2002 की बात है. सितंबर-अक्टूबर का महीना. राजस्थान की मरुधरा मौसम ही नहीं बल्कि राजनैतिक आबोहवा में भी बदलाव महसूस करने लगी थी. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस प्रदेश की सत्ता में चार साल पूरे करने जा रही थी. दूसरी तरफ सूबे के बाबोसा कहे जाने वाले और भाजपा के दिग्गज नेता भैरोसिंह शेखावत कुछ ही दिन पहले बतौर उपराष्ट्रपति दिल्ली पहुंच चुके थे.

लगातार पांचवें साल के अकाल ने अशोक गहलोत सरकार की तमाम उपलब्धियों को ऐसा बंजर कर दिया था जिन पर पार्टी की वापसी का कोई अंकुर फूटना मुश्किल था. प्रदेशवासी त्रस्त थे और उन्हें बदलाव चाहिए था. प्राकृतिक तौर पर नहीं तो कम से कम राजनैतिक तौर पर. लेकिन, बदलाव तो चाहिए था!

इधर भैरोसिंह शेखावत की अनुपस्थिति में मुख्यमंत्री बनने की उम्मीद पाले भाजपा के तमाम वरिष्ठ नेता एक दूसरे की जमकर काट करने में मशगूल थे. इस अंदरूनी रस्साकशी से शेखावत समेत संगठन का शीर्ष नेतृत्व अनजान न था. एक रोज़ उड़ते-उड़ते ख़बर आई कि दिल्ली से किसी नेता को भाजपा का प्रदेशाध्यक्ष बनाकर भेजा जाएगा. लेकिन इसे किसी ने गंभीरता से नहीं लिया.उस समय प्रदेश भाजपा के तत्कालीन कोषाध्यक्ष एवं पूर्व प्रदेशाध्यक्ष रामदास अग्रवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री हरिशंकर भाभड़ा, रघुवीर सिंह कौशल, पूर्वमंत्री ललितकिशोर चतुर्वेदी और भाजपा से बागी हो चुके घनश्याम तिवाड़ी सरीख़े नेता अपने आप को इस पद के योग्य प्रत्याशी के तौर पर देखते थे. इनके अलावा प्रदेश के मौजूदा नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया जैसे दिग्गज भी इस दौड़ में शामिल थे.

लेकिन इन सभी की उम्मीदों को धता साबित करते हुए तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष वैंकेया नायडू ने जयपुर में आयोजित एक सम्मेलन में वसुंधरा राजे सिंधिया को पार्टी प्रदेशाध्यक्ष के पद पर मनोनीत करने की घोषणा कर दी. बड़ी गहमागहमी हुई. आखिर में राजस्थान भाजपा के सभी धुरंधरों को मन मसोस कर रहना पड़ा.

पर यह निराशा एकतरफा नहीं थी. बताया जाता है कि वसुंधरा राजे सिंधिया, जो उस समय वाजपेयी सरकार में राज्यमंत्री थीं, ने यह जिम्मेदारी संभालने से अनिच्छा ज़ाहिर कर दी. कुछ जानकारों की मानें तो राजस्थान में दिग्गजों की फौज के आगे अपने वजूद को लेकर वसुंधरा राजे के मन में भारी संशय था. वहीं कुछ का कहना है कि इस बहाने वे अपनी कुछ मांगों को लेकर पार्टी हाईकमान से मोल-भाव करने का समय चाहती थीं.

बहरहाल, दो महीने चली ना-नुकुर के बाद वसुंधरा राजे ने विशेष मुहुर्त पर पार्टी प्रदेशाध्यक्ष पद संभाल लिया. उनकी किस्मत राजस्थान के करोड़ों लोगों से जुड़ चुकी थी. अगले साल हुए विधानसभा चुनाव में वसुंधरा राजे के रूप में राजस्थान को पहली महिला मुख्यमंत्री मिली. बाकी इतिहास है.

पिछले करीब डेढ़ दशक में वसुंधरा राजे राजस्थान में खुद को भाजपा के पर्याय के तौर पर स्थापित करने में सफल रहीं. इस दौरान प्रदेश संगठन का कोई भी छोटा-बड़ा निर्णय उनकी मुहर लगे बिना अव्वल तो लिया ही नहीं गया और उनकी रजामंदी के ख़िलाफ जो चंद फैसले लिए भी गए, वे ज्यादा समय तक टिक नहीं पाए.

किंतु, अब जब भाजपा शीर्ष नेतृत्व ने वसुंधरा राजे को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर केंद्र में बुला लिया है, कई राजनीतिकारों का कयास है कि उन्हें फिर से राजस्थान आने का मौका नहीं दिया जाएगा. इस पूरे घटनाक्रम को कुछ पत्रकार प्रदेश राजनीति में राजे युग के अंत के तौर पर देखते हैं. इन चर्चाओं में इसलिए भी दम दिखाई देता है कि नेता प्रतिपक्ष के लिए हाईकमान ने वसुंधरा राजे की पसंद की परवाह न करते हुए पूर्व गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया को चुना. वे राजे गुट के नहीं माने जाते.

वहीं, कई अन्य विश्लेषक इस साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले ऐसा कहने को जल्दबाजी मानते हैं. उनके मुताबिक जिस तरह वसुंधरा राजे इस पूरे मामले में शांत दिखी हैं, यह उनका सामान्य व्यवहार नहीं है. वसुंधरा राजे की राजनीति को करीब से जानने वाले बताते हैं कि जितनी बखूबी से उन्हें अपनी अहमियत और कद का अहसास है, उतनी ही महारत उन्हें मौके पर चौका मारने में भी हासिल है. उनका राजनैतिक इतिहास इस बात की गवाही जोर-शोर से देता है.

हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में जिस तरह भाजपा सूबे की 200 में से 73 सीटों को जीतने में सफल रही, उसके पीछे वसुंधरा राजे की बड़ी भूमिका मानी गई. राज्य में घोर विरोधी माहौल के बावजूद इस प्रदर्शन के बूते उनके नेतृत्व कौशल ने राजनैतिक गलियारों में जमकर सराहना बटोरी. राजस्थान में वसुंधरा राजे की इस पकड़ के मद्देनज़र माना जा रहा है कि लोकसभा चुनावों से पहले पार्टी हाईकमान उन्हें कतई नाराज़ नहीं करना चाहेगा. वह भी ऐसे समय में जब प्रधानमंत्री मोदी का तिलस्म कई मायनों में काफी घटा है.

एक संभावना यह भी जताई जा रही है कि चुनाव में यदि भाजपा की सीटें घटीं तो वसुंधरा राजे दिल्ली में रहकर प्रधानमंत्री मोदी के प्रतिद्वंदी गुट को मजबूती दे सकती हैं. इस स्थिति में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की कार्यशैली से नाराज़ संगठन के कई वरिष्ठ नेताओं का समर्थन वसुंधरा राजे को मिलने जैसी अटकलें भी खूब सुनने को मिल रही हैं.

प्रदेश के एक वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक वसुंधरा राजे लोकसभा चुनावों में हवा का रुख़ भांपकर ही अगला कदम उठाएंगी. यहां उनका इशारा केंद्र में बड़ी जिम्मेदारी संभालने से जुड़ी राजे की दबी मंशा से है. वे आगे जोड़ते हैं, ‘लेकिन चुनाव में यदि माहौल मोदी के पक्ष में बनता दिखा तो वे केंद्र में रुकने का ज़ोखिम नहीं उठाएंगी. और चुनाव से पहले ही आलाकमान को राजस्थान की 25 सीटों का डर दिखाकर वापसी की दमदार कोशिश कर सकती हैं.’

हालांकि सूत्रों का कहना है कि पार्टी हाईकमान ने राजस्थान में दूसरी लाइन के नेताओं को आगे बढ़ाने की मुहिम पर तेजी से काम शुरु कर दिया है. लेकिन वे इससे भी गुरेज़ नहीं करते कि हाल-फिलहाल सूबे में वसुंधरा राजे का विकल्प ढूंढ पाना टेढ़ी खीर है. इस बारे में वसुंधरा राजे समर्थकों का कहना है कि उनकी नेता का राजनैतिक कैरियर राज्य से केंद्र की तरफ नहीं, बल्कि केंद्र से राज्य की तरफ बढ़ा है. उन्हें दिल्ली से राजस्थान आने का रास्ता बखूबी मालुम है, इसलिए वे जब चाहें तब वापसी कर सकती हैं.