अपने 63वें जन्मदिन पर बसपा अध्यक्ष मायावती ने 63 किलो का केक काटा. इस मौके पर उन्होंने सपा-बसपा गठबंधन का जिक्र करते हुए कहा कि इससे सभी विरोधियों की नींद उड़ी हुई है. उन्होंने बसपा और सपा कार्यकर्ताओं से मतभेद भुलाते हुए मिलकर काम करने की अपील की. मायावती का कहना था कि भाजपा को हराने के लिए निजी स्वार्थ को भुलाकर आगे बढ़ना होगा.

चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रही मायावती की बहुजन समाज पार्टी 2014 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में खाता भी नहीं खोल पाई थी. 2017 के विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी को सिर्फ 19 सीटें मिली थीं. लेकिन अब अपनी धुर विरोधी समाजवादी पार्टी से गठबंधन करने के बाद मायावती एक बार फिर से सियासी तौर पर बेहद ताकतवर नजर आने लगी हैं.

अखिलेश यादव की सपा के साथ मायावती के जो समीकरण बने हैं, उनके हिसाब से बसपा उत्तर प्रदेश में 38 सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ने जा रही है. भले ही यहां दोनों पार्टियां बराबर-बराबर सीटों पर चुनाव लड़ रही हों लेकिन, सपा के मुकाबले बसपा अधिक सीटें जीत सकती है. जिस तरह से राजस्थान और मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भी बसपा कुछ सीटों पर जीत हासिल करने में कामयाब हुई, उसके आधार पर कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश से बाहर भी उसे एक-दो लोकसभा सीटें मिल सकती हैं.

लोकसभा चुनावों के बाद अगर मायावती की पार्टी 30 के करीब सीटें जीत लेती है तो राष्ट्रीय राजनीति में उनके लिए बड़ी संभावनाओं के कई द्वार खुल सकते हैं. इसकी वजह यह है कि भाजपा और कांग्रेस के अलावा दूसरी शायद ही कोई और पार्टी है जो अगले आम चुनाव में इतनी सीटें जीत सकती है. अभी तृणमूल कांग्रेस के 34 सांसद हैं. लेकिन माना जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की सीटें बढ़ सकती हैं. अगर ऐसा होता है तो ममता बनर्जी की सीटों में कमी आ सकती है. तमिलनाडु में अन्ना द्रमुक (एआईएडीएमके) और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) में कोई भी अभी एकतरफा परिणाम देने की स्थिति में नहीं दिख रहा है. ऐसे में बहुत संभव है कि चुनावों के बाद बसपा तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरे.

दोनों राष्ट्रीय पार्टियों की बात करें तो नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ लोगों में गुस्सा तो है लेकिन अभी की स्थिति में कांग्रेस की सीटें भी बहुत बढ़ती हुई नहीं दिख रहीं. ज्यादातर लोगों को लग रहा है कि अगर भाजपा की सीटों में काफी कमी आई भी तो भी कांग्रेस 120 से 130 सीटें ही हासिल कर पाएगी. ऐसे में चुनावों के बाद एक संभावना गैर भाजपा और गैर कांग्रेस प्रधानमंत्री की भी बन सकती है. अगर ऐसी स्थिति बनती है तो प्रधानमंत्री के पद पर मायावती की भी दावेदारी हो सकती है. अखिलेश यादव पहले ही ऐसा होने की हालत में उनका समर्थन करने का संकेत दे चुके हैं. इसके अलावा दलित और महिला होना भी उनके पक्ष में जा सकता है. और मायावती के नाम पर कई क्षेत्रीय दलों के नेता भी उनके पीछे गोलबंद हो सकते हैं.

सियासी गलियारों में एक चर्चा यह भी चल रही है कि अगर भाजपा की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को 230 के आसपास सीटें मिलती हैं तो केंद्र में अपनी सरकार बनाने के लिए भाजपा उपप्रधानमंत्री का पद मायावती को दे सकती है. मायावती और भाजपा पहले भी साथ में सरकार चला चुके हैं. भाजपा के समर्थन से मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री भी रही हैं. और अगर वे सपा के साथ दुबारा हाथ मिला सकती हैं तो समीकरण बदलने पर भाजपा के साथ भी आ ही सकती हैं.

मायावती के लिए इसी तरह की एक और संभावना दूसरे खेमे से भी है. भले ही वे कांग्रेस के साथ मिलकर लोकसभा चुनाव नहीं लड़ रही हों लेकिन, उपप्रधानमंत्री के पद का प्रस्ताव उन्हें कांग्रेस की ओर से भी मिल सकता है. यहां इस बात का जिक्र जरूरी है कि भले ही उत्तर प्रदेश में मायावती का कांग्रेस के साथ औपचारिक गठबंधन नहीं हो, लेकिन सपा-बसपा गठबंधन ने यह फैसला किया है कि वे सोनिया और राहुल गांधी के खिलाफ अपना उम्मीदवार नहीं उतारेंगे. इसके अलावा मध्य प्रदेश और राजस्थान की कांग्रेस सरकारें बसपा के समर्थन से ही चल रही हैं.

कुछ लोग एक संभावना और देखते हैं. चुनावों के बाद अगर मायावती के समर्थन से केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनने की संभावना बनती है तो कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की ओर से उन्हें 2022 में राष्ट्रपति बनाने का प्रस्ताव भी दिया जा सकता है. इसी तरह का प्रस्ताव उन्हें भाजपा की ओर से मिलने की संभावना को भी नहीं नकारा जा सकता.

2022 में जब नए राष्ट्रपति का चुनाव होगा तब उनकी उम्र 66 साल की होगी और तब तक उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव भी खत्म हो चुके होंगे. ऐसे में अगर वे राष्ट्रपति बनेंगी तो कार्यकाल खत्म होने, यानी 2027 तक वे 71 साल की हो चुकी होंगी. उस समय तक अगर स्थितियां मायावती के अनुकूल रहीं तो उनके सामने एक और कार्यकाल का विकल्प भी हो सकता है. उनकी ‘दलित’ और ‘महिला’ की छवि को उस वक्त भी अगर सियासी तौर पर ठीक से उभारा गया तो उनके दूसरे कार्यकाल का विरोध करना किसी पार्टी के लिए आसान नहीं होगा. ऐसे में अगर 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद मायावती के सामने ऐसा कोई प्रस्ताव आता है तो उस पर वे भी गंभीरता से विचार कर सकती हैं.

मायावती चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं. अगर केंद्र की राजनीति में अखिलेश यादव मायावती का साथ देते हैं तो प्रदेश की राजनीति में मायावती को भी खुद को पीछे और अखिलेश को आगे रखना होगा. जानकारों के मुताबिक ऐसे में संभव है कि मायावती भी खुद को प्रदेश की मुख्यमंत्री बनाने के लिए जोड़-तोड़ करने की बजाए राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख पद हासिल करने की दिशा में काम करें.

कुल मिलाकर आज मायावती के लिए ‘पांचों उंगलियां घी में और सर कढ़ाई में’ वाली स्थिति है. अगर बसपा लोकसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करती है और दूसरी तरफ भाजपा और कांग्रेस की सीटें कम रहती हैं तो उनके लिए उपप्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री और यहां तक कि राष्ट्रपति पद के लिए भी संभावनाओं के द्वार खुल सकते हैं.