2019 के लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस विभिन्न दलों से गठबंधन की दिशा में लगातार कोशिशें कर रही है. उधर, उसके कुछ नेताओं को यह लगता है कि पार्टी की ये कोशिशें उसकी बेचैनी को दिखा रही हैं. इन नेताओं की मानें तो कांग्रेस कई जगह ऐसे समझौते कर रही है जिससे उसके दीर्घकालिक हित नकारात्मक तौर पर प्रभावित हो सकते हैं.

किसी भी कीमत पर कांग्रेस के गठबंधन के प्रयासों की वजह से पार्टी को आंतरिक स्तर पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. सबसे नया मामला दिल्ली प्रदेश कांग्रेस का है. कुछ ही दिन पहले दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष के तौर पर अहम भूमिका में पार्टी में लाया गया. आने वाली 31 मार्च को शीला दीक्षित 81 साल की हो जाएंगी. उनसे पहले दिल्ली प्रदेश कांग्रेस की कमान अजय माकन के पास थी. माकन ने अपने अचानक इस्तीफे की वजह अपने खराब स्वास्थ्य को बताया है.

लेकिन कांग्रेस पार्टी के अधिकांश नेता अनौपचारिक बातचीत में यह स्वीकार करते हैं कि अजय माकन के इस्तीफे की असली वजह उनका स्वास्थ्य नहीं है. इन नेताओं का कहना है कि कांग्रेस आलाकमान अगले लोकसभा चुनावों को देखते हुए दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन के पक्ष में था, जबकि अजय माकन इसका विरोध कर रहे थे. गठबंधन की संभावना को लेकर जब बातचीत शुरू हुई तो अजय माकन ने बार-बार कहा कि इस दिशा में बढ़ना दिल्ली में कांग्रेस के भविष्य के लिए ठीक नहीं होगा. इसके बावजूद जब उनको यह लग गया कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व आप के साथ गठबंधन के पक्ष में है तो उन्होंने स्वास्थ्य का हवाला देकर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से खुद को मुक्त कर लिया.

लोकसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन को लेकर पंजाब कांग्रेस में भी आंतरिक खींचतान चल रही थी. पंजाब के बारे में भी कांग्रेस आलाकमान को यह लग रहा था कि अगर यहां पार्टी आप के साथ मिलकर चुनाव लड़ी तो भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल गठबंधन को बहुत बुरी तरह से हराया जा सकता है. इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और आप को मिले मत प्रतिशत को देखा जा रहा था. दिल्ली के बाहर पंजाब एक ऐसा राज्य है जहां आप की स्थिति अपेक्षाकृत ठीक है.

लेकिन पंजाब में कांग्रेस और आप के गठबंधन को लेकर प्रदेश कांग्रेस में आपसी सहमति नहीं थी. पंजाब के मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस के सबसे बड़े नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह खुद इस गठबंधन के पक्ष में नहीं थे. आप से संभावित गठबंधन को लेकर बीते दिनों कैप्टन अमरिंदर सिंह ने नई दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से भी मुलाकात की थी. बताया जा रहा है कि कैप्टन ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष को इस प्रस्तावित गठबंधन से प्रदेश कांग्रेस को होने वाले नुकसानों से अवगत कराया. उधर, राहुल गांधी की ओर से कैप्टन को यह समझाने की भी कोशिश हुई आप के साथ गठबंधन करने से कांग्रेस को दिल्ली और पंजाब में तो लाभ होगा ही, हरियाणा और गोवा में भी इसका थोड़ा फायदा हो सकता है. फिलहाल आप ने ऐलान कर दिया है कि वह दिल्ली और पंजाब में अकेले उतरेगी.

ऐसी ही स्थिति कर्नाटक कांग्रेस में दिख रही है. पिछले साल भाजपा को सरकार बनाने से रोकने के लिए कांग्रेस ने अधिक सीटें होने के बावजूद कम सीटों वाले जनता दल सेकुलर के नेता एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री की कुर्सी दे दी. यह फैसला सीधे-सीधे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का था. तब से प्रदेश में कुमारस्वामी की सरकार कांग्रेस के सहयोग से चल तो रही है लेकिन दोनों पार्टियों के गठबंधन में सहजता नहीं आई है. प्रदेश कांग्रेस के नेताओं ने पार्टी आलाकमान को लगातार कुमारस्वामी और जेडीएस की ओर से कांग्रेस को मजबूत करने की राह में अटकाए जा रहे रोड़ों से अवगत कराया है. इसके बावजूद पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का मानना है कि थोड़ा अपमान सहकर भी 2019 के लोकसभा चुनावों तक कर्नाटक में जेडीएस के साथ रहना ही ठीक होगा ताकि यहां भाजपा का प्रदर्शन खराब हो सके.

बिहार में भी कांग्रेस के भीतर गठबंधन को लेकर बेहद सहज स्थिति नहीं है. बिहार में कांग्रेस जिस गठबंधन में है उसकी सबसे बड़ी पार्टी लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल है. राजद और कांग्रेस के अलावा गठबंधन में उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता दल, वामपंथी दल और जीतन राम मांझी भी हैं. ऐसे में इस गठबंधन में भी बिहार प्रदेश कांग्रेस को लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए सम्मानजनक सीटें मिलने की उम्मीद नहीं है. इससे प्रदेश स्तर पर पार्टी में असंतोष तो है, लेकिन यह दूसरे राज्यों के मुकाबले अपेक्षाकृत कम है क्योंकि यह बात प्रदेश स्तर के नेताओं को भी मालूम है कि बिहार में कांग्रेस का सांगठनिक ढांचा बेहद कमजोर है.

हालांकि आंतरिक असंतोष के बावजूद कांग्रेस इस दिशा में लगातार आगे बढ़ रही है कि 2019 के चुनावों में किसी भी कीमत पर नरेंद्र मोदी और भाजपा को रोकने के लिए विभिन्न पार्टियों के साथ एक मंच पर आया जाए.