क्या भारतीय मीडिया में जरा भी शर्म नहीं बची है?

भारत की अलग-अलग संस्थाओं में कई भ्रष्ट लोग बैठे हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो ईमानदार, मेहनती और योग्य हैं.

मीडिया का कर्तव्य है कि वह पहले श्रेणी के लोगों की आलोचना करे, उनकी करतूतें सबके सामने लाए. लेकिन दूसरे वर्ग के लोगों की सुरक्षा और प्रशंसा भी उसका दायित्व है.

लेकिन देखिए, मीडिया ने जस्टिस सीकरी के साथ क्या किया?

जस्टिस सीकरी एक असाधारण, ईमानदार, योग्य और परिश्रमी जज हैं. मैं खुद यह दावा कर सकता हूं क्योंकि जब वे दिल्ली हाई कोर्ट में थे तो मैं वहां मुख्य न्यायाधीश था और मैं उन्हें करीब से जानता हूं. लेकिन लगभग सड़े हुए और बेशर्म मीडिया ने उनकी प्रतिष्ठा खराब करने की कोशिश की है.

दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर मुझे सिर्फ न्यायिक ही नहीं बल्कि काफी प्रशासनिक कामकाज भी करना पड़ता था. इसलिए शाम को चार बजे अदालती काम निपट जाने के बाद भी मैं आठ बजे तक कोर्ट में रहता था. काम खत्म करके मैं अक्सर पता करता था कि अभी भी कौन सा जज अपने चेंबर में है. अक्सर मुझे बताया जाता था कि जस्टिस सीकरी अब भी चेंबर में हैं और अपने फैसले तैयार कर रहे हैं और यह काम वे बेहद ध्यान से करते थे. मैं उनके चेंबर में जाता था और कहता था कि इतना ज्यादा काम कर अपनी सेहत खराब न करें.

उनकी साख और ईमानदारी बेदाग थी. मैंने कभी उनके खिलाफ कोई शिकायत नहीं सुनी. लेकिन लगभग पूरा मीडिया इस शख्स के खून का प्यासा हो गया.

इसलिए मैं बताता हूं कि सच क्या है.

यह पूरा मामला द प्रिंट.इन की एक रिपोर्ट के साथ शुरू हुआ. इसमें कहा गया था कि केंद्र सरकार ने जस्टिस सीकरी का नाम कॉमनवेल्थ सेक्रेटेरिएट आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल (सीएसएटी) के सदस्य के तौर पर आगे किया है जिसके लिए उन्होंने सहमति दे ही है.

यहां तक यह रिपोर्ट सच थी.

लेकिन एक लैटिन कहावत है कि आधा सच भी उतना ही बुरा हो सकता है जितना पूरा झूठ. द प्रिंट.इन में छपी रिपोर्ट में भी ऐसा ही हुआ है जिसमें तथ्यों को तोड़मरोड़कर बताया गया है.

1. सीएसएटी एक ऐसी संस्था है जो राष्ट्रमंडल देशों के सदस्यों के आपसी विवादों की सुनवाई करती है. इस ट्रिब्यूनल के सदस्य तभी बैठते हैं जब उन्हें किसी सदस्य से शिकायत मिलती है. यानी इसकी नियमित सुनवाई नहीं होती और इसके सदस्य भी स्थायी रूप से इंग्लैंड में नहीं रहते. वे तभी वहां जाते हैं जब ट्रिब्यूनल के सामने कोई मामला आता है और यह अक्सर साल में सिर्फ दो या तीन बार होता है. इसके सदस्यों को नियमित वेतन नहीं मिलता. यानी वे इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस के जजों की तरह नहीं होते जो स्थायी रूप से हेग में बैठते हैं और नियमित वेतन पाते हैं.

इसलिए इसे एक मलाईदार पद कहना, जैसा कि द प्रिंट.इन की रिपोर्ट में कहा गया है, तथ्यों को पूरी तरह से तोड़ना-मरोड़ना और फर्जी खबर है. यह संबंधित पत्रकार की सनसनी पैदा करने और लोगों के सामने मसाला परोसने की घटिया कोशिश है जो इन दिनों ज्यादातर भारतीय पत्रकारों की आदत हो चली है.

2. जस्टिस सीकरी का नाम सीएसएटी के लिए मुख्य न्यायाधीश ने उनकी सहमति से आगे बढ़ाया था. यह दिसंबर 2018 के पहले हफ्ते की बात है - यानी आठ जनवरी के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से महीने भर पहले की जिसमें आलोक वर्मा को छुट्टी भर भेजने के फैसले को रद्द कर दिया गया था और कहा गया था कि एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति एक हफ्ते में इस मुद्दे पर फैसला करे. मुख्य न्यायाधीश ने इस फैसले के बाद ही जस्टिस सीकरी को उस समिति में भेजने का फैसला किया था.

इसलिए आलोक वर्मा को सीबीआई से हटाने के समिति के फैसले को एक महीने पहले सीएसएटी के लिए जस्टिस सीकरी की सहमति से जोड़ना बेतुका है जैसा कि द प्रिंट.इन की रिपोर्ट में करने की कोशिश की गई है. यह क्षुद्र और झूठी खबर का एक और उदाहरण है कि जिसे भारतीय मीडिया के बड़े हिस्से ने अपनी आदत में शुमार कर लिया है.

जब जस्टिस सीकरी ने सीएसएटी का सदस्य बनने की सहमति दी थी तो वे उच्चाधिकार प्राप्त समिति के सदस्य नहीं थे, और न ही तब तक सुप्रीम कोर्ट का आठ जनवरी वाला फैसला आया था. तो यह आरोप कैसे लगाया जा सकता है, जैसा कि द प्रिंट.इन की खबर में लगाया गया है, कि जस्टिस सीकरी का सीएसएटी के लिए नामांकन इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने आलोक वर्मा को सीबीआई से हटाने का फैसला किया था?

3. जस्टिस सीकरी ने कल सीएसएटी के लिए दी गई अपनी सहमति वापस ले ली है.

अगर मीडिया में जरा सी भी शर्म बची है तो उसे जस्टिस सीकरी से माफी मांगनी चाहिए जिनकी छवि को मैला करने की उसने हरसंभव कोशिश की है.

(यह फेसबुक पर की गई मार्कंडेय काटजू की टिप्पणी का हिंदी अनुवाद है)