उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (इलाहाबाद) में 15 जनवरी से शुरू होने वाले अर्धकुंभ (हालांकि सरकार इसे कुंभ ही कह रही है) की तैयारी जोर-शोर से चल रही है. इसके लिए पूरे शहर को किसी ‘आर्ट गैलरी’ जैसा रूप दिया जा रहा है. इमारतों, दीवारों और पेड़ों पर कलाकृतियां बनाकर शहर का सौंदर्यीकरण हो रहा है.

इसके साथ ही शहर को स्मार्ट बनाने का काम भी चल रहा है. करीब 15 लाख की आबादी वाले इस प्राचीन शहर को स्मार्ट सिटी बनाने का ऐलान साल 2017 में किया गया था. अर्द्धकुंभ को ध्यान में रखते हुए अब प्रयागराज को ‘स्मार्ट लुक’ देने काम का काफी तेजी से किया जा रहा है. हालांकि शहर के मुख्य इलाके यानी सिविल लाइन्स के आस-पास के इलाके को छोड़ दें तो कुंभ से पहले इस तैयारी के आधी-अधूरी रहने की ही अधिक संभावना है.

शहर को ‘स्मार्ट’ बनाने के लिए कई इलाकों में सड़क चौड़ीकरण और अन्य परियोजनाओं के लिए बड़ी संख्या में दुकानों-मकानों को तोड़ा गया है. इसकी वजह से प्रभावित इलाके के दुकानदारों के सामने बेगारी की स्थिति पैदा हो गई है. साथ ही, स्थानीय लोगों को कई अन्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है.

प्रशासन द्वारा गिराया गया एक मकान
प्रशासन द्वारा गिराया गया एक मकान

अल्लापुर इलाके में अंधेरा ढलने से ठीक पहले हमारी मुलाकात अधेड़ उम्र के अवधेश कुमार से होती है. वे इलाके में स्थित एक मंदिर की देखभाल करते हैं और उसके पास ही ठेले पर अपनी छोटी सी दुकान लगाते हैं. अवधेश बताते हैं, ‘छह महीने पहले से काम चल रहा है लेकिन, अब तक पूरा नहीं हुआ है. धूल खाते-खाते लोग बीमार हो रहे हैं.’

हमारे साथ बातचीत करने से पहले अवधेश मंदिर की साफ-सफाई में लगे हुए थे. सड़क को चौड़ा करने के लिए इस मंदिर का अगला हिस्सा तोड़ दिया गया है. इसकी वजह से इसमें विराजमान सभी मूर्तियां धूल खा रही हैं. क्या मंदिर को दूसरी जगह बनाने के लिए सरकार की ओर से जमीन नहीं दी गई है? इसके जवाब में अवधेश कहते हैं, ‘सरकार ने कहा था कि पार्क में जगह देंगे, वहां शिफ्ट (मंदिर को) कर दीजिएगा. लेकिन अब इससे मना कर दी है. खुद से लेबर लगवा कर हमने मंदिर का अगला हिस्सा तोड़ा है. अब कह रहे हैं कि मंदिर का और हिस्सा तोड़ा जाएगा.’ अवधेश आगे चिंता भरी आवाज में अपनी तकलीफ भी साझा करते हैं. कहते हैं, ‘मंदिर के बगल में पान की दुकान करते हैं. लग रहा है वो भी जाएगी.’

अल्लापुर स्थित सड़क किनारे मंदिर
अल्लापुर स्थित सड़क किनारे मंदिर

हम अवधेश से बात ही कर रहे होते हैं कि तभी हिंदू और मुसलमानों की मिली-जुली आबादी वाले इस इलाके की एक मस्जिद से अजान की आवाज सुनाई देती है. यह मस्जिद भी पास में ही है. मंदिर की तरह इसके भी अगले हिस्से को सड़क चौड़ी करने के लिए तोड़ दिया गया है. प्रयागराज में ऐसा केवल इन्हीं धार्मिक स्थलों के साथ नहीं किया गया है बल्कि, शहर को स्मार्ट बनाने के रास्ते में आने वाली इस तरह की तमाम रुकावटों को हटाया जा रहा है. स्थानीय लोग बताते हैं कि इमारतों और धार्मिक स्थलों को ढहाने के लिए प्रशासन पूरी तैयारी के साथ पहुंचता है जिसके चलते लोगों में विरोध करने की हिम्मत नहीं होती.

अल्लापुर में एक सड़क किनारे स्थित मस्जिद
अल्लापुर में एक सड़क किनारे स्थित मस्जिद

शहर का जिस तरीके से ‘मेकअप’ किया जा रहा है, उससे प्रभावित होने वालों में आलोपीबाग के प्रहलाद नारायण भी हैं. वे अपनी उम्र 75 साल बताते हैं. उनके साथ उनकी पत्नी भी हैं. दोनों जन कई साल से बर्तनों की दुकान चलाते हैं. वे बताते हैं कि पहले रोज 5000 रुपये तक की चीजें बेच लेते थे. लेकिन, अब 500 रुपये की बिक्री भी मुश्किल हो गई है. उनकी दुकान के पास स्थित शौचालय को भी तोड़ दिया गया है. इस वजह से उनके साथ अन्य दुकानदारों के लिए मुश्किल हो गई है, खासकर महिलाओं को.

आलोपीबाग में सड़क चौड़ीकरण के चलते तोड़ी गई बर्तन की दुकान
आलोपीबाग में सड़क चौड़ीकरण के चलते तोड़ी गई बर्तन की दुकान

प्रहलाद नारायण कहते हैं, ‘महाराज जी हम लोगों से किराया लेते हैं, लेकिन इसका रसीद नहीं देते. इतना करते हैं कि कॉपी पर लिख देते हैं, 100 रुपये पाया. उसमें ये नहीं लिखते हैं कि किराया पाया.’ महाराज जी के बारे में पूछने पर वे बताते हैं, ‘निर्वाणी अखाड़ा वाले बाबाजी हैं. दारागंज में उनका मकान है.’ प्रहलाद आगे कहते हैं, ‘अफसर सब कहते हैं कि बाकी का हिस्सा (मकान) भी ले लेंगे. हमारा तो एक कमरा बचा है. अब उसमें भी नीयत लगाए हैं. क्या करें? 15 दिसंबर से तोड़-फोड़ हुआ है. अब कोई व्यवस्था नहीं है. जो बचा हुआ है, वह खत्म हो जाएगा तो अपने गांव चले जाएंगे.’

प्रहलाद नारायण से थोड़ी दूरी पर दुकान लगाने वालीं सुषमा गुप्ता कड़ी जुबान में आदित्यनाथ सरकार के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर करती हैं. वे कहती हैं, ‘इतनी महंगाई बढ़ी है लेकिन, ऐसी परेशानी कभी नहीं आई है, भैय्या. अखिलेश हैं, क्या नाम है....कांग्रेसी हैं सब. ई लोग महंगाई जो दी लेकिन, इतना परेशान नहीं किया. किसी को घर से निकाल कर सड़क पर फेंक देंगे तो उसके दिल पर क्या बीतेगी!’ सुषमा के परिवार में छह सदस्य हैं. वे बताती हैं कि उनके पति का दो बार ऑपरेशन हुआ है और उन्हें पेशाब-पाखाना कराने के लिए भी बिस्तर से उठाकर ले जाना पड़ता है.

इस तरह की तकलीफों से शहर के निवासियों को ही नहीं बल्कि, इसे स्मार्ट बनाने के काम में लगे मजदूरों को भी दो चार होना पड़ रहा है. हमने पाया कि पूरे शहर में जहां भी निर्माण कार्य चल रहा है वहां मजदूर कड़कड़ाती ठंड में सड़क किनारे तंबू के नीच रहने को विवश हैं. अधिकांश मजदूर अपने परिवार के साथ हैं. इनमें से कई की बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाएं सामने आ चुकी हैं.

सिविल लाइंस से संगम की ओर जाने वाली सड़क किनारे मजदूरों के रहने की जगह
सिविल लाइंस से संगम की ओर जाने वाली सड़क किनारे मजदूरों के रहने की जगह

बीती 27 दिसंबर की रात को मध्य प्रदेश के सतना के रहने वाले एक मजदूर की सात साल की बच्ची के साथ बलात्कार की घटना सामने आई. यह परिवार सड़क किनारे झोपड़ी बनाकर रह रहा था. इससे पहले भी इस तरह की दो घटनाएं सामने आई थीं. इन मजदूरों के पास न तो सर्दी से बचाव के लिए पुख्ता व्यवस्था है और न ही सरकार की ओर से आसामाजिक तत्वों से खुद को सुरक्षित रखने के लिए. इसके अलावा उन्हें तमाम अन्य परेशानियों से भी जूझना पड़ता है.

‘पूरी मजदूरी रोज नहीं मिलती. केवल खर्चा-पानी के लिए हर मजदूर को 100 रुपये दिया जाता है. आठ दिन के बाद हिसाब होता है. पिछला हिसाब बाकी है. और इससे पहले 10 दिनों का भी. ठेकेदार कहते हैं काम पूरा होने के बाद ही मजदूरी मिलेगी.’

ये शब्द पप्पू आदिवासी के हैं जो शहर से करीब 40 किमी दूर स्थित एक गांव के रहने वाले हैं. वे भी अपने पूरे परिवार के साथ ही सड़क किनारे रहते हैं. उनके साथ उनकी पत्नी भी मजदूरी करती हैं. वे आगे कहते हैं, ‘हम लोग कमाते हैं तब खाते हैं. कमाने वाले आदमी हैं, बैठकर नहीं खा सकते. चार-दस दिन काम किया और पांच दिन बैठकर खा लिया तो छठवें दिन भोजन नहीं मिलेगा.’

प्रयागराज को जिन हाथों के सहारे स्मार्ट बनाया जा रहा है उनमें केवल बड़े और कठोर हाथ ही नहीं बल्कि, छोटे-छोटे नरम हाथ भी शामिल हैं. सिविल लाइंस बस स्टैंड से संगम की ओर जाने वाली मुख्य सड़क पर सुबह-सुबह हमारी मुलाकात अनिल कुमार से होती है. उनके साथ दो बच्चे भी दिखते हैं. एक अपनी उम्र करीब 14 साल बताता है तो दूसरा उससे चार साल छोटा है. दोनों सड़क पर डिवाइडर बनाने के काम में लगे हुए हैं. इसके लिए उन्हें भी अन्य की जगह 350 रुपये रोज का मिलता है. इस बारे में जब हमने लोक निर्माण विभाग के चीफ इंजीनियर हिमांशु मित्तल से प्रतिक्रिया लेनी चाही तो उन्होंने इससे इनकार कर दिया. उनका घर भी इन मजदूरों के अस्थायी तंबुओं के करीब ही स्थित है.

निर्माण कार्य में लगा 10 वर्षीय बाल मजदूर
निर्माण कार्य में लगा 10 वर्षीय बाल मजदूर

शहर को स्मार्ट बनाने के लिए मोटर-गैरेज और चाय-नाश्ते के ठेलों को भी मुख्य सड़कों के फुटपाथ से हटाया जा रहा है. सिविल लाइंस बस स्टैंड के पास स्थित एक चाय वाले ने अपना नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘पुलिस जब किसी दुकानदार को पकड़कर थाने ले जाती है तो उससे कबूलनामे पर साइन करवाती है. उसमें लिखा होता है कि वो आगे से अपनी दुकान फुटपाथ पर नहीं लगाएगा.’ इस चक्कर में इस चाय वाले ने अपनी दुकानदारी का टाइम तड़के सुबह से लेकर आठ बजे तक कर दिया है. पुलिस के चक्करों से बचने के लिए इन चार घंटों में जितनी कमाई होती है, उसी से इस जैसे कई दुकानदार संतोष कर लेते हैं.

दूसरी ओर, इस शहर में एक तबका ऐसा भी है जो सरकार के इन कामों से काफी खुश दिखता है. इनमें से अधिकांश मध्यम वर्ग, नौकरीपेशा और बड़े कारोबारी हैं. इलाहाबाद विश्वविद्यालय के करीब स्थित संदीप अग्रवाल शादियों में लाइटिंग का कारोबार करते हैं. उनका कहना है कि इलाहाबाद में अब तक किसी भी सरकार ने इस तरह से काम नहीं किया. उनके मुताबिक योगी सरकार ने शहर का पूरा नक्शा ही बदल दिया है. हालांकि, इसके साथ वे यह भी कहते हैं कि काम मजबूती से नहीं हो रहा है. संदीप अग्रवाल की मानें तो काम कितना पक्का हुआ है इसका पता इस साल बरसात के बाद ही लगेगा.