जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और संजीव खन्ना को सुप्रीम कोर्ट में लाए जाने की सिफारिश पर विवाद जारी है. सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा की गई इस सिफारिश के खिलाफ रिटायर्ड जस्टिस कैलाश गंभीर ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र लिखा है. उन्होंने कॉलेजियम द्वारा इन दो नामों के नाम पर मुहर लगाते हुए उनसे वरिष्ठ 32 जजों की अनदेखी किए जाने को ऐतिहासिक गलती बताया है.

मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) रंजन गोगोई के नेतृत्व वाले पांच सदस्यीय कॉलेजियम ने हाल में दो हाई कोर्टों के मुख्य न्यायाधीशों को शीर्ष अदालत का जज बनाए जाने संबंधी फैसले को पलट दिया था. यह फैसला दिसंबर में हुआ था. कॉलेजियम ने राजस्थान हाई कोर्ट के जस्टिस प्रदीप नंदराजोग और दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस राजेंद्र मेनन को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाए जाने की सिफारिश की थी. लेकिन पिछले गुरुवार को उसने अपना यह फैसला उलट दिया और दो अन्य जजों के नाम आगे बढ़ाए. ये थे जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस संजीव खन्ना. जस्टिस माहेश्वरी कर्नाटक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश हैं. वहीं, जस्टिस खन्ना दिल्ली हाई कोर्ट में जज हैं.

कॉलेजियम के अचानक लिए इस फैसले से जजों के एक वर्ग में बहस चल रही है कि कॉलेजियम ने दिसंबर में की गई सिफारिश सार्वजनिक किए बिना या यह बताए बिना कि उसे वापस लेने की जरूरत क्या थी, अपना फैसला क्यों उलट दिया. जस्टिस कैलाश गंभीर के पत्र में लिखा गया है, ‘32 जजों की वरिष्ठता की अनदेखी करना हिलाकर रख देने वाला फैसला है. नजरअंदाज किए गए इन जजों में कई मुख्य न्यायाधीश भी शामिल हैं और ये फैसला उनके ज्ञान, उनकी प्रतिभा और ईमानदारी पर शक जताने जैसा है.’ उन्होंने पत्र लिखकर राष्ट्रपति से अनुरोध किया है कि न्यायपालिका की विश्वसनीयता और स्वतंत्रता को संरक्षित रखते हुए इस प्रकार की ऐतिहासिक भूल न की जाए. कॉलेजियम की सिफारिश पर राष्ट्रपति ही मुहर लगाते हैं.