चांदनी हुसैन पेशे से पत्रकार हैं और मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में रहती हैं.


बचपन में हम उस सीमा तक जाकर सोचते हैं, जहां तक पहुंचना बड़ों के बस की बात नहीं होती. बस में खिड़की के पास वाली सीट पर बैठकर रास्ते से रेस लगाने की या पतंग के साथ आसमान में उड़ने की, सुपरपॉवर्स हमारे पास केवल बचपन में होती हैं. सब की तरह मेरा बचपन भी इन्हीं कल्पनाओं, खेल-कूद और किताबों के इर्द-गिर्द गुजर रहा था. लेकिन मुझमें एक खास बात यह थी कि जब मैं महज 6-7 साल की थी तभी से मैंने हर चीज को कुछ ज्यादा ही गंभीरता से लेना शुरू कर दिया था. पहले यह मेरी आदत बना और फिर व्यवहार में शामिल हो गया. इसके लिए मुझे लोगों से तारीफ भी मिलती जो मुझे बहुत सुहाती थी लेकिन कभी-कभी यह आदत मुझे भारी भी पड़ जाती थी, जो मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था. यह किस्सा भी मेरे इसी पहलू को दिखाता है.

मेरा बचपन मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में बीता है. बात तब की है जब मैं 9-10 साल की रही होउंगी. उन दिनों टीवी पर ‘शक्तिमान’ सीरियल आता था. वैसे तो शक्तिमान को किसी परिचय की जरूरत नहीं है, नब्बे के दशक में बड़ा हुआ हर बच्चा शक्तिमान को जानता ही होगा. फिर भी बता देती हूं कि शक्तिमान एक सुपरहीरो था जो लोगों को और शहर को मुसीबतों से बचाता रहता था और उसे कभी चोट नहीं लगती थी. यह सीरियल देखकर मुझे भी अपने भीतर कुछ नई सुपरपावर्स का एहसास होने लगा. जाने क्यों मुझे लगने लगा कि मुझे भी चोट नहीं लग सकती. फिर अगर कभी ऐसा होने की नौबत आई भी तो शक्तिमान तो है ही, वह आकर मुझे बचा लेगा.

तो हुआ ये कि एक बार मामाजी घर पर आए हुए थे. उनकी और हमारी उम्र में कोई खास फर्क नहीं था इसलिए हम भाई-बहनों के लिए वे दोस्त की तरह थे. मामाजी को किसी का भी मजाक उड़ाने की बुरी आदत थी. एक इतवार टीवी पर शक्तिमान आ रहा था और हम सब इसे साथ-साथ देख रहे थे. हमें तो शक्तिमान देखना बहुत अच्छा लगता था लेकिन मामाजी को कुछ खास नहीं रुचता था. एक सीन में जब शक्तिमान घूम-घूमकर दूसरी जगह पहुंचता दिखाई दिया तो हम खुश हो गए लेकिन मामाजी इस पर चिढ़ गए. उन्हें और कुछ न सूझा तो वे यही बोल गए कि ‘ऐसा भी कहीं होता है भला! अपनी कहानी में तो हर कोई हीरो ही होता है.’ यह बात सुनकर मुझे कुछ अच्छा नहीं लगा. मैंने मन ही मन सोचा कि अगर अपनी कहानी में हर कोई हीरो होता है तो मैं भी हीरो हूं और अगर मैं हीरो हूं तो मैं भी ऐसा कर सकती हूं. शायद यह बात मैंने उनसे कह भी दी थी.

अगली शाम मामाजी, मैं और पड़ोस का गोलू गिल्ली-डंडा खेल रहे थे. इस दौरान उन्होंने इतनी जोर से गिल्ली पर डंडे को मारा कि वह खिड़की से होते हुए स्टोर रूम में पहुंच गई. गोलू ने मुझे गिल्ली लाने के लिए कहा लेकिन मैंने आलस की वजह से मना कर दिया. तभी मामाजी ने कहा, ‘हां मत जा, स्टोर रूम में भूत है, तुझे खा जाएगा. तू यहीं बैठ.’ मुझे इस बात पर गुस्सा आया कि क्या मैं किसी से डरती हूं अभी लाकर दिखाती हूं. आखिर मैं भी अपनी कहानी की हीरो हूं. यही सब सोच कर मैं स्टोर रूम की तरफ चली गई.

स्टोर रूम में जाकर देखा कि भूत-वूत तो वहां था नहीं, लेकिन जहां गिल्ली पड़ी हुई थी उसके बगल में कीलों भरा एक लकड़ी का टुकड़ा भी था. यह टुकड़ा गिल्ली उठाने में थोड़ी अड़चन डाल रहा था. लेकिन मैं तो खुद को हीरो मान रही थी जिसे बचाने के लिए शक्तिमान भी पूरी फुर्सत लिए बैठा था. इसलिए अपनी सुपरपावर्स पर यकीन करते हुए मैंने गिल्ली लेने के लिए उस पर पैर रख दिया लेकिन अगले ही पल दर्द का करारा एहसास हुआ और मैं चिल्लाने लगी.

मेरी आवाज सुनकर मम्मी दौड़कर मेरे पास आईं और मेरे पैर से कीलों भरा लकड़ी का टुकड़ा निकालने लगी, लेकिन मुझे इतना दर्द हो रहा था कि मैंने उन्हें मना कर दिया. शायद मुझे तब इस बात की उम्मीद थी कि अभी शक्तिमान आएगा और मुझे बचाएगा. लेकिन इसके पहले ही मम्मी ने मेरा पैर कस कर पकड़ लिया और लकड़ी के टुकड़े को निकाल दिया. शक्तिमान की जरूरत खत्म हो चुकी थी पर मेरे पैर में बहुत दर्द हो रहा था.

इसके बाद मम्मी ने मुझे डांटते हुए कहा, ‘तुझे कील नहीं दिखी, यहां स्टोर रूम में क्या करने आई थी?’ अब उनके सवाल का मैं जवाब देती भी तो क्या कि मैं भूत से नहीं डरती और मैं अपनी कहानी की हीरो हूं जिसे कभी चोट नहीं लगती. चोट तो लग चुकी थी और इतनी गहरी कि महीनेभर के लिए मेरा चलना-फिरना दुश्वार हो गया. इस चोट के बाद मैंने न सिर्फ शक्तिमान पर बल्कि फिल्मों और टीवी की हर बात पर यकीन करना छोड़ दिया. कल्पनाओं वाले आसमान में उड़ान तो भरती रही लेकिन हकीकत वाली जमीन पर पांव भी हमेशा टिकाए रखा. आज मैं उस उम्र में हूं जहां बचपन की इन बातों का असर ये हो चुका है कि अब मैं अपनी कहानी की हीरोइन हूं और इस हीरोइन को किसी शक्तिमान का इंतजार नहीं होता!

(पाठक बचपन से जुड़े अपने संस्मरण हमें mailus@satyagrah.com या anjali@satyagrah.com पर भेज सकते हैं.)