नाइजीरिया

इस साल दुनिया का पहला आम चुनाव फरवरी में अफ़्रीकी देश नाइजीरिया में होना है. राष्ट्रपति मुहम्मदु बुहारी ने पिछले दिनों जनता को राहत देने वाली कई योजनाएं शुरू की हैं. लेकिन इसके बावजूद आगामी चुनाव में उनकी स्थिति काफी कमजोर बताई जाती है. इसका प्रमुख कारण उनके कार्यकाल में देश के आर्थिक हालात बदतर होना है. इसके अलावा आतंकी संगठन बोको हराम की ताकत में इजाफा होने को भी उनकी नाकामी की तरह देखा जा रहा है. नाइजीरिया में सोशल मीडिया पर जिस तरह से मुहम्मदु बुहारी के खिलाफ कैंपेन चल रहे हैं, उससे भी पता चलता है कि परिस्थितियां उनके कितनी खिलाफ हैं. बीते महीने पूरे देश में यह अफवाह तक फैल गई थी कि बुहारी की मौत हो चुकी है और सूडान उनके क्लोन के जरिए नाइजीरिया की सत्ता चला रहा है.

यूक्रेन

यूक्रेन में इस साल मार्च में राष्ट्रपति चुनाव होना है. यह चुनाव न केवल यूक्रेन बल्कि रूस, अमेरिका और यूरोप के लिए भी खासा महत्व रखता है. इसके नतीजे यह साफ़ कर देंगे कि 2014 में क्रीमिया पर रूस के कब्जे के बाद, क्या अभी भी यूक्रेन के लोग रूस से तनातनी जारी रखना चाहते हैं. ऐसा इसलिए भी कहा जा रहा है क्योंकि रूस से संबंध खराब होने से यूक्रेन को ही नुकसान उठाना पड़ा है. यूक्रेन के प्रमुख बंदरगाहों पर रूसी नाकाबंदी के चलते उसे लगातार आर्थिक नुकसान हो रहा है. इसके अलावा यूक्रेन के लोग राष्ट्रपति पेत्रो पोरोशेंको के शासन में हुए भ्रष्टाचार से भी त्रस्त हैं. वे 2014 में रूस विरोधी भावनाओं का फायदा उठाकर ही चुनाव जीते थे और इस बार भी ऐसा करने की कोशिश कर रहे हैं.

इजरायल

इजरायल में इस साल नौ अप्रैल को होने वाले चुनाव का नतीजा अगर प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के पक्ष में आता है तो वे रिकॉर्ड पांचवीं बार देश के मुखिया बनेंगे. उऩकी सरकार को इजरायल की अब तक की सबसे दक्षिणपंथी सरकार माना जाता है. बेंजामिन नेतन्याहू के शासन में सेना ने जिस तरह फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों के साथ क्रूरता बरती है, उसकी दुनिया भर में आलोचना हुई है. बीते दो सालों में उन पर भ्रष्टाचार के भी कई आरोप लगे हैं. पुलिस ने ऐसे तीन मामलों को सही भी पाया है और उन्हें दोषी ठहराने की सिफारिश की है. लेकिन इसका उनकी लोकप्रियता पर कोई ख़ास असर पड़ता नहीं दिख रहा है. सर्वेक्षणों में फिर से उनकी ही पार्टी को सबसे आगे बताया जा रहा है. हालांकि, इनमें उनकी सीटें काफी कम होनी की बात भी कही जा रही है जो फिलस्तीन, ईरान और सीरिया के लिए राहत की बात है. क्योंकि गठबंधन की सरकार बनाने के बाद वे उतनी आजादी से फैसले नहीं ले पाएंगे.

भारत

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में भी इसी साल आम चुनाव होना है. यह चुनाव 2014 में पूर्ण बहुमत में सत्ता में आए नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी परीक्षा माना जा रहा है. मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी पार्टी भाजपा ने देश के कई राज्यों में अच्छा प्रदर्शन किया. लेकिन, बीते दिसंबर में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पार्टी की हार ने देश में राजनीतिक माहौल को कुछ हद तक बदलने का काम किया है. इन नतीजों ने आम चुनाव से पहले जहां भाजपा की मुश्किलें बढ़ाई हैं, वहीं कांग्रेस में नयी जान फूंकने का काम किया है. माना जा रहा है कि बेरोजगारी, महंगाई, गाय और हिंदू राष्ट्रवाद के नाम पर हो रही हिंसा ने इसमें बड़ी भूमिका निभायी है. अगले आम चुनाव में भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती 80 संसदीय सीटों वाला सूबा उत्तर प्रदेश बन गया है. यहां सपा और बसपा के साथ आने के बाद भाजपा को बड़ा नुकसान होने की बात कही जा रही है.

यूरोपीय संसद

इस साल मई में यूरोपीय संसद का चुनाव भी होना है. इस चुनाव में 28 देशों के लोग भाग लेते हैं. अमूमन इसे लेकर लोगों में ज्यादा दिलचस्पी नहीं होती, लेकिन इस बार ऐसा नहीं है. एक हालिया सर्वे में सामने आया है कि 22 देशों के लोग अपने यहां प्रवासियों की संख्या बढ़ने से परेशान हैं और इसके लिए वे ईयू को जिम्मेदार मानते हैं. इसके अलावा कई यूरोपीय देशों में दक्षिणपंथी पार्टियां काफी ताकतवर हो चुकी हैं. इन वजहों से इस बार के यूरोपीय संसद के चुनाव में बड़े स्तर पर ईयू विरोधी मतदान होने की संभावना जताई जा रही है.

टाइम के इस आलेख पर आधारित