लेखक-निर्देशक : कार्तिक सुब्बाराज

कलाकार : सुपरस्टार रजनीकांत, विजय सेतुपति, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, सिमरन, त्रिशा, बॉबी सिम्हा

रेटिंग : 2.5/5

कार्तिक सुब्बाराज दक्षिण भारतीय फिल्मों के बड़े कमाल युवा निर्देशक हैं. जिस किसी ने भी उनकी ‘पिज्जा’ (2012), ‘जिगरठंडा’ (2014) और ‘मरक्यूरी’ (2018) नामक तमिल फिल्में देखी हैं, उनके लिए ‘पेट्टा’ के प्रति उत्सुक होने की मुख्य वजह सुपरस्टार रजनीकांत नहीं, बल्कि वे ही रहे होंगे.

आपके फिल्म देखते-देखते, वे सामान्य से जॉनर की सामान्य नजर आने वाली कहानियों को यूं सर के बल पलट देते हैं कि एक तो आप चाहे आईएएस बुद्धि के हों या आईआईटी-आईआईएम बुद्धि के, इन ट्विस्ट्स का कभी पहले से अंदाजा नहीं लगा सकते. दूसरे, फिर कभी उन ट्विस्ट्स और फिल्मों को भूल नहीं सकते. तीसरे, उनकी कहानियों का अलहदा ट्रीटमेंट आपको हमेशा ही हतप्रभ कर देता है. हॉरर फिल्म लगने वाली उनकी डेब्यू फिल्म ‘पिज्जा’ देख चुके दर्शक आसानी से समझ सकते हैं कि हम उनकी किस खासियत की ओर खासतौर पर इशारा कर रहे हैं!

सुपरस्टार रजनीकांत अभिनीत ‘पेट्टा’ में कार्तिक सुब्बाराज के इसी मास्टरस्ट्रोक को देखने की चाह थी. उम्दा ‘काला’ के बाद रजनीकांत से भी अपेक्षाएं बढ़ चुकी थीं क्योंकि वे भी बॉलीवुड की खान त्रयी और अमिताभ बच्चन जैसे वरिष्ठ अदाकारों की तरह खुद को नए युवा निर्देशकों के हाथों में सौंपकर अपने अंदर बैठे अभिनेता को नए सिरे से खोजने की कोशिश करते मालूम हो रहे थे. लेकिन, अंतत: ‘पेट्टा’ जितनी सुपरस्टार रजनीकांत की फिल्म निकली, उतनी पुराने वाले कार्तिक सुब्बाराज की फिल्म नहीं.

‘पेट्टा’ की शुरुआत में ही निर्देशक सुब्बाराज स्क्रीन पर लिखकर यह घोषणा कर देते हैं कि वे रजनीकांत ‘सर’ के बहुत बड़े फैन हैं. इसके बाद फिल्म केवल रजनीकांत और उनके ब्रांड वाली स्टाइलिश एक्टिंग व सिनेमा के ही महिमामंडन को तवज्जो देती है, और सुब्बाराज का मुख्तलिफ हस्ताक्षर ‘पेट्टा’ में कहीं-कहीं केवल सूक्ष्म रूप में ही नजर आ पाता है. ये अलग बात है कि थलाइवा को ट्रिब्यूट देने की चाहत को निर्देशक ने सुघड़ता से परदे पर रचा है और रजनीकांत के घोर प्रशंसकों को यह फिल्म शर्तिया पसंद आने वाली है. यानी कि अगर आप रजनीकांत के लिए फिल्में देखने वाले दर्शक हैं – हमारी तरह फिल्मों के लिए रजनीकांत को भी देख लेने वाले नहीं – तो ‘पेट्टा’ आपके अंदर बैठे रजनीकांत के प्रशंसक की बांछें खिला देगी.

रजनीकांत की कई पुरानी फिल्में और उनके सीन आपको ‘पेट्टा’ देखते हुए याद आएंगे. मुंह में सिगरेट दबाने से लेकर स्वैग से लबालब भरी उनकी चाल और घुमाकर चश्मा पहनने तक की उनकी लगभग सारी ही मशहूर अदाएं फिल्म में स्टाइलिश अंदाज में पिरोई हुई मिलेंगी.

सबसे खास है कि हालिया वर्षों में कई फिल्में जहां रजनीकांत ब्रांड के अतिशयोक्ति वाले सिनेमा को रचने में सफल नहीं हो पाईं, वहीं ‘पेट्टा’ रजनीकांत ब्रांड के अतार्किक और पलायनवादी सिनेमा को सलीके से रचती है. आप सुब्बाराज से इसके लिए तो शिकायत कर सकते हैं कि वे रजनीकांत जैसे सुपरस्टार को खींचकर अपने ब्रांड वाले सिनेमा की तरफ नहीं ला पाए, लेकिन इसके लिए उनकी प्रशंसा करनी होगी कि टिपिकल रजनीकांत मसाला फिल्म बनाने में वे सफल रहे हैं. हाल-फिलहाल यह कारनामा शंकर (2.0) जैसा निर्देशक भी कुशलता से अंजाम नहीं दे पाया है.

‘पेट्टा’ की कहानी ऊटी के एक कॉलेज से शुरू होती है जहां काली (रजनीकांत) हॉस्टल का वॉर्डन बनकर पहुंचता है. इसके बाद काफी लंबा वक्त कॉलेज की लोकल पॉलिटिक्स पर खर्च किया जाता है जो कि रजनीकांत के कद का विषय कतई नहीं मालूम होता. इस हिस्से में रजनीकांत प्यार में भी पड़ते हैं, लंबे-लंबे गाने गाते हैं, नाचते हैं, पुरानी वाली अदा से कॉमेडी करने की कोशिश करते हैं, और सैकड़ों गुंडों को मारते-पीटते हैं. ठीक-ठीक वही सब आराम से करते चलते हैं जो अपनी ज्यादातर फिल्मों में दशकों से करते आ रहे हैं. इस हिस्से में कुछ भी खास नहीं है और हल्की-फुल्की कहानी दिखाने की वजह से बस आपका वक्त आसानी से कट जाता है.

फिल्म की असल कहानी इंटरवल के बाद शुरू होती है जब कहानी फ्लैशबैक में पहुंचने के बाद उत्तर प्रदेश पहुंचती है. जैसा कि रजनीकांत की फिल्मों का पैटर्न रहा है कि उनकी फिल्मों में दो रूपों में रजनीकांत अवश्य दिखाए जाते हैं. एक तो आज की उम्र के अधेड़ और एक फ्लैशबैक वाले जवान रजनीकांत!

जवानियत से भरपूर ‘पेट्टा’ का फ्लैशबैक जहां दिलचस्प है, वहीं किसी फ्लैशबैक की तरह इसे रफ्तार से फटाफट न दिखाकर इतने तफ्सील से दिखाया जाता है कि जैसे इसी हिस्से से फिल्म शुरू हुई हो. इंटरवल के बाद फ्लैशबैक और फिर उत्तर प्रदेश पहुंची कहानी दिखाते हुए दो घंटे 51 मिनट की फिल्म इतनी ज्यादा लंबी हो जाती है कि उसके खत्म होने के इंतजार में कई बार सब्र खत्म हो जाता है. हम हर बार कॉफी पी-पीकर उसे रिचार्ज करने की कोशिश करते हैं.

गैंगस्टर रिवेंज फिल्मों के साधारण टेम्पलेट को ही ‘पेट्टा’ पटकथा में उपयोग करती है और चटख लाल रंग से सजे फ्रेम्स वाला स्टाइलिश सिनेमा रचने के बावजूद कुछ अनदेखा या कमदेखा गैंगस्टर ड्रामा हमें देखने को नहीं मिलता. सुब्बाराज के मौलिक हस्ताक्षर वाला एक ट्विस्ट जरूर फिल्म में है लेकिन तब तक कहानी दम तोड़ चुकी होती है, आप थक चुके होते हैं और जिस एक्टर पर यह ट्विस्ट फेंका जाता है वो भी बेचारा ठीक से चौंकने की मेहनत तक नहीं कर पाता.

अंधेरे में टॉर्चलाइट की मदद से मार-पीट करने जैसे कुछ एक्शन-दृश्य जहां प्रभावित करते हैं वहीं कई सारे एक्शन-सीक्वेंस बिल्ड-अप में बहुत सारा वक्त लेने के बाद मुख्य फाइट से संतुष्ट नहीं कर पाते. रजनीकांत के होने पर वैसे भी फाइट सीन्स में ‘डिटेलिंग’ कम ही देखने को मिलती है और जब-जब वे हवा में पचास गुंडों को उड़ा रहे होते हैं तो स्क्रीन पर फाइट कोरियोग्राफी कमाल की नजर नहीं आती. हमें और आपको बस मानकर चलना होता है कि हां, ऐसा हो सकता है क्योंकि सुपरस्टार रजनीकांत ‘कुछ भी’ कर सकते हैं! (एक नया जोक - अगर आप रजनीकांत से कहेंगे कि मैं कुछ भी खा लूंगा, तो वे सच में दुनिया के लिए अब तक अंजान रही ‘कुछ भी’ नाम की एकदम नयी डिश आपके लिए तैयार कर देंगे!)

‘पेट्टा’ में मुख्य खलनायक का रोल नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने निभाया है और जैसे वे घाघ गैंगस्टर की भूमिकाओं में सदैव प्रभाव छोड़ते हैं वैसे ही यहां भी प्रभावित करते हैं. लेकिन एक दक्षिण भारतीय गैंगस्टर की विशेषताएं धारण नहीं कर पाते और उत्तर प्रदेश के कस्बाई डॉन ही ज्यादा लगते हैं. रजनीकांत के होने की वजह से उनका रोल भी कम दमदार लिखा गया है और बेहद कम सीन में वे गणेश गायतोंडे वाले स्तर के प्रभावशाली हो पाते हैं.

नवाज का साथ ‘पिज्जा’ में नायक रहे विजय सेतुपति ने क्रूरता और सनक ओढ़कर दिया है और उनका अभिनय खासा प्रभावित करता है. फिल्म में दो नायिकाएं भी हैं – सिमरन और त्रिशा – लेकिन रिक्त स्थान भरने के अलावा उन्हें उपयोग नहीं किया गया.

‘पेट्टा’ शब्द को अगर आप लगातार कई बार बोलेंगे तो वो ‘पेठा’ हो जाता है! और इस पेठा से फिर याद आता है कि जैसे आगरा का पेठा दशकों से एक ही स्वाद मुख्यता से बेच रहा है, वैसे ही रजनीकांत की नयी मसाला फिल्में भी (चंद अपवाद छोड़कर) अपने स्वाद को बदल नहीं रही हैं. और, हम जैसे भोले दर्शक हर बार नए जायके की तलाश में उन्हें देखने सिनेमाघर जाते जा रहे हैं. जाते जा रहे हैं. जाते जा रहे हैं!