2019 के लोकसभा चुनावों को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं. खबरिया चैनलों ने कुछ सर्वेक्षण भी किए हैं. हर सर्वेक्षण में अलग-अलग तस्वीर उभरकर सामने आ रही है. मोटे तौर पर इस बात पर हर कोई सहमत है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की अध्यक्षता वाली भारतीय जनता पार्टी उतनी मजबूत स्थिति में आज नहीं है, जितनी वह तकरीबन साल भर पहले थी.

हाल ही में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भाजपा की हार के बाद अगले लोकसभा चुनावों को लेकर पार्टी की स्थिति ठीक नहीं बताई जा रही है. वहीं उत्तर प्रदेश में धुर विरोधी माने जाने वाली मायावती की बहुजन समाज पार्टी और अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन पक्का होने से भी भाजपा की संभावनाएं कमजोर पड़ी हैं. भले ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह यह दावा कर रहे हों कि पिछली बार की 73 सीटों के मुकाबले भाजपा इस बार 74 सीटें जीतेगी लेकिन, ज्यादातर लोग यह मान रहे हैं कि सपा-बसपा गठबंधन की स्थिति में भाजपा को सिर्फ उत्तर प्रदेश में तकरीबन 50 सीटों का नुकसान हो सकता है.

दूसरी तरफ मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की स्थिति सुधरी है. कर्नाटक में भी कांग्रेस और जनता दल सेकुलर के गठबंधन के बाद वहां भी लोकसभा चुनावों में भाजपा की स्थिति कमजोर हो सकती है. वहीं गुजरात में भी कांग्रेस को कुछ सीटों के फायदे की उम्मीद की जा रही है. इन वजहों से भाजपा को जिन नुकसानों की आशंका है, उसकी भरपाई पूर्वोत्तर भारत, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में भाजपा को होने वाले संभावित फायदों से होती नहीं दिख रही है.

इस पृष्ठभूमि में विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं, राजनीतिक विश्लेषकों और राजनीति में रुचि रखने वाले लोगों से बातचीत करने पर अगले लोकसभा चुनावों के बाद तीन राजनीतिक परिस्थितियां बनती दिख रही हैं.

पहली स्थिति

उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन के बावजूद अगर भाजपा अपने नुकसान को कम करने में कामयाब होती है और पिछली बार की 73 सीटों के मुकाबले तकरीबन 30 सीटें भी जीतने में कामयाब रहती है तो उसकी सीटें 200 से 220 के बीच रह सकती हैं, क्योंकि 2014 में भाजपा को 284 सीटें मिली थीं. मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक में होने वाले नुकसानों की भरपाई काफी हद तक भाजपा पूर्वोत्तर, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु से कर सकती है. ऐसे में उसे 70 से 80 सीटों के नुकसान की आशंका है.

अगर भाजपा 200 से 220 सीटों के बीच रहती है तो अपने सहयोगियों की सीटों की मदद से वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की बहुमत वाली सरकार बनाने के करीब पहुंच जाएगी. अब भी उसके पास पर्याप्त सहयोगी हैं. अभी भले ही शिव सेना भाजपा से तकरार की स्थिति में हो लेकिन, राजनीतिक तौर पर देखा जाए तो शिव सेना के पास भाजपा के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं है. अगर भाजपा की 200 से 220 सीटें रहती हैं तो ऐसे में कांग्रेस के लिए 100 के आंकड़े को पार करना भी मुश्किल होगा और उसके लिए कोई संभावना बन पाना बेहद मुश्किल हो जाएगा.

दूसरी स्थिति

अगर भाजपा को उत्तर प्रदेश में भारी नुकसान हो और मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और गुजरात में कांग्रेस की स्थिति 2014 के मुकाबले थोड़ी भी सुधर जाए तो क्या होगा? ऐसे में भाजपा 200 के नीचे जाती दिख रही है. तब पार्टी की सीटें 180 से 200 के बीच में रह सकती हैं. 2014 के चुनावों के पहले 1999 में भाजपा ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया था. उस वक्त भी उसकी सीटें इसी दायरे में रही थीं.

भाजपा के 180 से 200 के बीच रहने का मतलब यह भी है कि कांग्रेस 100 से 120 के दायरे में रहेगी. लेकिन तब भी कांग्रेस के लिए सरकार बनाना बेहद मुश्किल होगा. क्योंकि 180 से 200 सीटों वाली भाजपा अपने सहयोगियों के साथ 240 सीटों के आसपास रह सकती है. ऐसे में उसे सरकार बनाने के लिए तकरीबन 35 सीटों की जरूरत पड़ेगी. इसके लिए भाजपा अपने पुराने सहयोगियों को फिर से अपने पाले में लाने की कोशिश कर सकती है. इनमें वह चंद्रबाबू नायडू, चंद्रशेखर राव और नवीन पटनायक की ओर उम्मीद से देख सकती है.

ऐसी स्थिति में इस बात की बहुत संभावना है कि ये लोग भाजपा का साथ दे दें. क्योंकि चंद्रबाबू नायडू अपनी पार्टी पर केंद्र सरकार की निर्भरता का फायदा किस तरह उठाते हैं, यह पूरे देश ने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के कार्यकाल के दौरान देखा है. इनमें से कुछ दल नरेंद्र मोदी की जगह किसी और को प्रधानमंत्री बनाने की मांग कर सकते हैं लेकिन मोदी और शाह की राजनीतिक शैली को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि 240 सीटों वाले एनडीए के लिए वे 30 से 35 सीटों की व्यवस्था नरेंद्र मोदी के नाम पर कई माध्यमों से कर सकते हैं.

तीसरी स्थिति

तीसरी स्थिति यह बताई जा रही है कि भाजपा 160 से 180 सीटों के बीच सिमट जाए और उसके मौजूदा सहयोगियों को मिलाकर यह आंकड़ा 220 सीटों के आसपास रहे. यह परिस्थिति तब पैदा हो सकती है जब उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा भाजपा का उसी तरह से सूपड़ा साफ कर दें जिस तरह से बिहार में 2015 के विधानसभा चुनावों में राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यूनाइटेड ने मिलकर किया था. अगर ऐसा होता है तो भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश में दो अंकों में पहुंच पाना मुश्किल हो जाएगा. इसका मतलब यह हुआ कि भाजपा को सूबे में तकरीबन 65 सीटों का नुकसान हो सकता है.

ऐसे ही पिछले आम चुनाव में भाजपा ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की कुल 65 सीटों में से 62 सीटें हासिल की थीं. लेकिन अगर इन तीनों राज्यों की नई कांग्रेस सरकार ने लोगों को अपने साथ बनाए रखा और इस वजह से भाजपा को इन तीनों राज्यों में 30 सीटों का नुकसान हो जाए तो भाजपा 160 से 180 के दायरे में पहुंच सकती है. इसलिए भी क्योंकि कर्नाटक, गुजरात, झारखंड, उत्तराखंड और दिल्ली में भी 2014 का प्रदर्शन दोहरा पाना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा.

अगर भाजपा की सीटें 160 से 180 के बीच रहती हैं तो इसका मतलब यह हुआ कि कांग्रेस 140 सीटों के आसपास पहुंच सकती है. अपने सहयोगियों के साथ मिलकर उसकी सीटें 200 के आसपास रह सकती हैं. सपा-बसपा अभी कांग्रेस के साथ राष्ट्रीय राजनीति में गठबंधन में नहीं हैं. लेकिन अगर ये दोनों पार्टियां मिलकर भाजपा को दो अंकों में पहुंचने में रोक पाती हैं तो इन दोनों के सामने कांग्रेस के साथ आने का विकल्प रहेगा. ऐसे में कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार केंद्र में बनने की संभावना बन सकती है जिसमें क्षेत्रीय दल बहुत मजबूत स्थिति में अहम मंत्रालयों में रहेंगे.