूसी और चीनी अवधारणाओं से काफ़ी प्रभावित उनके निजी आदर्श और विचार देश की विदेशनीति हुआ करते थे. यही कारण था कि चीन में माओ त्से तुंग की कम्युनिस्ट सरकार बनते ही उसे राजनयिक मान्यता देने वाले देशों की पहली पांत में भारत भी खड़ा था. जवाहरलाल ऩेहरू को आशा ही नहीं अटल विश्वास था कि ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ बनेंगे.

चीन की कम्युनिस्ट सरकार को मान्यता देने के एक ही साल के भीतर, 24 अगस्त 1950 को, नेहरूजी को अपनी बहन विजयलक्ष्मी पंडित का एक पत्र मिला. कुछ समय पहले तक वह अज्ञात था. विजयलक्ष्मी पंडित उस समय अमेरिका में भारत की राजदूत थीं.

विजयलक्ष्मी पंडित का पत्र

इस पत्र में विजयलक्ष्मी पंडित ने अपने भाई को लिखा था, ‘अमेरिका के विदेश मंत्रालय में चल रही एक बात तुम्हें भी मालूम होनी चाहिये. वह है, सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता वाली सीट पर से (ताइवान के राष्ट्रवादी) चीन को हटा कर उस पर भारत को बिठाना. इस प्रश्न के बारे में तुम्हारे उत्तर की रिपोर्ट मैंने अभी-अभी रॉयटर्स (समाचार एजेंसी) में देखी है. पिछले सप्ताह मैंने (जॉन फ़ॉस्टर) डलेस और (फ़िलिप) जेसप से बात की थी... दोनों ने यह सवाल उठाया और डलेस कुछ अधिक ही व्यग्र लगे कि इस दिशा में कुछ किया जाना चाहिये. पिछली रात वॉशिंगटन के एक प्रभावशाली कॉलम-लेखक मार्क़िस चाइल्ड्स से मैंने सुना कि डलेस ने विदेश मंत्रालय की ओर से उनसे इस नीति के पक्ष में जनमत बनाने के लिए कहा है. मैंने हम लोगों का उन्हें रुख बताया ओर सलाह दी कि वे इस मामले में धीमी गति से चलें, क्योंकि भारत में इसका गर्मजोशी के साथ स्वागत नहीं किया जायेगा.’

जॉन फ़ॉस्टर डलेस 1950 में अमेरिकी विदेश मंत्रालय के एक शांतिवार्ता-प्रभारी हुआ करते थे. 1953 से 1959 तक वे अमेरिका के विदेशमंत्री भी रहे. फ़िलिप जेसप एक न्यायविद और अमेरिकी राजनयिक थे जो नेहरू से मिल चुके थे. विजयलक्ष्मी पंडित का यह पत्र और 30 अगस्त 1950 को जवाहरलाल नेहरू द्वारा दिया गया उसका उत्तर कुछ ही समय पहले नयी दिल्ली के ‘नेहरू स्मृति संग्रहालय एवं पुस्तकालय’ (एमएमएमएल) में मिले हैं.

प्रथम प्रधानमंत्री का उत्तर

अपने उत्तर में जवाहरलाल नेहरू ने लिखा, ‘तुमने लिखा है कि (अमेरिकी) विदेश मंत्रालय, सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता वाली सीट पर से चीन को हटा कर भारत को उस पर बिठाने का प्रयास कर रहा है. जहां तक हमारा प्रश्न है, हम इसका अनुमोदन नहीं करेंगे. हमारी दृष्टि से यह एक बुरी बात होगी. चीन का साफ़-साफ़ अपमान होगा और चीन तथा हमारे बीच एक तरह का बिगाड़ भी होगा. मैं समझता हूं कि (अमेरिकी) विदेश मंत्रालय इसे पसंद तो नहीं करेगा, किंतु इस रास्ते पर हम नहीं चलना चाहते. हम संयुक्त राष्ट्र में और सुरक्षा परिषद में चीन की सदस्यता पर बल देते रहेंगे. मेरा समझना है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के अगले अधिवेशन में इस विषय को लेकर एक संकट पैदा होने वाला है. जनवादी चीन की सरकार अपना एक पूर्ण प्रतिनिधिमंडल वहां भेजने जा रही है. यदि उसे वहां जाने नहीं दिया गया, तब समस्या खड़ी हो जायेगी. यह भी हो सकता है कि सोवियत संघ और कुछ दूसरे देश भी संयुक्त राष्ट्र को अंततः त्याग दें. यह (अमेरिकी) विदेश मंत्रालय को मनभावन भले ही लगे, लेकिन उस संयुक्त राष्ट्र का अंत बन जायेगा, जिसे हम जानते हैं. इसका एक अर्थ युद्ध की तरफ और अधिक लुढ़कना भी होगा.’

सोवियत संघ की अमेरिका से नाराज़गी

लेकिन नेहरू को तत्कालीन सोवियत संघ द्वारा संयुक्त राष्ट्र से मुंह फेर लेने और युद्ध की ओर लुढ़कने की आशंका क्यों थी? शायद इसलिए कि सोवियत संघ जनवरी 1950 से क़रीब आठ महीनों तक सुरक्षा परिषद की बैठकों में भाग नहीं ले रहा था. ऐसा उसने चीन के गृहयुद्ध में कम्युनिस्टों की विजय, और एक अक्टूबर 1949 को वहां उनकी सत्ता स्थापित होने के बाद भी, संयुक्त राष्ट्र में चीन वाली सीट उसे नहीं मिलने के प्रति अपना विरोध जताने के लिए किया था.

सोवियत संघ में उस समय तानाशाह स्टालिन का शासन था. चीन में माओ त्से तुंग की तानाशाही भी कुछ कम निर्मम नहीं थी. दोनों के बीच मतभेद तब तक आरंभिक अवस्था में थे. 25 जून 1950 को चीन के पड़ोसी और उसी के जैसे कम्युनिस्ट देश उत्तर कोरिया ने, ग़ैर-कम्युनिस्ट दक्षिण कोरिया पर हमला कर कोरिया युद्ध छेड़ दिया. सोवियत संघ द्वारा सुरक्षा परिषद का बहिष्कार उस समय भी चल रहा था. उसकी अनुपस्थिति में उसके वीटो का डर नहीं रहने से अमेरिका ने उत्तर कोरिया की निंदा का प्रस्ताव बड़े आराम से पास करवा लिया.

अमेरिका ने भारत में अपना समर्थक देखा

भारत भी उत्तर कोरिया द्वारा यु्द्ध छेड़ने का समर्थन नहीं कर सकता था, इसलिए उसने अमेरिका के प्रस्ताव को अपना समर्थन दिया. अमेरिका को यह बात पसंद आई. उसे लगा कि अन्यथा तटस्थता की पैरवी करने वाले नेहरू कम्युनिस्टों के होश ठिकाने लगाने के प्रश्न पर उसके निकट आ रहे हैं. कोरिया युदध छिड़ने से कुछ ही दिन पहले नेहरू दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ देशों में गये थे. वहां कही उनकी बातें भी अमेरिका को अच्छी लगी थीं.

जनसंख्या की दृष्टि से भारत उस समय भी संसार का दूसरा सबसे बड़ा देश था जो बहुदलीय लोकतंत्र के रास्ते पर चल रहा था. उधर, चीन के नाम वाली सीट पर बिठाया गया छोटा-सा ताइवान एक द्वीप देश था. समझा जाता है कि इन्हीं सब बातों को नापने-तौलने के बाद अमेरिका, सुरक्षा परिषद में ताइवान वाली सीट भारत को दिलवाने का कोई औपचारिक प्रस्ताव रखने से पहले, आश्वस्त होना चाहता था कि भारत भी यही चाहता है या नहीं.

‘चीन की क़ीमत पर नहीं’

अमेरिका को यह सावधानी भी बरतनी थी कि पाकिस्तान को कहीं यह न लगने लगे कि उसके सिर पर से अमेरिका का वरदहस्त उठने जा रहा है और उसके क़ब्ज़े वाला कश्मीर भी शायद उसके हाथ से निकल जायेगा. यह सब सोचे बिना प्रधानमंत्री नेहरू का अनौपचारिक उत्तर था, ‘भारत कई कारणों से सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के सुयोग्य है. किंतु हम इसे चीन की क़ीमत पर नहीं चाहते.’ कहा जाता है कि सोवियत और चीनी साम्यवाद की रोकथाम के लिए बने अमेरिकी सैन्य संगठनों ‘सीएटो’ (साउथ एशिया ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन) और ‘सेन्टो’ (सेन्ट्रल ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन) में 1954-55 में पाकिस्तान की भर्ती के पीछे भी जवाहरलाल नेहरू का यही रुख एक बड़ा कारण था.

नेहरू ने काफ़ी समय तक चीन के प्रति अपनी निजी भावनाओं और अपने निजी आदर्शों को देशहित से ऊपर रखा. उनका कहना था कि चीन एक ‘महान देश’ है, इसलिए उसे उसका उचित स्थान मिलना चाहिये. पता नहीं उन्होंने यह कैसे मान लिया कि महान चीन इतना दीन-हीन भी है कि अपने उचित स्थान के लिए स्वयं लड़ नहीं सकता! यह भला भारत का नैतिक कर्तव्य क्यों होना चाहिये था कि वह स्वयं भूखा रह कर भी चीन को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ता? भारत के स्वतंत्रता संग्राम में चीन ने ऐसा कोई ऐसा योगदान भी नहीं दिया था कि भारत पर उसके प्रति कृतज्ञता जताने का कोई नैतिक दायित्व रहा होता.

तिब्बत पर चीनी आक्रमण

नेहरू और अमेरिका में भारत की राजदूत उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित के बीच यह पत्रव्यवहार जब हुआ था, लगभग उन्हीं दिनों चीन तिब्बत पर आक्रमण की भूमिका रच रहा था. सितंबर 1950 में दलाई लामा का एक प्रतिनिधिमंडल दिल्ली में था. 16 सितंबर के दिन वह दिल्ली में चीनी राजदूत से मिला था. राजदूत ने कहा कि तिब्बत को चीन की प्रभुसत्ता स्वीकार करनी ही पड़ेगी. कुछ ही दिन बाद, सात अक्टूबर को चीनी सेना ने तिब्बत पर धावा बोल दिया. तिब्बत के साथ हुई ज़ोर-ज़बरदस्ती को जानते हुए भी नेहरू मान रह रहे थे कि भारत की चुप्पी-भरी भलमनसाहत का बदला चीन भलमनसाहत से ही देगा.

होना तो यह चाहिये था कि भारत के प्रति अमेरिकी सद्भावना की आहट पाते ही नेहरू एक अभियान छेड़ देते. कहते कि उपनिवेशवाद पीड़ितों, नवस्वाधीन देशों, अविकसित ग़रीब देशों तथा गुटनिरपेक्ष देशों का सुरक्षा परिषद में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है; भारत उनकी आवाज़ बनेगा. वे कहते कि ब्रिटेन और फ्रांस के रूप में अमेरिका के दो यूरोपीय साथी पहले ही सुरक्षा परिषद में विराजमान हैं, सोवियत संघ कम्युनिस्ट देशों के हितरक्षक की भूमिका निभा रहा है, इसलिए एक और कम्युनिस्ट देश चीन के बदले, उससे कुछ ही कम जनसंख्या वाले, कल तक ब्रिटेन का उपनिवेश रहे और अब विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र बन रहे भारत को सुरक्षा परिषद की सदस्यता पाने का कहीं अधिक औचित्य बनता है. इसके बदले भारत के प्रथम प्रधानमंत्री की रट बनी रही कि ‘पहले चीन’, तब भारत.

‘पहले चीन’, तब भारत’

यही रट उन्होंने 1955 में तब भी लगाई, जब तत्कालीन सोवियत प्रधानमंत्री निकोलाई बुल्गानिन ने, अमेरिका की ही तरह, उनका मन टटोलने के लिए सुझाव दिया कि भारत यदि चाहे तो उसे जगह देने लिए सुरक्षा परिषद में सीटों की संख्या पांच से बढ़ा कर छह भी की जा सकती है. नेहरू ने बुल्गानिन को भी यही जवाब दिया कि कम्युनिस्ट चीन को उसकी सीट जब तक नहीं मिल जाती, तब तक भारत भी सुरक्षा परिषद में अपने लिए कोई स्थायी सीट नहीं चाहता.

बुल्गानिन और सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वोच्च नेता निकिता ख्रुश्चेव, नवंबर 1955 में पहली बार, एक लंबी यात्रा पर एकसाथ भारत आये थे. दिल्ली के बाद वे पंजाब, कश्मीर, तत्कालीन बंबई, कलकत्ता, मद्रास, बंगलौर और दक्षिण भारत के प्रसिद्ध हिल स्टेशन ऊटी भी गये. बुल्गानिन कोयम्बटूर के एक निकटवर्ती गांव में नारियल-पानी पीने के लिए रुके. उस गांव का नाम ‘बुल्गानिन थोट्टम’ पड़ गया. भारत के प्रति सोवियत लगाव का उस समय इससे बड़ा कोई दूसरा प्रमाण नहीं हो सकता था.

भारत के लिए छठीं सीट

बुल्गानिन ने एक सम्मेलन में कहा, ‘हम सामान्य अंतरराष्ट्रीय स्थिति और तनावों में कमी लाने के बार में बातें कर रहे हैं और यह सुझाव देना चाहते हैं कि भारत को छठे सदस्य के रूप में सुरक्षा परिषद में शामिल किया जा सकता है.’ इस पर नेहरू की प्रतिक्रिया थी, ‘बुल्गानिन शायद जानते हैं कि अमेरिका में कुछ लोग सुझाव दे रहे हैं कि सुरक्षा परिषद में चीन की सीट भारत को दी जानी चाहिये. यह तो हमारे और चीन के बीच खटपट करवाने वाली बात होगी. हम इसके सरासर ख़िलाफ़ हैं. हम कोई आसन पाने के लिए अपने आप को इस तरह आगे बढ़ाने के विरुद्ध हैं, जो परेशानी पैदा करने वाला है और भारत को विवाद का विषय बना देगा.’

नेहरू ने जोर देकर कहा, ‘भारत को यदि सुरक्षा परिषद का सदस्य बनाया जाता है तो पहले संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन करना होगा. हमारा समझना है कि ऐसा तब तक नहीं किया जाना चाहिये, जब तक पहले चीन की और संभवतः कुछ दूसरों की सदस्यता का प्रश्न हल नहीं हो जाता. मैं समझता हूं कि हमें पहले चीन की सदस्यता पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिये. (संयुक्त राष्ट्र) चार्टर में संशोधन करने के बारे में बुल्गानिन का क्या विचार है, हमारे विचार से इसके लिए सही समय अभी नहीं आया है.’

स्वयं एक कम्युनिस्ट नेता बुल्गानिन ने जब देखा कि नेहरू अब भी चीन समर्थक राग ही अलाप रहे हैं, तो वे इसके सिवाय और क्या कहते कि ‘हमने सुरक्षा परिषद में भारत की सदस्यता का प्रश्न इसलिए उठाया, ताकि हम आपके विचार जान सकें. हम भी सहमत है कि यह सही समय नहीं है, सही समय की हमें प्रतीक्षा करनी होगी.’

नेहरू के उत्तर से अमेरिकी प्रस्ताव की पुष्टि हुई

बुल्गानिन को दिये गये नेहरू के उत्तर से इस बात की फिर पुष्टि होती है कि अमेरिका ने कुछ समय पहले सचमुच यह सुझाव दिया था कि सुरक्षा परिषद में चीन वाली सीट, जिस पर उस समय ताइवान बैठा हुआ था, भारत को दी जानी चाहिये. पुष्टि इस बात की भी होती है कि पहले अमेरिकी सुझाव और बाद में सोवियत सुझाव को भी साफ़-साफ़ ठुकरा कर नेहरू ने उस देशहितकारी दूरदर्शिता का परिचय नहीं दिया, जिसकी अपेक्षा तब वे स्वयं ही करते, जब देश का प्रधानमंत्री उनके बदले कोई दूसरा व्यक्ति रहा होता.

भारत में जो गिने-चुने लोग संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के बारे में अमेरिका और सोवियत संघ के इन दोनों सुझावों को जानते हैं, वे उस समय की परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में जवाहरलाल नेहरू की प्रतिक्रिया को सही ठहराते हैं. पर देखा जाए तो नेहरू के जीवनकाल में ही घटी अंतरराष्ट्रीय घटनाओं ने चीन के प्रति उनके मोह या उसके साथ टकराव से बचने की उनकी भयातुरता को अतिरंजित ही नहीं, अनावश्यक भी ठहरा दिया. चीन ने नेहरू के सामने ही न केवल तिब्बत को हथिया लिया और वहां भीषण दमनचक्र चलाया, खुद अपने यहां भी ‘लंबी छलांग’ और उनके निधन के बाद ‘सांस्कृतिक क्रांति’ जैसे सिरफिरे अभियान छेड़ कर अपने ही करोड़ों देशवासियों की अनावश्यक बलि ले ली.

चीन ने भारत को कड़वा सबक सिखाया

नेहरू तो चीन की महानता का गुणगान करते रहे जबकि1962 में उसने भारत पर हमला कर भारत को करारी हार का कड़वा ‘सबक सिखाया.’ इस सबक का आघात डेढ़ साल के भीतर ही नेहरू की मृत्यु का भी संभवतः मुख्य कारण बना. लद्दाख का स्विट्ज़रलैंड जितना बड़ा एक हिस्सा तभी से चीन के क़ब्ज़े में है. अरुणाचल प्रदेश को भी वह अपना भूभाग बताता है. क्षेत्रीय दावे ठोक कर सोवियत संघ और वियतनाम जैसे अपने कम्युनिस्ट बिरादरों से युद्ध लड़ने में भी चीन ने कभी संकोच नहीं किया और अब तो वह ताइवान को भी बलपूर्वक निगल जाने की धमकी दे रहा है.

जो लोग यह कहते हैं कि 1955 में सोवियत प्रधानमंत्री निकोलाई बुल्गानिन का यह सुझाव हवाबाज़ी था कि भारत के लिए सुरक्षा परिषद में छठीं सीट भी बनाई जा सकती है, वे भूल जाते हैं या नहीं जानते कि चीन में माओ त्से तुंग की तानशाही शुरू होते ही उस समय के सोवियत तानाशाह स्टालिन के साथ भी चीन के संबंधों में खटास आने लगी थी.

रूस और चीन के सैद्धांतिक मतभेद

माओ और स्टालिन कभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हुआ करते थे. स्टालिन की पांच मार्च 1953 को मृत्यु होते ही माओ त्से तुंग अपने आप को कम्युनिस्टों की दुनिया का ‘सबसे वरिष्ठ नेता’ मानने और सोवियत संघ को ही उपदेश देने लगे. दूसरी ओर सोवियत संघ के नये सर्वोच्च नेता निकिता ख़्रुश्चेव, स्टालिन के नृशंस अत्याचारों का कच्चा चिठ्ठा खोलते हुए उस स्टालिनवाद का अंत कर रहे थे जो अब चीन में माओ की कार्यशैली बन चुका था.

1955 आने तक माओ और ख्रुश्चेव के बीच दूरी इतनी बढ़ चुकी थी कि चीन उस समय के पूर्वी और पश्चिमी देशों वाले गुटों के बीच ख्रुश्चेव की ‘शांतिपूर्ण सहअस्तित्व’ वाली नीति को आड़े हाथों लेने लगा था. चीन इसे मार्क्स के सिद्धान्तों को भ्रष्ट करने वाला ‘संशोधनवाद’ बता रहा था. दोनों पक्ष एक-दूसरे की निंदा-आलोचना के नए-नए शब्द और मुहावरे गढ़ रहे थे. एक-दूसरे को ‘पथभ्रष्ट,’ ‘विस्तारवादी’ और ‘साम्राज्यवादी’ तक कहने लगे थे.

भारत में सोवियत संघ को अपना भला दिखा

इस कारण सोवियत नेताओं को इस बात में विशेष रुचि नहीं रह गयी थी कि सुरक्षा परिषद में चीन के नाम वाली स्थायी सीट भविष्य में माओ त्से तुंग के चीन को ही मिलनी चाहिये. वे चीन वाली सीट पर से ताइवान को हटा कर भारत को बिठाने के अमेरिकी प्रयास का या तो विरोध नहीं करते या कुछ समय के लिए विरोध का केवल दिखावा करते.

ताइवान को मिली हुई सीट भारत को देने पर संयुक्त राष्ट्र का चार्टर बदलना भी नहीं पड़ता. संयुक्त राष्ट्र महासभा में दो-तिहाई बहुमत ही इसके लिए काफ़ी होता. चार्टर में संशोधन की बात तभी आती, जब सीटों की संख्या बढ़ानी होती. बुल्गानिन के कहने के अनुसार, सोवियत संघ 1955 में इसके लिए भी तैयार था. यह संशोधन क्योंकि भारत के लिए होता, जिसे अमेरिका खुद ही 1953 तक सुरक्षा परिषद में देखना चाहता था, इसलिए बहुत संभव था कि वह भी संशोधन का ख़ास विरोध नहीं करता.

1950 वाले दशक में संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन भी, आज की अपेक्षा, आसान ही रहा होता. उस समय आज के क़रीब 200 की तुलना में आधे से भी कहीं कम देश संयुक्त राष्ट्र के सदस्य थे. उन्हें मनाना-पटाना आज जितना मुश्किल नहीं रहा होता. सोवियत नेता भी ज़रूर जानते रहे होंगे– जैसा कि नेहरू ने 1955 में बुल्गानिन से स्वयं कहा भी– कि अमेरिका और उसके छुटभैये ब्रिटेन व फ्रांस भी कुछ ही साल पहले ताइवान को हटा कर उसकी सीट भारत को देना चाहते थे. अतः यह मानने के पूरे कारण हैं कि सोवियत नेता भारत की सदस्य़ता को लेकर गंभीर थे, न कि हवाबाज़ी कर रहे थे.

हेनरी किसिंजर की गुप्त यात्रा

ताइवान 1971 तक चीन वाली सीट पर बैठा रहा. उस साल अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर पाकिस्तान होते हुए नौ जुलाई को गुप्त रूप से बीजिंग पहुंचे. घोषित यह किया गया कि वे अगले वर्ष राष्ट्रपति निक्सन की चीन यात्रा की तैयारी करने गये हैं. बीजिंग में वार्ताओं के समय तय हुआ कि निक्सन की यात्रा से पहले ताइवान को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट से हटा कर उसकी सीट कम्युनिस्ट चीन को दी जायेगी. इस निर्णय से यह भी सिद्ध होता है कि अमेरिका 1970 वाले दशक में भी सुरक्षा परिषद को अपनी पसंद के अनुसार उलट-पलट सकता था.

चीन को लाने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा में 25 अक्टूबर 1971 को मतदान हुआ. संयुक्त राष्ट्र के उस समय के 128 सदस्य देशों में से 76 ने चीन के पक्ष में और 35 ने विपक्ष में वोट डाले. 17 ने मतदान नहीं किया. दो-तिहाई के अवश्यक बहुमत वाले नियम से प्रस्ताव पास हो गया. ताइवान से न केवल सुरक्षा परिषद में उसकी सीट छीन ली गयी, संयुक्त राष्ट्र की उसकी सदस्यता भी छिन गयी. उसकी सीट पर 15 नवंबर 1971 से चीन का प्रतिनिधि बैठने लगा.

नेहरू ने देशहित की चिंता की होती, तो कम से कम 60 वर्षों से भारत का प्रतिनिधि भी वीटो-अधिकार के साथ वहां बैठ रहा होता. कश्मीर समस्या भी शायद कब की हल हो चुकी होती. सोवियत संघ को भारत की लाज बचाने के लिए दर्जनों बार अपने वीटो-अधिकार का प्रयोग नहीं करना पड़ता.

सुनहरा अवसर हाथ से निकला

आज स्थिति यह है कि भारत चाहे जितनी एड़ी रगड़ ले, वह तब तक सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं बन सकता, जब तक इस परिषद का विस्तार नहीं होता और चीन भी उसके विस्तार तथा भारत की स्थायी सदस्यता की राह में अपने किसी वीटो द्वारा रोड़े नहीं अटकाता. चीन भला क्यों चाहेगा कि वह एशिया में अपने सबसे बड़े प्रतिस्पर्धी भारत के लिए सुरक्षा परिषद में अपनी बराबरी में बैठने का मार्ग प्रशस्त करे? 1950 के दशक जैसा सुनहरा मौका न तो भारत के लिए और न हिंदी के लिए दुबारा आयेगा. सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट हिंदी को अपने आप एक विश्वभाषा बना देती.