इंग्लैंड की कंपनी ग्रामोफ़ोन एंड टाइपराइटर लिमिटेड के सेल्स एजेंटों के हिंदुस्तान आने पहले से कुछ अन्य कंपनियां यहां पैर पसार चुकी थीं. जुलाई 1901 में कंपनी का पहला सेल्स ऑफ़िसर आया और अगले साल रिकॉर्डिंग करने वाला अधिकारी गैस्बेर्ग कलकत्ता आया. इतना बड़ा मुल्क और संगीत का दायरा उससे भी विशाल. यह देख, दोनों का जोश काफ़ूर हो गया. उन्हें समझ ही न आया कि शुरुआत कहां से की जाए.

किस्सा है कि हैरान-परेशान गैस्बेर्ग को कलकत्ता में एक बार किसी रईस ने दावत पर घर बुलाया. इंतज़ाम से लेकर नाचने वालियों तक सब कुछ फूहड़ था. संगीत की रिकॉर्डिंग के लिए मनमाफ़िक कलाकार न मिलते देख उसने इंग्लैंड वापस जाने का मन बना लिया था कि एक रोज़ किसी और रईस ने उसे अपने घर न्यौता दिया. यह महफ़िल सभ्रांत थी. गाने वाले कलाकार की आमद होने पर महफ़िल में फुसफुसाहट होने लगी. गैस्बेर्ग ने अंदाज़ लगा लिया कि कोई नामी फ़नकार आया है.

फ़नकार बग्गी में से उतरा तो गैस्बेर्ग ने देखा कि वह शानदार लिबास और गहनों से लकदक एक बेहद ख़ूबसूरत लड़की है जो मेहमानों से बड़ी शालीनता से मिल रही है. उसके पास आने पर गैस्बेर्ग ने गौर किया कि लड़की की रंगत, चेहरा मोहरा और कद-काठी सब कुछ यूरोपियन था. वह समझ गया कि उसके हाथ खज़ाना लग गया है. लड़की ने गैस्बेर्ग से कहा, ‘हेलो जेंटलमैन’. गैस्बेर्ग ने अभिवादन में सिर झुका दिया. महफ़िल शुरू हुई, लड़की ने ठुमरी गाई कि समां ही बदल गया. महफ़िल के ख़त्म होने पर अपनी खनकदार आवाज़ में उसने कहा, ‘मैं, गौहर जान और ये मेरा गाना है’

आर्मीनियाई लड़की का गौहर जान बनना

यूरोपियन मां-बाप की यह लड़की कभी वक्त की मारी हुई थी. उसका पूरा नाम एंजेलीना योवार्ड था. मां विक्टोरिया योवार्ड को शौहर ने छोड़ दिया था. एक मुसलमान ने उसे और उसकी बच्चियों को अपना लिया. विक्टोरिया मल्लिका जान बन गईं और एंजेलीना गौहर जान बनकर बीसवीं सदी की हिंदुस्तान की सबसे बड़ी ठुमरी गायिका.

गौहर जान की पैदाइश आज़मगढ़ उत्तरप्रदेश की है. आज़मगढ़ की वाजिद अली शाह के अवध से ताल्लुकी की वजह से ठुमरी वहां की शान मानी जाती है. और कोई ताज्जुब नहीं कि गौहर जान भी इसी गायन शैली की ओर झुक गयीं. इनके बाद फैज़ाबाद से बेगम अख्तर भी इसी राह पर चली थीं.

सबसे पहली कलाकार जिसकी आवाज़ रिकॉर्ड हुई

यह गौहर के क़िस्से की शोहरत का टुकड़ा भर ही है कि उनकी आवाज़ हिंदुस्तान में सबसे पहले रिकॉर्ड की गयी. वगरना, वे इतनी मशहूर थीं कि जिस किसी महफ़िल या रईस की कोठी पर गातीं, सुनने वालों की भीड़ बाहर तक जमा हो जाती थी. वे ऐसी फ़नकार थीं जिन्हें लगभग 20 हिंदुस्तानी भाषाओं और बोलियों में गाना आता था.

शातिर व्यावसायिक

आठ नवंबर 1902 को हिंदुस्तान में पहली बार कुछ स्थानीय कलाकारों की रिकॉर्डिंग हुई थी. करने वाली गैस्बेर्ग की ही कंपनी ग्रामोफ़ोन एंड टाइपराइटर थी. तीन दिन बाद, यानी 11 नवंबर, गौहर जान कंपनी के अस्थायी स्टूडियो आईं. उनका आना इतना बड़ा दिन था कि गैस्बेर्ग ने अपने संस्मरण में कुछ यूं लिखा है, ‘जब वो रिकॉर्डिंग के लिए आयीं तो उनके साजिंदे इस कदर प्रभावशाली थे कि मेल्बा और कैल्वे (पश्चिम की दो मशहूर ऑपेरा गायिकाएं) भी शरमा जाएं. लोकसंगीत की सबसे बड़ी वारिस का आचरण बेहद गरिमामय था. वो अपनी कीमत भी जानती थीं और मेहनताना तय करने में हमें (कंपनी) को पसीना आ गया’. गौहर ने कंपनी से प्रत्येक रिकॉर्डिंग का 3000 रुपया लेना तय किया था जो उस वक़्त के हिसाब से काफ़ी ज़्यादा था.

रिकॉर्डिंग के लिए ठुमरी में बदलाव

विक्रम संपथ ‘माय नेम इज गौहर जान’ में लिखते हैं कि रिकॉर्डिंग वाले दिन गैस्बेर्ग उन्हें समझा रहा था कि किस तरह उन्हें ग्रामोफ़ोन के सामने गाना है, कोई हरकत नहीं करनी है वरना आवाज़ की गुणवत्ता पर असर पड़ेगा और ठुमरी को महज़ तीन मिनट में समेटना है. गैस्बेर्ग समझा ही रहा था कि वे बोलीं, ‘रिकॉर्डिंग शुरू करें मिस्टर गैस्बेर्ग’. उने चेहरे पर ऐसा आत्मविश्वास झलक रहा था मानो वे इसी काम के लिए बनी हैं.

उन दिनों ग्रामोफ़ोन रिकार्ड्स की समस्या यह थी कि एक रिकॉर्डिंग सिर्फ़ दो या तीन मिनट की होती थी. उधर, शास्त्रीय गायन लंबा होता है. आलाप और बंदिश में लय के भी तीन हिस्से होते हैं- विलंबित, मध्य और द्रुत. तिस पर कई बातें और. संपथ लिखते हैं कि गौहर ने ठुमरी को तीन मिनट में गाने के लिए अहम बदलाव किये पर इसकी मिठास और शास्त्रीयता बरक़रार रही. इन बदलावों को बाद के कलाकारों ने जस का तस इस्तेमाल किया. ‘सा’ के स्वर के साथ एक या दो सेकंड का अलाप, फिर स्थाई का मुखड़ा. गौहर स्थाई को दो या तीन तरह से गातीं और तुरंत ही अंतरे पर कुछ देर रुककर फिर स्थाई पर आ जातीं. फिर कुछ देर तान लेकर मुखड़े पर रुकतीं और स्थाई गाकर पूरा करतीं और अंत में सिग्नेचर स्टाइल में ‘माय नेम इज गौहर खान’ कहकर रुक जातीं.

गौहर ने ठुमरी के अलावा ख्याल, ध्रुपद, दादरा भजन, होरी, तराना और चैती गाये हैं. उनके गीतों की कुल जमा गिनती है 600. उन्होंने जौनपुरी, भोपाली, मुल्तानी, भैरवी और पहाड़ी जैसे तमाम राग भी गाए हैं.

हर दर गौहर

गौहर को हम पहला भारतीय ‘इंटरनेशनल स्टार’ कह सकते हैं. संपथ बताते हैं कि ऑस्ट्रिया में बनने वाली माचिस की डिबिया पर उनकी तस्वीर होती थी. डिबिया पर ‘मेड इन ऑस्ट्रिया’ लिखा होता था और वह ऑस्ट्रिया के अलावा भारत में बिकती थी. ग्रामोफ़ोन रिकार्ड्स कंपनियां उनकी तस्वीर छाप-छाप कर अपनी बिक्री बढ़ा रही थीं. पोस्ट कार्ड्स भी उनकी तस्वीर चस्पा कर बिक रहे थे. पंजाब और राजस्थान के कठपुतली खेलों में उनका नाम लिया जाने लगा था.

हुनर शोहरत के साथ-साथ दौलत भी भरपूर लाया. तंगहाली में गुज़रे बचपन के दौरान ज़ेहन में घर कर गए अभावों की भरपाई गौहर जान ने जवानी में की. महलनुमा घर, नायाब गहने, मोटर गाड़ियां और कीमती पोशाकों वाला जीवन ही सब कुछ हो गया.

जब गवर्नर ने उन्हें झुककर सलाम किया

अक्सर शाम को सज-धज कर, घोड़ों वाली बग्गी में बैठकर कलकत्ता की गलियों में अपनी दौलत की नुमाईश करना गौहर जान का शगल था. एक रोज़ उनकी छह शानदार अरबी घोड़ों वाली बग्गी सडकों पर दौड़ रही थी कि गवर्नर की भी सवारी वहां से निकली. उनकी रंगत और शान-औ-शौकत देखकर अंग्रेज़ गवर्नर ने उन्हें बंगाल के किसी शाही परिवार का व्यक्ति समझा. उसने अपनी गाड़ी रुकवाई, हैट उतारा और झुककर अभिवादन किया. गौहर की बग्गी फ़र्राटे मारती निकल गयी. जब बाद में उसे मालूम हुआ कि जिसे उसने झुककर सलाम किया वो कोई राजसी नहों बल्कि एक तवायफ़ थीं तो वह ख़ासा नाराज़ हुआ. उसने बग्गी रखने के जुर्म में गौहर पर 1000 रुपये का जुर्माना ठोक दिया. तब ऐसी सवारी सिर्फ़ शाही लोगों का अधिकार था.

दतिया के राजा और गौहर का गर्व

हिंदुस्तान की सबसे बड़ी ठुमरी और ख्याल गायिका को बड़े-बड़े राजघराने अपने यहां बुलाना शान समझते थे. एक रोज़ दतिया (मध्यप्रदेश) के राजा ने गौहर जान को बुलावा भेजा. छोटी रियासत जानकर उन्होंने मना कर दिया. दतिया के राजा ने बंगाल के गवर्नर पर दवाब डालकर उन्हें राज़ी तो करवा लिया पर गौहर ने शर्त रख दी, कि उनके लिए अलग से शाही रेल का इंतज़ाम किया जाए. दतिया नरेश मान गए. उन्होंने साथ ही गौहर जान को 2000 रुपये प्रति दिन का सम्मान देना भी तय किया. समारोह के कई रोज़ गुज़र जाने के बाद भी जब उन्हें गाने नहीं दिया गया तो उन्हें अपनी ग़लती का भान हो गया. उन्होंने दतिया नरेश से माफ़ी मांगी. व छह महीने वहां रहीं. जब विदा हुईं तो उन्हें दतिया की बेटी कहकर सम्मान दिया गया.

दिल टूटने की दास्तां

ऐसे किरदारों के जीवन में ये पल अक्सर आते हैं. गौह जान ख़ूबसूरत थीं, कमाल की फ़नकार थीं, मशहूर थीं और दौलतमंद भी थीं. कुछ अफ़साने हुए. कहीं दिल लगा. कहीं टूट गया. कभी कोई कलाकार उनका कुछ दिनों के लिए हमनवा बना तो कभी कोई रईस ज़मींदार. पर ऐसा कोई रिश्ता नहीं रहा जिसे मुकम्मल कहा जाए. तत्कालीन गुजराती थिएटर के स्तंभ अमृत केशव नायक से भी उन्हें मोहब्बत हुई थी पर यह परवान न चढ़ी.

अपने अंतिम दिनों में गौहर जान मैसूर के राजा के यहां दरबारी गायक बनकर रहीं. 17 जनवरी, 1930 को उनका देहांत हो गया. कुछ सालों के लिए वे भुला दी गईं. पर खरा सोना फिर खरा सोना ही होता है. उनके जन्मदिन, यानी 26 जून को गूगल ने उनपर डूडल बनाकर उन्हें याद किया, तो उस दिन वे ख़बर बन गईं. क्या करें, दुनिया इसी का नाम है.