आजादी के बाद भारत का सबसे बड़ा कर सुधार माना जा रहा जीएसटी (गुड्स एंड सर्विस टैक्स) इस समय रिवर्स गियर में है. आधी रात को धूमधाम के साथ संसद में जिसे देश की दूसरी आजादी कहा गया था, वह अब फीकी पड़ती जा रही है. अभी कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री ने कहा कि 99 फीसद वस्तुयें और सेवाएं जीएसटी के 18 फीसद स्लैब के दायरे में कर दी गई हैं. इसके कुछ दिनों ही बाद जीएसटी काउंसिल ने छोटी इकाइयों को राहत देते हुए जीएसटी में छूट की सीमा 20 से बढ़ाकर 40 लाख कर दी. विशेषज्ञ मानते हैं कि जीएसटी की जटिलताओं को दूर करने के बजाय रियायतों के पिटारे को खोलने का मकसद सिर्फ चुनावी है और आर्थिक सुधार के तौर पर यह अब दम तोड़ता दिख रहा है.

दुनिया का सबसे जटिल जीएसटी

जीएसटी को एक बड़े कर सुधार के तौर पर देखा-दिखाया जा रहा था और कहा जा रहा था कि यह भारत में कारोबार की बेहद जटिल कर प्रणाली को आसान कर देगा. लेकिन दुनिया के ज्यादातर देशों के विपरीत भारत में दो की जगह चार कर दरों - 5, 12, 18, 28 फीसदी - वाला जीएसटी आया. विश्व बैंक ने अपनी एक रिपोर्ट में इसे दुनिया का सबसे जटिल जीएसटी बताया है. उसने कहा कि भारतीय जीएसटी में न केवल बहुत सारी कर दरें हैं, बल्कि ये बहुत ऊंची भी हैं. एचएसबीसी ने भी अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि जीएसटी से सबसे बड़ी उम्मीद थी कि यह अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाएगा और पूरा कारोबार जगत इसके दायरे में होगा. लेकिन इसमें वह असफल रहा है.

जीएसटी के लागू होते ही समझ में आने लगा था कि कौन सी वस्तु किस स्लैब में रखनी है, इसको लेकर पूरी तैयारी नहीं की गई है. कारोबार से जुड़े हर राज्य में पंजीकरण और हर महीने तीन रिटर्न भरने की परेशानी और फिर कंप्यूटर नेटवर्क की मुश्किलों ने छोटे कारोबारों को पंगु कर दिया. कर वापसी में होने वाली देरी ने रही-सही कसर पूरी कर दी. जानकार मानते हैं कि इसका परिणाम यह हुआ कि जो छोटे कारोबारी जीएसटी को लेकर उत्साहित हुआ करते थे, वे धीरे-धीरे इससे डरने लगे. इसके बाद यह कारोबारी सुगमता के बजाय चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का स्वर्ग बनकर रह गया. इसे लागू हुए डेढ़ साल हो गये हैं लेेकिन जीएसटी नेटवर्क की दिक्कतें अभी तक दूर नहीं हो पाई हैं. इससे कई मायनों में मोदी सरकार के डिजिटल इंडिया के दावों की पोल भी खुल जाती है.

सरकारी अदूरदर्शिता और आधी-अधूरी तैयारी

उदारीकरण के बाद आर्थिक सुधार के ज्यादातर कार्यक्रम संगठित क्षेत्र या बड़ी कंपनियों के लिए थे. जीएसटी को एक ऐसे सुधार के रूप में देखा जा रहा था जो भारत के छोटे-कारोबार के ढर्रे को बदल देगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. अति-आत्मविश्वास की शिकार केंद्र सरकार ने छोटे कारोबारियों से संवाद करने की जरूरत ही नहीं समझीं. जीएसटी लागू करने के लिए किस तरह के कंप्यूटर नेटवर्क जरूरत होगी और पूरा देश इसके लिए तैयार है या नहीं, इस बात की पूरी जांच परख नहीं की गई. यही वजह रही कि इसके लागू होने के बाद जिन मंत्रियों और सांसदों को इसके प्रचार के लिए लगाया गया था, उन्हें कारोबारियों की नाराजगी का शिकार होना पड़ा.

जानकार मानते हैं, जीएसटी अपने स्वरूप में जटिल होना ही था, लेकिन आनन-फानन में इसे लागू करने और इसे ब्रांडिंग के तौर पर इस्तेमाल करने की जल्दी में सरकार ने इस ओर ध्यान हीं नहीं दिया. इसके बाद बार वस्तुओं और सेवाओं की टैक्स दरें बदली जाती रहीं और रिटर्न फाइलिंग की तारीखें बढ़ती रहीं. जीएसटीएन की गड़बड़ियों के कारण मध्यम दर्जे के कारोबारियों के रिफंड के लाखों रूपये एक लंबे समय तक फंसे रहे. इसके अलावा एक राज्य से दूसरे राज्य में कारोबार करने के लिए ई-वे बिल जैसी व्यवस्था जिस दिन शुरु हुई उसी दिन नेटवर्क बैठ गया और इसे आगे के लिए टाल दिया. इसके बाद इसकी भी तारीखें बढ़ती रहीं और अब भी यह व्यवस्था पूरी तरह से पटरी पर नहीं आ पाई है. कारोबारियों और जानकारों के मुताबिक कंप्यूटर से निकले एक बिल से पूरे देश में कारोबार करने और वन नेशन, वन टैक्स जैसी बातें अब सिर्फ सरकारी प्रचार बनकर रह गई हैं.

भ्रष्टाचार और इंस्पेक्टर राज जस का तस

माना जा रहा था कि जीएसटी आने के बाद कंप्यूटर आधारित सिस्टम होने से कारोबार साफ-सुथरा होगा और इंस्पेक्टर राज में कमी आएगी. लेकिन जानकार मानते हैं कि जीएसटी का प्रारुप ही ऐसा पेंचीदा बनाया गया कि इसने टैक्स अधिकारियों के दखल को कम करने के बजाय बढ़ा दिया है.

जानकार मानते हैं कि करदाताओं के बही-खाते जांचने के लिए राज्यों और केंद्र के बीच जो सहमति बनी है कि उससे कारोबारियों का दोनों जगह के कर अधिकारियों से पाला पड़ने वाला है. तय व्यवस्था के मुताबिक 1.5 करोड़ से कम टर्नओवर वाले कारोबारियों का ऑडिट राज्य सरकार करेगी और उससे ऊपर वालों का केंद्र सरकार. लेकिन जानकार मानते हैं कि बहुत सारे कारोबारियों का टर्न ओवर हर साल ऊपर नीचे होता है और उन्हें दोनों जगहों के कर अधिकारियों की ‘सेवा’ करनी पड़ रही है.

इसके अलावा जिस राज्य में कारोबार करना है, वहां भी पंजीकरण अनिवार्य होने से कारोबारी को हर राज्य में रजिस्ट्रेशन कराना होता है. किसी भी टैक्स विवाद को चुनौती देने से पहले 10 से 25 फीसद टैक्स पहले जमा करने के नियम ने भी अधिकारियों को और ताकत दी है. यानी जिस जीएसटी को इंस्पेक्टर राज के खात्मे की घोषणा कहा जा रहा था, उसने नए सिरे से इसकी वापसी की है.

अपनी जटिलताओं के साथ लगातार टैक्स चोरी के बढते मामले भी जीएसटी की नई समस्या हैं. जानकार मानते हैं कि अभी कच्चे बिल पर धड़ल्ले से कारोबार किया जा रहा है और चालान में गडबड़ी की जा रही है. जीएसटी की जांच शाखा ने कई जगह से सैंकड़ों करोड़ की चोरी के मामले पकड़े हैं. यानी जीएसटी लागू होने के बाद भ्रष्टाचार या इंस्पेक्टर राज में कोई कमी आई हो, ऐसा दिखता नहीं है.

सिर्फ बड़ी कंपनियों के सहारे चल रहा जीएसटी

जीएसटी सभी कारोबारियों को एक टैक्स ढांचे के तहत समेटने में किस तरह से असफल रहा है, कुछ आंकड़े इसकी तस्दीक करते हैं. केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड के सदस्य जॉन जोसेफ ने जीएसटी के एक साल पूरे होने से जरा पहले कहा था कि जीएसटी के तहत 1.11 करोड़ कारोबारी इकाइयां रजिस्टर्ड हैं, लेकिन अस्सी फीसद जीएसटी की वसूली महज एक फीसद इकाइयों से हो रही है.

जीएसटी संग्रह के ये आंकड़े अर्थशास्त्रियों को चिंतित करने वाले हैं. जानकार मानते हैं कि जीएसटी के राजस्व संग्रह में फिलहाल बड़ी कंपनियों का ही योगदान है. जानकारों के मुताबिक जीएसटी से पहले भी यह वर्ग मुख्य करदाता था और अब भी है. छोटे कारोबारियों और नए पंजीकृत लोगों ने रियायतों और नियमों का सहारा लेकर खुद को टैक्स के दायरे से बाहर कर लिया है और इसके चलते टैक्स चोरी की एक नई व्यवस्था भी ईजाद हो गई है.

विशेषज्ञ मानतें हैं कि मोदी सरकार को उम्मीद थी जीएसटी लागू होने के बाद एक लाख करोड़ रुपये का मासिक राजस्व आएगा. लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए सरकार भी मान चुकी है कि इस लक्ष्य को पाना आसान नहीं है. आगे चुनाव होने के नाते टैक्स से बचने वालों पर सख्ती की कोई उम्मीद भी नहीं दिखती. विशेषज्ञ कहते हैं कि जीएसटी का सबसे बड़ा मकसद था - कम टैक्स हो, सभी लोग टैक्स दे और कारोबार सुगम हो. लेकिन मौजूदा हालत को देखते हुए कहा जा सकता है कि यह मकसद दम तोड़ चुका है.

अब चुनावी दुष्चक्र में फंसा जीएसटी

केंद्र की भाजपा सरकार ने जब जीएसटी लागू किया था तब वह चुनावी सफलता के रथ पर सवार थी. जानकार मानते हैं कि जीएसटी के लागू होने के तरीके से सबसे ज्यादा प्रभावित उसका परंपरागत वोटर होने वाला था, लेकिन उस वक्त मोदी सरकार के सलाहकारों ने जमीनी हालत का अंदाजा लगाने की जरुरत नहीं समझी और जीएसटी के पूरे डिजाइन को नौकरशाही के भरोसे छोड़ दिया गया. लेकिन जब सरकार धरातल पर आई तो उसे लघु और मध्यम कारोबारियों की नाराजगी का एहसास हुआ.

इसकी शुरुआत गुजरात चुनाव से हुई और सरकार ने जीएसटी की दरों में बदलाव से लेकर छूट तक के प्रावधान लाने शुरू कर दिए. अब लोकसभा चुनाव से पहले इसमें इतनी छूट और रियायतें दी जा रही हैं कि जीएसटी का ढांचा करीब-करीब सिर के बल खड़ा हो गया है. जानकार मानते हैं कि केंद्र सरकार ने जीएसटी लागू होने के 18 महीने बाद मान लिया है कि आर्थिक सुधार के मोर्चे पर यह नई कर प्रणाली कुछ खास नहीं कर पाई है. ऐसे में सरकार लोकसभा चुनाव से पहले छोटे कारोबारियों को रियायतें देने और जीएसटी की दरों में बदलाव करने में लगी हुई है. जाहिर सी बात है कि कर सुधार से इनका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है. चुनाव के बाद भी जीएसटी की नियति क्या होगी, कुछ कहा नहीं जा सकता. यह इस बात पर निर्भर करता है कि आने वाली सरकार जीएसटी को बतौर कर सुधार कितनी गंभीरता से लेती है.