बीते दिसंबर की 28 तारीख. श्रीनगर के नौहट्टा में स्थित जामा मस्जिद. शुक्रवार दोपहर की नमाज़ ख़त्म करके ज़्यादातर नमाज़ी निकल चुके थे. तभी कुछ नकाबपोश नौजवान हाथ में इस्लामिक स्टेट (आईएस) - जिसको दाइश भी कहा जाता है - के झंडे लिए मस्जिद के मंच पर जा पहुंचे. उन्होंने ये झंडे लहराते हुए इस आतंकवादी संगठन के हक़ में नारे भी लगाए.

यह सारी घटना कैमरे में कैद हुई और अगले कुछ ही घंटों में पूरे कश्मीर के सोशल मीडिया पर आग की तरह फ़ैल गयी. इसकी खूब निंदा हुई. निंदा की दो वजहें थीं - एक यह कि इन लड़कों ने मस्जिद के मंच पर चढ़ने से पहले जूते नहीं उतारे थे और दूसरी और अहम वजह यह कि इनके हाथ में आईएस के झंडे थे.

जहां तक जूते पहनकर मस्जिद के मंच पर चढ़ने की बात थी तो इस मंच का कश्मीर के मीरवाइज़ मौलवी उमर फ़ारूक़ ने जोर-शोर से शुद्धिकरण कर लिया. इस घटना के खिलाफ एक रैली भी निकाली गयी. अब बात रह जाती है आईएस की. सवाल यह है कि क्या वाक़ई कश्मीर में आईएस, जिससे कश्मीरी लोगों का अभी तक सिर्फ टीवी और अख़बारों में परिचय था, ने पैर जमा लिए हैं.

जम्मू कश्मीर के डायरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस दिलबाग सिंह की मानें तो कश्मीर में आईएस की उपस्थिति न के बराबर है. सत्याग्रह से बातचीत में वे कहते हैं, ‘युवाओं के एक वर्ग को कट्टरपंथ की तरफ धकेला जा रहा है, वर्ना कश्मीर में आईएस की कोई साख नहीं है.’

सिंह की यह बात आशा से ज़्यादा चिंता में धकेल देती है क्योंकि इस संगठन की उपस्थिति बिलकुल नहीं होनी चाहिए थी, न कि न के बराबर. लेकिन वहीं दूसरी तरफ बहुत सारी आवाज़ें कश्मीर के अंदर और बाहर दोनों तरफ से यह कह रही हैं कि कश्मीर और आईएस का मेल नहीं हो सकता.

ऐसी ही एक आवाज़ है लेखक और ‘काउंटर-टेररिज्म एक्सपर्ट’ अजय साहनी की. साहनी कश्मीर में ‘आईएस’ का कोई सीधा प्रभाव नहीं देखते. वे कहते हैं, ‘मैं इस बारे में बार बार लिख चुका हूं. हो यह रहा है कि कश्मीर में शायद हिज़्बुल मुजाहिदीन के लड़कों से कुछ लोग इसलिए खफा हैं कि वे लोग कोई इंपैक्ट पैदा नहीं कर पा रहे हैं या कोई आपसी अनबन है, जिसकी वजह से कुछ लोग अपना एक प्रोफाइल बनाने की कोशिश में हैं.’ अजय साहनी आगे यह भी जोड़ते हैं, ‘आजकल के दौर में प्रोफाइल बनाने का सबसे आसान तरीक़ा यह है कि अपने आप को ‘आईएस’ कह दो.’

जहां दिलबाग सिंह और अजय साहनी दोनों अपने-अपने काम में माहिर हैं और उनकी बातों को हल्के में लेना बेवकूफी से कम कुछ नहीं होगा, वहीं चीज़ों को और अच्छे से समझने के लिए ज़रूरी है कि कश्मीर में ‘आईएस’ की इस प्रतिक्रिया पर एक नज़र दौड़ाई जाए.

कश्मीर और आईएस

श्रीनगर की जामा मस्जिद के बाहर हर जुम्मे को सालों से पत्थरबाज़ी होती आयी है. इन पत्थरबाज़ों के हाथ में पाकिस्तानी झंडे हुआ करते थे. फिर 2015 के एक जुम्मे की पत्थरबाज़ी में अचानक कुछ युवाओं के हाथ में ‘आईएस’ के झंडे दिखे, जिसने न सिर्फ कश्मीर में बल्कि नई दिल्ली के टीवी स्टूडियोज में भी सनसनी फैला दी.

सवाल उठे कि ‘आईएस’ के झंडे क्यों और जवाब यह था कि शायद पाकिस्तानी झंडों से मीडिया कवरेज मिलना बंद हो गया था. सत्याग्रह से बातचीत में साप्ताहिक मैगज़ीन कश्मीर लाइफ के एसोसिएट एडिटर शम्स इरफ़ान कहते हैं, ‘सबको यही लगता था कि पाकिस्तानी झंडे उठाने से अब न्यूज़ बननी बंद हो गई थी इसीलिए अब इन पथरबाज़ों ने दाइश के झंडे उठा लिए. किसे पता था कि सिर्फ तीन साल में बंदूकें उठाए लड़के अपने आप को आईए, का हिस्सा कहने लग जाएंगे.’

दो साल तक बात सिर्फ झंडे फहराने तक सीमित रही. कभी कभी टीवी पर इस बारे में विचार-विमर्श भी हो जाता था, लेकिन इससे ज़्यादा कुछ नहीं. यहां तक कि केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने नवंबर 2017 में साफ़ तौर पर कश्मीर में आईएस के होने से इंकार कर दिया. उनका कहना था, ‘भारत का कोई भी मुसलमान, जो इस्लाम में यक़ीन रखता हो, कोई मौक़ा नहीं देगा आईएस जैसे आतंकवादी संगठन को भारत में पैर ज़माने का.’

इसके बाद ही कश्मीर के कुछ मिलिटेंट्स ने अपने फोटो सोशल मीडिया पर डाले जिनमें उनके पीछे आईएस के झंडे लगे हुए थे. इन मिलिटेंट्स के चेहरे ढके हुए थे. शम्स कहते हैं, ‘लोग दुविधा में थे कि वाक़ई मिलिटेंट्स आईएस से जुड़ गए हैं या यह कोई चाल थी, लोगों को गुमराह करने की. लेकिन लोगों को सबसे बड़ा झटका लगा मार्च 2018 में जब श्रीनगर के मिलिटेंट ईसा फ़ज़ीली का जनाज़ा हुआ. इस जनाज़े के बाद कश्मीरी लोगों ने आईएस के खतरे पर गंभीरता से गौर करना शुरू कर दिया.

फ़ज़ीली के जनाज़े में कुछ नकाबपोश लड़कों ने लोगों को पाकिस्तान के झंडे फहराने से रोका. फ़ज़ीली की लाश पर भी आईएस का झंडा डाल दिया. और जो लोग पाकिस्तान के पक्ष में नारेबाज़ी कर रहे थे उनकी पिटाई की गई फ़ज़ीली का मरना कश्मीर और आईएस के रिश्ते में एक अहम कड़ी इसलिए भी है कि तभी सुरक्षा एजेंसियों ने पहली बार यह क़ुबूला था कि कश्मीर में लोग आईएस से प्रभावित हो रहे हैं.

फ़ज़ीली के साथ एक और मिलिटेंट मारा गया था. यह था हैदराबाद का रहने वाला 26 साल का मुहम्मद तौफ़ीक़ जो तब के डीजीपी एसपी वैद के मुताबिक आईएस जम्मू-कश्मीर (आईएसजेके) की आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने आया था. तब से अब तक आईएस के आधे दर्जन से ज़्यादा मिलिटेंट कश्मीर घाटी में मारे जा चुके हैं और उससे ज़्यादा अभी सक्रिय हैं. इस दौरान जून 2018 में आईएस के प्रोपेगंडा चैनल ‘अमाक’ ने दक्षिण कश्मीर में एक मुठभेड़ में मारे गए 4 मिलिटेंट्स को श्रद्धांजलि देते हुए उन्हें अपना बताया. इस समय अब कश्मीर में बाकी मिलिटेंट गुटों के साथ साथ इस्लामिक स्टेट जम्मू-कश्मीर भी एक सक्रिय गुट माना जा रहा है.

विरोध

अब जबकि कश्मीर में आईएस लगभग लगभग एक हकीकत बनकर उभर रहा है तो यहां खुले तौर पर इसका विरोध होना भी शुरू हो गया है. मुख्यधारा और अलगावादी नेताओं ने अभी तक खुले अल्फ़ाज़ में आईएस का विरोध किया है. उनका कहना है कि कश्मीर घाटी में आईएस जैसे आतंकी संगठन के लिए कोई जगह नहीं है.

अप्रत्याशित तौर पर कश्मीर के मिलिटेंट ग्रुप भी कश्मीर में आईएस का विरोध करते दिखाई दिए हैं. हिज़्बुल मुजाहिदीन के कमांडर रियाज़ नाइकू ने हाल ही में एक ऑडियो में जामा मस्जिद घटना की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि कश्मीर में आईएस के झंडे भारत के इशारे पर फहराए जा रहे हैं. नाइकू का कहना था, ‘कुछ लोग इस्लाम के नाम पर भावनाओं में बहकर झंडा उठा लेते हैं क्योंकि इस पर कलमा लिखा हुआ है. लेकिन असल में यह सब भारत की चाल है जो अंतराष्ट्रीय स्तर पर हमारी आज़ादी की जंग को आईएस जैसे आतंकवादी संगठन के साथ जोड़कर इसे बदनाम करने की कोशिश कर रहा है.’

इसके फ़ौरन बाद ही पाकिस्तान में रह रहे और यूनाइटेड जिहाद कौंसिल (यूजेसी) के मुखिया सैयद सलाहुद्दीन ने भी नाइकू की बात दोहराई. क्योंकि यूजेसी कश्मीर में सक्रिय लगभग सारे मिलिटेंट संगठनों का प्रतिनिधित्व करता है, इसका मतलब यह बनता है कि कश्मीर के सारे मिलिटेंट गुट आईएस के खिलाफ खड़े हैं.

उधर सोशल मीडिया पर भी कश्मीर के बहुत सारे लोग इस गुट और इसकी विचारधारा की निंदा करते दिखाई दे रहे हैं. लेकिन ज़्यादातर लोग कोई भी टिप्पणी करने से हिचकिचा रहे हैं. सत्याग्रह ने जिन लोगों से इस विषय में बात करने की पहल की उसमें से आधे से ज़्यादा ने कोई न कोई बहाना बना लिया और बात नहीं की.

आयरलैंड की डबलिन यूनिवर्सिटी में कश्मीर में चल रही अस्थिरता पर शोध कर रहे 33 साल के मुहम्मद ताहिर ‘इसको ‘फियर ऑफ़ अननोन’ मानते हैं. वे कहते हैं, ‘सुरक्षा एजेंसियां कहती हैं कि कट्टरपंथ की तरफ आकर्षित हुए लड़के हैं. मिलिटेंट्स कहते हैं यह सुरक्षा एजेंसियों की चाल है और जो लड़के झंडे लेकर निकलते हैं वे नकाबपोश हैं.’ ताहिर कहते हैं कि इसके चलते लोग कुछ कहने से हिचकिचा रहे हैं. उनके शब्दों में ‘आम लोग हमेशा पहले अपनी सुरक्षा देखते हैं.’

दूसरी बात यह है कि आईएस के सिद्धांतों में एक यह भी है कि पहले पास के दुश्मन को मारना चाहिए और बाद में दूर के दुश्मन को. ताहिर कहते हैं, ‘यानी पहले वे उन असैनिक मुसलमानों को मारने को कहते हैं जो उनके लक्ष्य के खिलाफ हों, चाहे वे उनके करीबी ही क्यों न हों. यह वाक़ई डरने वाली बात है.’

विरोध हो न हो, इस मुद्दे पर बात हो या न हो, सच यह है कि कश्मीर से जुड़ी चर्चा में आईएस का नाम भी आ गया है. देखने वाली बात यह है कि इसका आने वाले समय में क्या असर होगा.

आगे क्या?

सुरक्षा एजेंसियां अपना काम कर रही हैं. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी सत्याग्रह को बताते हैं कि सुरक्षा बल आईएसजेके को भी वैसे ही देखते हैं जैसे अन्य मिलिटेंट संगठनों को. वे कहते हैं, ‘जैसे उन्हें मार गिराया जा रहा है वैसे ही मौका मिलने पर इनको भी मार गिराया जायेगा.’ हालांकि उन्होंने इस पर भी चिंता जताई कि आईएस की विचारधारा कुछ युवाओं को आकर्षित कर रही है, जो आने वाले समय में एक संकट बनकर उभर सकता है.

उधर, अजय साहनी का मानना है कि कश्मीर में आईएसजेके का अंत बाकी मिलिटेंट संगठनों से जल्दी हो जायेगा. हालांकि वे यही मानते हैं कि आईएस के साथ अपना नाम जोड़ना ‘मीडिया अटेंशन’ पाने से ज़्यादा कुछ भी नहीं है. वे कहते हैं, ‘जो भी है, रणनीति के हिसाब से यह आत्महत्या से ज़्यादा कुछ भी नहीं है. दाइश नाम आते ही सुरक्षा एजेंसियों की प्रतिक्रिया असंगत हो जाती है. आने वाले समय में आप देखेंगे कि कश्मीर के सारे मिलिटेंट गुट होंगे लेकिन आईएसजेके कहीं नहीं होगा.’

दूसरी तरफ आम जनता का रुझान है, जो अभी हाल ही में देखने को मिला था जब हिज़्बुल मुजाहिदीन ने दक्षिण कश्मीर के पुलवामा ज़िले में एक नागरिक को मारकर क़त्ल का वीडियो सोशल मीडिया पर डाल दिया था. पूरे कश्मीर ने एकजुटता के साथ उस वीडियो की निंदा की थी.

कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार और लेखक फरमान अली कहते हैं, ‘वह सिर्फ एक वीडियो था और आईए तो पनप ही ऐसे वीडियो से रहा है दुनिया भर में. या फिर यूं कहें कि ऐसे वीडियो की शॉक वैल्यू से. कश्मीरी लोगों ने भले ही बहुत हिंसा देखी हो, इस सबके लिए हम बिलकुल तैयार नहीं हैं.’

दूसरा, कश्मीर के लोगों की सोच और आईएस की विचारधारा में एक बहुत बड़ा अंतर है. वह यह है कि यह संगठन सलाफ़ी इस्लाम की नींव पर खड़ा है. इस धारणा के चलते यह लोग खून बहाने को तैयार रहते हैं चाहे वह मुसलमानों का ही क्यों न हो, ख़ास तौर पर शिया संप्रदाय का. शम्स इरफान कहते हैं, ‘कश्मीर में आज तक जो भी हुआ हो यहां संप्रदाय के नाम पे लोगों का खून नहीं बहा है और न कभी बहेगा. कश्मीर में लोग, सूफी इस्लाम के सिद्धांतों पर एक दूसरे की धारणाओं का सम्मान करते हैं, भले ही वे एक दूसरे से बिल्कुल इत्तेफ़ाक़ न रखते हों.’

शम्स यक़ीन जताते हैं कि कश्मीर के लोग आईएस की विचारधारा को वैसे ही नकारते रहेंगे जैसे अभी तक नकारते आये हैं. वे कहते हैं, ‘तब तक जब तक आईएस का कश्मीर में नाम भी न बचे.’