केंद्र सरकार सामान्य श्रेणी के आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग को दस प्रतिशत आरक्षण देने के लिए देशभर के उच्च शिक्षा संस्थानों और विश्वविद्यालयों में क़रीब 25 फ़ीसदी सीटें बढ़ाएगी. मंगलवार को मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इसकी घोषणा की है. ख़बर के मुताबिक़ 2019-20 के शिक्षण सत्र से सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए घोषित सीटें बढ़ा दी जाएंगी.

सरकार का कहना है कि उसने सीटें इसलिए बढ़ाई हैं ताकि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य श्रेणियों के तहत पहले से मिल रहा कोटा प्रभावित न हो. उसके मुताबिक निजी विश्वविद्यालय भी आरक्षण लागू करने के लिए तैयार हैं. यह आरक्षण सामान्य श्रेणी के उन लोगों को दिया जाएगा जिनकी सालाना आय आठ लाख रुपये से कम होगी.

सीवर सफ़ाईकर्मियों को मुआवज़ा तक नहीं

देश में प्रति व्यक्ति आय 1.13 लाख रुपये सालाना है. फिर भी सरकार आठ लाख रुपये तक की कमाई वाले परिवार के सदस्यों को आरक्षण देने के योग्य मान रही है. सरकार की इस सोच और इससे जुड़ी व्यवस्था की एक बड़ी विडंबना यह है कि इसी सरकार के कार्यकाल में सीवर में मरने वालों को मुआवज़ा तक नहीं मिल पा रहा है. द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक़ राजधानी दिल्ली में सीवर की सफ़ाई के दौरान मारे गए 49 लोगों में से आधे के परिवारों को नियत दस लाख रुपये का मुआवज़ा नहीं मिला है. अख़बार ने केंद्रीय सामाजिक व अधिकारिता मंत्रालय के तहत आने वाले राष्ट्रीय सफ़ाई कर्मचारी आयोग (एनसीएसके) की एक रिपोर्ट के आधार पर यह जानकारी दी है.

इस रिपोर्ट के मुताबिक़ 20 पीड़ित परिवारों को दस लाख और चार को उससे कम रक़म बतौर मुआवज़ा मिली. बाक़ी 25 मृतकों के परिवारों को यह पैसा नहीं दिया गया. यह हाल देशभर में है. एनसीएसके के ही डेटा के मुताबिक़ 1993 से अब तक देश में 709 मैनहोल स्कैवेंजर्स (सीवर की सफाई करने वाले) की मौत हुई है. इनमें से 367 के परिवारों को दस लाख और 90 को उससे कम मुआवज़ा मिला है. वहीं, 204 परिवारों को कोई पैसा नहीं मिला, और 46 मामले ऐसे रहे जिनमें मृतक के उत्तराधिकारी का पता नहीं चल सका.

इस रिपोर्ट में राष्ट्रीय गरिमा अभियान (आरजीए) के संयोजक आसिफ़ शेख़ बताते हैं, ‘पीड़ित परिवारों को मुआवज़े की पूरी रक़म न मिलना आम बात है. दूसरी समस्या मुआवज़ा मिलने में होने वाली देरी है. कई मामले 2013-14 से भी पहले के हैं जिनमें परिवारों को अभी तक मुआवज़ा नहीं मिला. स्थानीय स्तर के अधिकारियों को अकसर मुआवज़ा अदायगी की प्रक्रिया का ही पता नहीं होता. एक और बात यह कि सरकार हो रही मौतों की संख्या को नहीं मानती.’

मरने वाले ज़्यादातर युवा

सरकारों का यह रवैया यह तथ्य जानने के बाद और ज़्यादा तकलीफ़देह लगता है कि सीवरों की सफ़ाई के दौरान मरने वाले ज़्यादातर सफ़ाईकर्मी युवा हैं. बीते साल आरजीए ने एक सर्वे कर बताया था कि पिछले 26 सालों के दौरान देश के 11 राज्यों में सीवर की सफ़ाई के दौरान हुए हादसों में जितने मैनहोल स्कैवेंजर्स मारे गए, उनमें से 37 प्रतिशत की उम्र 15 से 25 साल के बीच थी. वहीं 35 प्रतिशत सफ़ाईकर्मी 25 से 35 साल के थे और 23 प्रतिशत की उम्र 35 से 45 साल थी. आरजीए के मुताबिक़ इनमें से ज़्यादातर के पास आय का कोई स्रोत नहीं था, इसलिए मजबूरन इन्हें यह काम अपनाना पड़ा.

मौतों का सिलसिला इस साल भी जारी

ऐसे तमाम आंकड़े हैं जो बताते हैं कि सरकार युवाओं को नौकरी नहीं दे पा रही है. लेकिन यह भी कम विडंबना नहीं है कि जो लोग मजबूरी में सीवर की सफाई जैसा काम कर रहे हैं, वह उन्हें कोई सुरक्षा तक नहीं दे पा रही. कई रिपोर्टें हैं जो बताती हैं कि कैसे सीवर की सफ़ाई के दौरान सुरक्षा उपकरण व अन्य इंतज़ाम नहीं होने से बार-बार मैनहोल स्कैवेंजर्स की मौतें हो रही हैं. और ऐसा लगता नहीं कि इस साल कुछ बदलने जा रहा है. कुछ दिन पहले मुंबई के पनवेल इलाक़े में एक मैनहोल में दम घुटने से दो सफ़ाईकर्मियों समेत तीन की मौत हुई है. ख़बर के मुताबिक़ पहले दोनों सफ़ाईकर्मी बिना सुरक्षा उपकरणों के 20 फ़ीट गहरे मैनहोल में उतरे. जब वे नहीं लौटे तो ठेकेदार उन्हें देखने के लिए नीचे उतर गया और वह भी वापस नहीं लौटा. तीनों की ही मैनहोल में दम घुटने से मौत हो गई.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़ पुलिस ने तीनों की मौत को दुर्घटना मानते हुए केस दर्ज किया है. ऐसे में सवाल बनता है कि जिस तरह तमाम क़ानूनी प्रावधानों और नियमों को ताक पर रखकर यह सब हो रहा है, उसे जानने के बाद क्या ऐसी मौतों को महज़ दुर्घटना माना जाना चाहिए? क्या पुलिस ने दुर्घटना का केस बनाकर उस कंपनी को एक तरह से बचाने का काम नहीं किया है जिसने नियम-क़ानून का पालन किए बिना इन लोगों को सीवर की सफ़ाई के लिए भेजा था?.

न्यायपालिका से उम्मीद

जानकार कहते हैं कि सरकारों और प्रशासन से इन सवालों के जवाब शायद ही मिलें. सत्याग्रह ने पीड़ितों को मुआवज़ा नहीं मिलने और अन्य मुद्दों को लेकर एनसीएसके के सचिव नारायण दास से संपर्क किया था. लेकिन उन्होंने कहा कि वे छुट्टी पर हैं और इस मसले पर कुछ दिनों बाद बात करेंगे. हमने मंगलवार 15 जनवरी को उन्हें फ़ोन किया था. दास ने हमें 27 जनवरी के बाद बात करने को कहा है.

इस बीच इन्हीं तमाम विषयों पर अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया गया है. बार एंड बेंच की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ सर्वोच्च अदालत में जनहित याचिका दायर कर यह मांग की गई है कि मैनहोल स्कैवेंजर्स की मौतों के मामले में संबंधित स्थानीय अधिकारियों व एजेंसियों और ठेकेदारों के ख़िलाफ़ आपराधिक कार्यवाही के तहत जांच की जानी चाहिए. हो सकता है अब आगे न्यायपालिका ही हाशिये पर पड़े इन कामगारों के कल्याण की दिशा में कुछ ठोस पहल करे.