इन दिनों तबियत कुछ ढीली है. सो घर पर आराम कर रहा हूं. बीच-बीच में जो घनचक्करी हो जाती है उसी का शिकार इस बार भुवनेश्वर में हुआ. कई कार्यक्रम रद्द करने पड़े, जिनमें रज़ा पुस्तक माला की लगभग चालीस पुस्तकों का लोकार्पण, भोपाल और जयपुर साहित्य समारोहों में शिरकत शामिल है. सक्रियता इस उमर में अच्छी है पर बीच-बीच में शरीर कहने लगा है कि कुछ आराम भी अच्छा है. सो उसकी सुन रहा हूं- विवश होकर ही.

मैं 78 का जल्दी ही होने जा रहा हूं. सांस्कृतिक उत्पात करते हुए 60 से अधिक वर्ष हो जायेंगे. कई बार लेटे-लेटे उसे मन और स्मृति में नबेरता हूं और लगता है कि जितना कर सकता था उसका लगभग आधा ही किया. बहुत-सी सीमाएं थीं. तब बहुत सख़्त लगती थीं और अब लगता है कि थोड़ी और हिम्मत की होती तो उन्हें पार किया जा सकता था. पर जो नहीं हुआ सो नहीं हुआ. सफलता-विफलता के परे सोचना कई बार आसान नहीं होता. अपने बारे में वस्तुनिष्ठ होना भी आसान नहीं. हालांकि उसे काफ़ी बरका लेता हूं पर कुछ आत्मरति भी घेरती रहती है. लगता यह भी है कि अपनी इतनी नाप-जोख खुद करना ठीक नहीं - यह काम दूसरों का है, जिनसे यही अपेक्षा की जा सकती है कि वे सख़्त उदारता से काम लेंगे अगर कभी उन्हें ऐसा करने की फुरसत मिली.

थकान तो ख़ैर लगती ही है, लेकिन हारना या ऊबना स्वभाव में नहीं है. उस वजह से कष्ट होता है और दूसरों को भी कष्ट देता रहता हूं. लगता यही है कि हममें से अधिकांश अपनी सामर्थ्य से कम काम करते हैं और बहुत से तो कामटालू हैं. बहुत सारा वक़्त ख़र्च हुआ है दूसरों के एतराज़ों से निपटते. भला हो उनका कि उन्होंने अपने आत्मविश्वास और नीयत को परखने का लगातार अवसर दिया. हर बार मैं सही नहीं था पर हर बार वे भी ग़लत नहीं थे. हमारे यहां नेकनीयती कम ही है. हरेक को अपनी नीयत पर शक नहीं होता और हर दूसरे की नीयत संदिग्ध लगती है. सत्ता, पूंजीवादी व्यवस्था, अवसरवादिता आदि में कइयों को लिप्त लगता रहा हूं, भले इसका कोई ठोस साक्ष्य उसके पास कभी नहीं रहा. मैं वक्ता तो हूं पर प्रवक्ता नहीं. शायद अपनी ही दृष्टि का भी नहीं. पर यह बात आम तौर पर स्वीकृत नहीं हुई है.

थोड़े से दिनों में या शायद इसी सप्ताह मेरा 17वां कवितासंग्रह ‘कम से कम’ राजकमल से प्रकाशित हो जायेगा. भोपाल से एक मित्र ने पूछा कि आपने अपने एक संचयन का नाम रखा था ‘थोड़ी सी जगह’ और अब इस ताज़े का ‘कम से कम’- ऐसा क्यों? मुझे लगता है साहित्य और संस्कृति में किसी को भी थोड़ी से अधिक जगह की आकांक्षा नहीं करना चाहिये. उतनी भी मिल जाये इसकी पात्रता कम ही में होती है. मेरी आकांक्षा इस कम से कम की है. हो सकता है यह भी अधिक हो. तो फिर इतिहास का बड़ा कूड़ादान तो है ही! वहां फेंके जाने में कोई बाधा न होगी, आपत्ति भी नहीं!

सामाजिक और पवित्र

भक्ति के एकाग्र भुवनेश्वर के साहित्य-समारोह में भक्ति को लेकर काव्यपाठ, गायन, संवाद, नृत्य आदि सभी थे. लता मणि के साथ एक बहस में यह बात उठी कि हमारे यहां विचार और विश्लेषण में सामाजिकता और पवित्रता के बीच दूरी पर ख़ास ध्यान नहीं दिया गया है. अगर सामाजिक से पवित्र को ख़ाली कर दिया गया है तो पवित्र से भी सामाजिक हटा दिया गया है. परिणाम सामने है- अधिकतर विकृतियों के रूप में. सबरीमाला में जो हो रहा है वह सामाजिक और पवित्र के बीच दव्ंद के रूप में भी समझा जा सकता है. गोरक्षा, ‘दूसरे’ बनाना और फिर उन्हें हिंसा, हत्या आदि का शिकार बनाने के रूप में जो नयी सामाजिकता सत्तारूढ़ राजनैतिक शक्तियों द्वारा पोषित-प्रोत्साहित है वह पवित्र का अतिक्रमण कर बनी है. हमारा समय, एक अर्थ में, पवित्र के नाम पर पूरी तरह से अपवित्र को प्रतिष्ठित करने का हो चला है.

उद्घाटन सत्र में हम चार कवि थे. प्रतिभा सतपथी, रमाकांत रथ, सीताकांत महापात्र और मैं. अपेक्षा यह की गयी थी कि हम चारों अपनी पसंद की कोई भक्ति-कविता पढ़ेंगे. रमाकांत जी ने अपनी प्रसिद्ध कविता ‘श्रीराधा’ का एक अंश पढ़ा. बाक़ी दो ने वक्तव्य दिये. मैंने कबीर का यह पद पढ़ा-

गगन की ओट निसाना है।

दहिने सूर चंद्रमा बायें, तिनके बीच छिपाना है।

तन की कमान सुरत का रोदा, सब्द-बान ले ताना है।

मारत बान बेधा तन ही तन, सतगुरु का परवाना है।

मारयौ बान घाव नहिं तन में, जिन लागा तिन जाना है।

कहैंत कबीर सुनो भाई साधो, जिन जाना तिन माना है।

मैं याद कर रहा था कि इस पद की ओर ध्यान सबसे पहली बार तब गया था जब भारत भवन की एक संगीत-सभा में कुमार गंधर्व ने अपने अनूठे अंदाज में यह पद गाया था. कबीर पर एक बड़ा प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक करनेवाली बंगलुरु की शबनम विरमानी इतनी कबिरिया गयी हैं कि अब निर्गुण-गायन करती देशाटन करती रहती हैं. उनकी संगीत-संपदा में वे अनेक पद सहज शामिल हो गये हैं जो उन्होंने देश और पाकिस्तान में जाकर भी एकत्र किये हैं. इसमें मालवी, सिंधी, बीकानेरी, राजस्थानी आदि अनेक बोलियों के पद हैं. कबीर, अन्य भक्त कवियों को खोजते-साधते अब उनसे स्वर भी बखूबी सधने लगा है. जो रामचरित के बारे में कहा गया है, वह इस प्रसंग में लागू होता है कि कबीर का काव्य स्वयं संगीत है और कोई गायक हो जाये सहज सम्भाव्य है. वे इन दिनों एक वेबसाइट ‘अजब शहर’ बनाने में लगी हैं जिस पर कबीर के चार सौ पद विभिन्न शैलियों में मुफ़्त सुने जा सकेंगे. यह पवित्र को सामाजिक से फिर जोड़ना है.

गगनवट

संस्कृत काव्य की विपुलता और वैभव का अकसर ज़िक्र होता है. मुकुंद लाठ उन बिरले कवि-चिंतकों में से हैं जिन्होंने इस काव्य के अपार लालित्य को हिंदी में सुघरता और संवेदनशीलता से भी करने की कोशिश की है. राजशेखर के हवाले से वे अपने अनुवादों को ‘स्वीकरण’ कहते हैं. इस अर्थ में स्वीकरण हैं भी कि उन्हें पढ़ते लगता है कि आप मूल हिंदी कविता ही पढ़ रहे हैं. बरसों पहले मुकुंद जी के स्वीकरणों का संचयन, द्विभाषिक-संस्कृत और हिंदी दोनों- ‘स्वीकरण’ नाम से प्रकाशित हुआ था. उसे नये नाम ‘गगनवट’ से रज़ा पुस्तकमाला के अंतर्गत प्रकाशित किया गया है. इसी शीर्षक की कविता यों है-

आकाश बरगद-सा खड़ा

श्यामल घिरे बादल

घनेरे पात सी जैसे छटा

बरसात की आ लगी

धरती पर झड़ी

जैसे जटा

एक कविता है ‘सवेरे-सवेरे’:

बिल्ली

सवेरे-सवेरे

चूल्हे तले से उठी

उठकर जम्हाई ले तनी

झाड़े अंग

कितनी राख में थी सनी।

‘मलय की महिमा’ शीर्षक कविता इस प्रकार है:

चांदी का हो

या सोने का

ऐसे पहाड़ का क्या

जहां पेड़ उगे

और पेड़ ही रह जाये

सच्चा पहाड़ तो मलय है

जहां सिहोर, नीम, कुरैया

सभी चंदन हो जाते हैं