केंद्र सरकार चुनावी मोड में आ चुकी है. ताजा मौसम लोकलुभावन चुनावी घोषणाओं का है. जानकार मानते हैं कि सामान्य वर्ग के गरीबों को दस फीसद आरक्षण के बाद सरकार जल्द ही किसानों की कर्ज माफी और यूनिवर्सल बेसिक इनकम (यूआईबी) जैसी घोषणाओं को अमली जामा पहना सकती है. माना जा रहा है कि आने वाले अंतरिम बजट में इसका खाका और साफ हो जाएगा. उधर, विपक्ष और आर्थिक जानकार सवाल उठा रहे हैं कि इसके लिए पैसा कहां से आएगा. बढ़ते राजकोषीय घाटे और कम राजस्व संग्रह के चलते सरकार आर्थिक मोर्चे पर तंगी की हालत में है.

लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से काफी दिनों से पैसे तलाश रही सरकार के लिए एक अच्छी खबर है. केंद्रीय बैंक अंतरिम लाभांश के तौर पर सरकार को एक मोटी रकम का स्थानांतरण कर सकता है. सूत्रों के मुताबिक आरबीआई इस बात पर राजी हो गया है कि अंतरिम लाभांश के तौर पर सरकार को 30 हजार से 40 हजार करोड़ रु. ट्रांसफर कर दिए जाएं. कुछ जानकार इस रकम के 50 हजार करोड़ होने की बात भी कर रहे हैं. यानी यह तय है कि आरबीआई सरकार को पिछले साल दिए गए अंतरिम लाभांश से तीन या चार गुना ज्यादा पैसा देने जा रहा है.

सूत्रों के मुताबिक रिजर्व बैंक से पैसे हासिल करने की सरकारी कवायद पिछले काफी दिनों से चल रही है. उर्जित पटेल के गवर्नर रहते समय आरबीआई के कैपिटल फ्रेमवर्क पर जो चर्चा शुरु हुई उसका भी यह मकसद माना गया कि सरकार आरबीआई के आरक्षित कोष के ढांचे को बदलकर उससे साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये हासिल करना चाहती है. इस मसले पर काफी हंगामा हुआ. उर्जित पटेल के इस्तीफे को भी इसी से जोड़कर देखा गया. आरबीआई के नए गवर्नर के रूप में अब शक्तिकांत दास आ चुके हैं और आरबीआई के आरक्षित कोष पर फैसले के लिए बिमल जालान के नेतृत्व में कमेटी गठित हो चुकी है जो इसका फार्मूला तय करेगी कि आरबीआई को अपना आरक्षित कोष कितना रखना चाहिए.

आरक्षित कोष पर फैसला जब होगा तब होगा, लेकिन आरबीआई में नए नेतृत्व के आने के बाद नकदी संकट से जूझ रही सरकार को कई मोर्चों पर सहूलियत मिलती दिख रही है. सार्वजनिक बैंकों के कर्जे बांटने पर की जा रही सख्ती कम कर दी गई है. इसके अलावा अंतरिम लाभांश के तौर पर भी सरकार को मोटी रकम ट्रांसफर करने का फैसला कर लिया गया है.

वित्त विभाग के आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने दिसंबर में ही इस बात का इशारा कर दिया था कि अंतरिम लाभांश के तौर पर सरकार रिजर्व बैंक से ज्यादा पैसे चाह रही है. पिछले कई वर्षों से यह प्रक्रिया चल रही है कि आरबीआई नियमित लाभांश के अलावा सरकार को अंतरिम लाभांश के तौर पर पैसे दे रहा है. पिछले साल 2017-18 के वित्त वर्ष में सरकार ने आरबीआई को दस हजार करोड़ का अंतरिम लाभांश स्थानांतरित किया था, लेकिन आरबीआई के सूत्रों के मुताबिक यह तय हो गया है कि सरकार को आरबीआई तीस से चालीस हजार करोड़ के बीच रकम ट्रांसफर कर सकता है. चुनाव से ऐन पहले यह रकम राजकोषीय घाटा कम करने से लेकर कुछ नई लोकलुभावन योजनाओं की घोषणा तक कई मोर्चों पर सरकार की मदद कर सकती है.

आरबीआई हर साल अपने होने वाले लाभ से एक नियमित हिस्सा सरकार को देता है. 2017-18 में आरबीआई अगस्त में ही सरकार को 50 हजार करोड़ का लाभांश दे चुका है जो कि 2016-17 में दिए गए लाभांश से 63 फीसद ज्यादा था. लेकिन जीएसटी से लगातार घटे कर संग्रह के कारण सरकार के राजस्व में करीब एक लाख करोड़ रुपये तक की कमी आ चुकी है. इसके बाद सरकार अब अंतरिम लाभांश के तौर पर सरकार से कम से कम 40 से 50 हजार करोड़ रु तक की रकम चाहती है. सूत्रों के मुताबिक आरबीआई मार्च तक सरकार को 30 से 40 हजार करोड़ रुपये दे सकता है. जाहिर है कि यह रकम बजट घाटे और चुनावी घोषणाओं के लिहाज से सरकार को खासी मदद देने वाली है.

अंतरिम लाभांश के तौर मिलने वाली मोटी रकम के अलावा आरबीआई बाजार में भी नगदी की समस्या दूर करने के लिए सरकार को काफी राहत दे रहा है. कर्ज बांटने के नियमों में सख्ती में ढील के बाद ओपन मार्केट आपरेशंस (ओएमओ) के जरिये भी आरबीआई बाजार में नगदी का प्रवाह बढ़ा रहा है. केंद्रीय बैंक का ऐसा करना सामान्य बात है, लेकिन फिलहाल इसमें काफी उदारता बरती जा रही है. 15 जनवरी को ही रिजर्व बैंक ने ओएमओ के तहत 10 हजार करोड़ रुपये बाजार में डालने का फैसला किया है. जानकारों के मुताबिक, नगदी का प्रवाह बढ़ने के लिए आरबीआई ओएमओ के तहत 50 हजार करोड़ रुपये तक बाजार में डाल सकता है.

उधर, आरबीआई के आरक्षित कोष का स्तर और उससे सरकार को मिलने वाले अंशदान का फार्मूला तय करने के लिए बनी बिमल जालान समिति की आठ जनवरी को पहली बैठक हो चुकी है. जानकारों के मुताबिक यह अप्रैल तक अपनी रिपोर्ट सौंप सकती है. जानकारों के मुताबिक अगर अप्रैल तक आरक्षित कोष के ढांचे पर फैसला आता है तो सरकार शायद ही उससे मिलने वाले पैसे से चुनावी लाभ की घोषणा कर सके. लेकिन अगर आचार संहिता लगने से पहले यह रिपोर्ट आती है और नए नियमों के मुताबिक सरकार को एक मोटी रकम मिल जाती है तो वह लोकलुभावन घोषणाओं के साथ चुनाव में उतर सकती है.