निर्देशक : आदित्य धर

लेखक : आदित्य धर

कलाकार : विकी कौशल, यामी गौतम, परेश रावल, कीर्ति कुल्हारी, मोहित रैना, रजित कपूर, स्वरूप संपत

रेटिंग : 2/5

‘उरी’ का शिल्प उम्दा है. फिल्म देखते वक्त आपको लगेगा नहीं कि निर्देशक आदित्य धर की यह पहली फिल्म है. हाल-फिलहाल की प्रोपेगेंडा फिल्मों की तुलना में इसका क्राफ्ट गुणवत्ता लिए है और एक प्रतिभावान फिल्मकार के आगाज की मुनादी करता है.

एरियल शॉट्स से लेकर रात में फिल्माए गए कॉम्बेट सीन्स तक में हॉलीवुड एक्शन-फिल्मों वाला स्तर नजर आता है. ‘नीरजा’ वाले सिनेमेटोग्राफर मितेश मीरचंदानी की मदद से रचे गए क्लोज-अप कॉम्बैट-दृश्य ‘जीरो डार्क थर्टी’ जैसी हॉलीवुड वॉर फिल्मों की याद दिलाते हैं और खासे प्रभावशाली बन पड़े हैं. इसमें उरी में हुए आतंकी हमले को बेहद कुशलता से रीक्रिएट किया गया है और उन दृश्यों को देखकर आप आतंकवादियों को लाख लानत भेजते ही भेजते हैं. एडीटिंग भी चुस्त है और फालतू का कोई सीन या गीत फिल्म के नेरेटिव में रुकावट नहीं डालता.

साथ ही, फिल्म उग्र राष्ट्रवाद का समर्थन करने वाली लाउड फिल्मों से अलग होने की भी भरसक कोशिश करती हुई दिखती है. भले ही उसके कई संवाद उग्र राष्ट्रवाद वाली कलम से ही लिखे गए हैं (‘उन्हें कश्मीर चाहिए, हमें उनका सर’), लेकिन ‘गदर’ जैसी दूसरी अति लाउड फिल्मों की तुलना में ‘उरी’ नफरत फैलाने वाले संवादों से खुद को दूर रखने की कोशिश तो करती ही है. 72 हूरों वाले जिस संवाद से उसका पहला ट्रेलर खत्म हुआ था उसे भी बाद में हटाकर नया ट्रेलर पेश किया गया था. और अब फिल्म में भी एक धर्म-विशेष के लोगों की छवि खराब करने वाले उस खराब संवाद को हटा हुआ देखकर खुशी मिलती है.

लेकिन, बावजूद इन ज्यादातर तकनीकी खूबियों के, मौजूदा सरकार की कामयाबियों में गिनी जाने वाली सर्जिकल स्ट्राइक पर बनी ‘उरी’ एक सरकारी विज्ञापन फिल्म से ज्यादा कुछ नहीं हो पाती. ज्यादा से ज्यादा, इसी विषय पर बनी उन सपाट डॉक्यूमेंट्रीज जैसी हो जाती है जिन्हें कि हम हिस्ट्री टीवी18 जैसे चैनलों पर पहले ही देख चुके हैं.

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इसकी एकमात्र वजह फिल्म और पटकथा में सेना और उसके जवानों से ज्यादा तवज्जो राजनीति को देना है. ‘उरी’ में सेना के जवानों का चेहरा केवल विकी कौशल बन पाते हैं, जबकि राजनीति का चेहरा मोदी जी (रजित कपूर) से लेकर राजनाथ सिंह, जेटली और पर्रिकर जैसे मौजूदा सरकार के मुख्य मंत्रीगण बनते हैं. इनके द्वारा लंबा स्क्रीन-स्पेस लेने के अलावा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से प्रभावित भूमिका में गोविंद भारद्वाज बनकर परेश रावल भी काफी देर तक छाए रहते हैं.

अजीत डोभाल से जुड़ी बहादुरी की व्हाट्सएप पर आने वाली कहानियों से प्रभावित होकर ही परेश रावल का किरदार गढ़ा भी गया है. वे कभी डीआरडीओ के एक ‘इंटर्न’ से कमाल का उपकरण बनवा लेते हैं जो कि सर्जिकल स्ट्राइक में अहम रोल निभाता है, तो कभी निर्णायक मौके पर वक्त बचाने के लिए ऑटो में बैठकर रायसेना हिल्स भी पहुंचते हैं! कई दूसरे असाधारण कार्य भी उन्होंने अंजाम दिए हैं, जिन्हें आप फिल्म देखकर ही जानें तो बेहतर.

ये सारे ही सम्मानित व्यक्ति मिलकर फिल्म में अहम फैसले लेते हुए बार-बार दिखाए जाते हैं और इनके लंबे-लंबे दृश्यों को जगह देने की वजह से ‘उरी’ कभी भी हमारे सैनिकों के मन-मस्तिष्क में नहीं उतर पाती. केवल विकी कौशल अपने अभिनय से – और ज्यादातर अपने साइलेंस से – उनकी मनोस्थिति बयां करते हैं. वरना एक भी और आर्मी का जवान फिल्म में किरदार बनकर छाते हुए नजर नहीं आता. थोड़ी देर के लिए मोहित रैना जरूर परदे पर प्रभाव छोड़ते हैं लेकिन सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान केवल विकी कौशल का मेजर विहान शेरगिल नामक किरदार ही वीरता का चेहरा बना रहता है. बाकी सभी आर्मी वाले किरदार केवल रिक्त स्थान भरते हैं.

बतौर दर्शक ‘बॉर्डर’ से लेकर ‘लक्ष्य’ देखने तक का अनुभव कहता है कि जब तक सैनिकों के स्वतंत्र किरदारों को स्थापित नहीं किया जाता, उन सभी की निजी जिंदगियों में झांकने का हमें मौका नहीं मिलता, उनके कॉन्फ्लिक्ट्स से हमारा परिचय नहीं होता, तब तक वॉर हीरोज असर नहीं छोड़ पाते. ‘बॉर्डर’ के बाद जेपी दत्ता की सारी ही वॉर मूवीज सिर्फ इसीलिए प्रभावहीन साबित हुईं क्योंकि उनके ढेर सारे आर्मी किरदार न प्रभावी लिखे गए, न ही स्क्रीन पर प्रभावी तरीके से रचे गए.

साफ बात है कि ‘उरी’ का फोकस अगर सिर्फ सेना का पराक्रम दिखाना होता – बिना राजनीतिक शो-बाजी के – तो पटकथा बेहतर कैरेक्टर बिल्ट करती और फिल्म की दर्शनीयता में खासा इजाफा हो जाता.

‘उरी’ की एक दूसरी बड़ी कमी पाकिस्तानी सेना व आतंकवादियों का कमजोर चित्रण है. अगर पड़ोसी देश की सेना और आतंकवादी आपकी फिल्म के मुख्य खलनायक हैं तो जब तक वे मजबूत नहीं दिखेंगे तब तक हमारे देश की विजय महान कैसे नजर आएगी! ‘उरी’ में सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान एक भी पाकिस्तानी गोली हिंदुस्तानी सैनिकों को छू नहीं पाती. भले ही खुले मैदान में भागते भारतीय सैनिकों पर एक पाकिस्तानी हैलीकॉप्टर लंबे वक्त तक गोलियां बरसाता है, लेकिन क्या मजाल कि एक भी भारतीय सैनिक बुरी तरह जख्मी हो जाए. यह अतिशयोक्ति किसी भी वॉरफिल्म को कमजोर करती है और सरकारी विज्ञापन फिल्मों वाले आलस्य का ही प्रदर्शन करती है.

ऊपर लिखी सारी बातें मिलकर क्या ‘उरी’ के राजनीतिक प्रोपेगेंडा फिल्म हो जाने की भी ताकीद नहीं करती हैं?

विकी कौशल का अभिनय ‘उरी’ में उम्दा है और वे मजबूत शरीर वाले मेजर की भूमिका बेहद ईमानदारी से निभाते हैं. न सिर्फ अपनी बॉडी लेंग्वेज और जोश से लबरेज संवादों से परदे पर छाते हैं बल्कि उनका साइलेंस भी बेजोड़ अभिव्यक्ति करता है. एक सैनिक दोस्त की मौत के बाद जोश से वॉर-क्रॉय देते वक्त जब तीसरी दफा उनके मुंह से शब्द नहीं निकलते तो उस क्षण वे अभिनय का चरम छूते हैं. आर्मी हीरोज को उग्र राष्ट्रवादी बनाकर स्टीरियोटाइप करने की बॉलीवुड की आदत के बावजूद अपने किरदार को मानवीय बनाकर ही वे सबसे बड़ी जीत हासिल करते हैं.

अभिनेत्रियों में से एक कीर्ति कुल्हारी फिल्म में बेवजह हैं और उनके किरदार की निजी जिंदगी की त्रासदी को प्रोफेशनल लाइफ से जोड़ने की कोशिश भी फिल्म फिजूल करती है. यामी गौतम एक काबिल एजेंट बनी हैं जो सीधे प्रधानमंत्री को ब्रीफ करती हैं लेकिन उन्हें फिल्म ज्यादातर वक्त साइड में खड़ा ही रखती है. जब एक इंटेरोगेशन सीन में उन्हें अपनी मौजूदगी मजबूती से दिखाने का मौका मिलता भी है, तब भी क्षण भर बाद विकी कौशल एक कुर्सी खींचकर उनसे वह सीन तक खींच लेते हैं.

‘उरी’ फिर भी देख लीजिए. लंबी सरकारी विज्ञापन फिल्में देखकर खीज उठने का मौका सबको मिलना चाहिए! जय हिंद!