हमको कुछ कहावतों ने मार डाला. क्यों? इसलिए कि बचपन से सुनते आये थे और उसी सुने को निभाते रहे. बड़ों ने कह दिया तो बस, बात ख़त्म. हमारे संस्कारों में बड़ों से बहस न करने को उनका बुनियादी अधिकार माना गया है.

लेकिन लोकतंत्र में बहस से ही बुनियादी अधिकार सुरक्षित होते हैं. ऐसी ही कई अहम बहसें करने वाले शख्स थे नानी पालकीवाला. नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए की गई उनकी इन बहसों ने सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद तक के खंभे हिला दिए थे. खासकर इंदिरा गांधी द्वारा लागू किए गए आपातकाल के विरोध में नानी पालकीवाला का योगदान हमेशा याद किया जाएगा.

बचपन, लॉ और शुक्रिया अदायगी का बेहतरीन तरीका

सरनेम ‘पालकीवाला’ में उनके खानदान का पेशा निहित है. यानी उनके पुरखे पालकियों को बनाने और उनकी मरम्मत का काम करते थे. नानी पालकीवाला बचपन में हकलाकर बोलते थे. मुंबई के सेंट ज़ेवियर कॉलेज से इंग्लिश में एमए करने के बाद उनकी ख्वाहिश मुंबई यूनिवर्सिटी में लेक्चरर बनने की थी. लेकिन उनकी जगह एक पारसी लड़की को ले लिया गया. कोई और वेकेंसी न होने पर, लॉ पढने के लिए कॉलेज में भर्ती हो गए. देखिये, किस्मत कैसे पलटती है. जब नानी देश भर में बतौर वकील मशहूर हुए, वे उस इंग्लिश की लेक्चरर का शुक्रिया अदा करने के लिए कई सालों तक उसे डिनर पर बाहर ले जाते रहे. क्योंकि उस दिन अगर उसकी जगह नानी का चयन हो जाता तो कहानी कुछ और ही होती.

लॉ पढने के बाद नानी पालकीवाला 1944 में मुंबई की मशहूर लॉ फ़र्म जमशेद जी कंगा के साथ जुड़ गए. बतौर असिस्टेंट उनका पहला केस ‘नुसरवान जी बलसारा बनाम स्टेट ऑफ़ बॉम्बे’ था जिसमें बॉम्बे शराबबंदी कानून को चुनौती दी गयी. 1950-51 तक वे ख़ुद पैरवी करने लगे थे.

1954 में नानी पालकीवाला ने एंग्लो-इंडियन स्कूल बनाम महाराष्ट्र सरकार केस में पैरवी की थी. अदालत में जिरह के दौरान उन्होंने संविधान की धारा 29 (2) और 30 का हवाला दिया जिनके तहत अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा की गयी है. हाई कोर्ट से सरकार के ख़िलाफ़ आदेश पारित करवाकर नानी जीत गए. राज्य सरकार इस मसले को सुप्रीम कोर्ट ले गयी, लेकिन नानी वहां भी जीत गए. कुछ ही सालों में वे इतने मशहूर हो गए उनकी दलील और पैरवी सुनने के लिए कोर्ट रुम में भीड़ जमा होती थी.

कुछ मशहूर मामले और आपातकाल

टैक्स और कॉर्पोरेट मामलों में नानी पालकीवाला को महारत हासिल थी पर वे जनता की आवाज़ बने. 1970 में उन्होंने ‘आरसी कूपर बनाम केंद्र सरकार’ नाम का एक अहम केस लड़ा था. इसमें इंदिरा गांधी सरकार द्वारा बैंकों के राष्ट्रीयकरण को चुनौती दी गई थी. नानी पालकीवाला ने इंदिरा सरकार द्वारा पारित बिल के ख़िलाफ़ पैरवी कर जीत पाई. खिसियाकर, सरकार ने संविधान में संशोधन कर दिया.

नानी पालकीवाला ने राजाओं और नवाबों से जुड़ा प्रिवी पर्स (पूर्व राजाओं और नवाबों को सरकार से मिलने वाले भत्ते) का मामला भी लड़ा था . सरकार के फैसले को चुनौती देते हुए उन्होंने दलील दी थी, ‘संवैधानिक वैधता से ज़्यादा बड़ी संवैधानिक नैतिकता है. धर्म (नैतिकता, वचनबद्धता और सच्चाई) लोगों के दिल में है. धर्म का लोप हुआ तो न संविधान, न कानून और न ही (इसमें) संशोधन लोकतंत्र को बचा पाएगा.’ यह मामला भी सुप्रीम कोर्ट में गया था जिसने सरकार को प्रिवी पर्स बंद न करने का आदेश दिया. इंदिरा सरकार ने फिर संविधान संशोधन करके प्रिवी पर्स की सहूलियत बंद कर दी.

नानी पालकीवाला के लिए ‘केशवानंद भारती बनाम केरल सरकार’ केस आपातकाल के ख़िलाफ़ उठी आवाज को मजबूत बनाने वाला हथियार था. ‘सरकार संविधान में बदलाव कर सकती है, पर इसकी आत्मा के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की जा सकती’ की आधारशिला पर लड़ा गया यह मामला उनके जीवन का सबसे महान केस था. उनका ही नहीं, इसे भारतीय संविधान की आत्मा को अक्षुण रखने वाला सबसे महान मामला कहा जाता है.

इंदिरा गांधी के आपातकाल के दौरान नानी पालकीवाला ने सरकार की धज्जियां उड़ाकर रख दी थीं. इस दौरान उन्होंने भाषणों और कोर्ट में दलीलों से सरकार पर ज़बरदस्त प्रहार किया. सुनने वालों की तालियों का शोर और नानी की अकाट्य तर्कशीलता संसद भवन और सुप्रीम कोर्ट की दीवारों को हिलाकर रखते थे.

संविधान की प्रस्तावना की व्याख्या

1976 में स्वर्ण सिंह समिति ने अपनी रिपोर्ट ने संविधान में संशोधन के अनेक विवादास्पद प्रस्ताव दिए थे. इसमें एक सुझाव यह भी था कि संविधान की प्रस्तावना ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों को ‘लोकतांत्रिक’ शब्द से पहले जोड़ा जाए और साथ ही ‘गरिमा’ को ‘एकता’ से पहले रखा जाए.

नानी पालकीवाला ने इसका विरोध करते हुए कहा कि अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन हो सकता है लेकिन, प्रस्तावना में तब्दीली नहीं की जा सकती. उनका कहना था कि ‘समाजवादी’ शब्द जोड़ना भ्रम पैदा करता है क्योंकि यह सिर्फ़ प्रस्तावना है जिसमें धर्मनिरेपक्षता’ जैसे लफ्ज़ जोड़ना कोई मायने नहीं रखता. नानी पालकीवाला ने इसे कोरा राजनैतिक स्टंट बताया.

बजट विशेषज्ञ और उनके भाषण

देखा जाए तो नानी कर यानी टैक्सेशन और कॉर्पोरेट मामलों के वकील थे और अर्थ-शास्त्र का ज्ञान उन्होंने चलते-फिरते ही हासिल किया था. पर बजट पर उनका भाषण सुनने के लिए लोग आतुर रहते. कहा जाता था कि बजट पर दो ही भाषण सुने जाने चाहिए. एक वित्त मंत्री का बजट पेश करते हुए और दूसरा नानी पालकीवाला का उसकी व्याख्या करते हुए. उनके व्याख्यान इतने लोग सुनते कि मुंबई में स्टेडियम बुक किए जाते थे.

अटॉर्नी जनरल और सुप्रीम कोर्ट का जज बनने का प्रस्ताव ठुकराया

मौजूदा दौर के मशहूर वकील फ़ली नरीमन नानी पालकीवाला के शिष्य रहे हैं. उनके मुताबिक 1970 के दशक में तत्कालीन कानून मंत्री पी गोविंद मेनन ने नानी को अटॉर्नी जनरल बनने की पेशकश की थी. थोड़ी ना-नुकर के बाद नानी ने हामी भर दी. घोषणा वाले दिन से एक रात पहले लगभग तीन बजे उनकी आंख खुली और उनकी अंतरात्मा ने कहा कि इस पद को लेने के बाद वे जनता की आवाज़ नहीं बन पायेंगे. अगले दिन उन्होंने सरकार का प्रस्ताव ठुकरा दिया. कुछ इसी तरह जब उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनने का ऑफर आया तो उन्होंने तब भी विनम्रता से इसे अस्वीकार कर दिया.

1977 से लेकर 1979 तक नानी पालकीवाला अमेरिका में भारतीय राजदूत रहे. वहां एक बार अपने भाषण में उन्होंने कहा था, ‘भारत एक ग़रीब देश है, हमारी ग़रीबी भी एक ताक़त है जो हमारे राष्ट्रीय स्वप्न को पूरा करने में सक्षम है. इतिहास गवाह है कि अमीरी ने मुल्क तबाह किये हैं, कोई भी देश ग़रीबी में बर्बाद नहीं हुआ’. उन्होंने आगे कहा, ‘हमारी सभ्यता 5000 साल पुरानी है. भारतीयों के जीन इस तरह के हैं जो उन्हें बड़े से बड़ा कार्य करने के काबिल बनाते हैं’. नानी अमेरिका में इतने लोकप्रिय हुए कि वहां के बड़े-बड़े विश्वविद्यालय उन्हें व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित करते थे.

दानी नानी

1979 में चेन्नई में ‘शंकर नेत्रालय’ की स्थापना हुई थी. एक रोज़ इसके संस्थापक डॉक्टर बद्रीनाथ को नानी पालकीवाला ने अपने घर रात के भोजन पर आमंत्रित किया. उन्हें विदा करते हुए बाहर तक आए नानी ने सकुचाते हुए उनको एक लिफ़ाफ़ा थमा दिया. डॉक्टर ने भी शिष्टाचार के चलते उनके सामने लिफ़ाफ़ा नहीं खोला. घर जाकर उन्होंने देखा तो उसमें दो करोड़ रुपये का चेक था जो नानी ने अस्पताल के लिए दिया था.

नानी पालकीवाला की बात कहावत से शुरू हुई थी. उसी से ख़त्म की जाए तो बेहतर है. अंग्रेज़ी में कहते हैं कि ‘इग्नोरेंस ऑफ़ लॉ इज नो ब्लिस’. यानी कानून की जानकारी न होना आनंददायक नहीं है. हमें समझना होगा कि जितने हम अपने कर्तव्यों के लिए उत्तरदायी हैं, उतना ही राज्य हमारे अधिकारों के लिए. पर इसके लिए हमें कानून जानना होगा, संविधान पढ़ना होगा. क्यों? इसलिए कि नानी पालकीवाला जैसे लोग बार-बार नहीं आते.