अगर मैं कहूं – लक्ष्य (2004)

जावेद अख्तर आमतौर पर एब्सट्रैक्ट पोएट्री से दूरी बनाकर रखते हैं. ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा,’ ‘मैं कोई ऐसा गीत गाऊं’ हो या ‘मैं हूं ना’ ज्यादातर गानों में वे सीधे-सीधे नायक से अपनी बातें कहलवाते रहे हैं. ऋतिक रोशन और प्रिटी जिंटा पर फिल्माया गया यह गाना भी कुछ ऐसा ही है. इसकी खासियत यह है कि इसे अगर बगैर सुर-ताल के ऐसे ही कहा-सुना जाए तो भी यह कलात्मकता से कही गई उतनी ही खूबसूरत बातचीत लगेगी. तब कोई शायद ही यह अंदाजा लगा पाए कि इसे गाया भी जा सकता है.

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बात मेरी सुनिए तो जरा – कुछ ना कहो (2003)

ऐश्वर्या राय और अभिषेक बच्चन पर फिल्माया गया यह गाना शादी-ब्याह में होने वाली चुहल को दिखाता है. जावेद अख्तर ने इस झड़प-झगड़े को जिस तरह से एक गीत का चेहरा दिया है, उसने इसे और भी खूबसूरत बना दिया है.

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राधा कैसे न जले – लगान (2001)

सिचुएशन, संवाद और संगीत के मीटरों पर फिट बिठाकर हर मन की बात कैसे कही जाती है, जावेद अख्तर का यह गाना इसकी मिसाल है.

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वो लड़की है कहां – दिल चाहता है (2001)

इजहार से पहले वाले प्यार की बात करने वाला यह गाना कई लंबे-लंबे कथनों को खुद में समेटता है, उदाहरण के लिए ‘जाने क्यों ख्याल आया मुझे कि वो लड़की कहीं तुम तो नहीं.’ इतनी लंबी लाइनें गीत क्या कविताओं में भी शायद ही रची जाती हैं. लेकिन इनकी तुक मिलाते हुए भी वे बातचीत की तान को कहीं चूकते नहीं हैं.

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पहली बार – दिल धड़कने दो (2015)

जावेद अख्तर ने इस गाने को सुनकर समझ में आता है कि वे कितनी बारीकी से अपने आसपास पर नजर रखते हैं. नए जमाने के वे संवाद जो छोटी-छोटी लाइनों में किए जाते हैं, उनको जावेद ने इस गाने में इस्तेमाल किया है. बेतरतीब सी लेकिन बामतलब बातें किसी को भी थिरका देने वाले गीत में कैसे बदलती है, इसका पता जावेद अख्तर के लिखे और शंकर-एहसान-लॉय के कंपोज किए इस गाने से चल सकता है.

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यह आलेख सबसे पहले फाइव पॉइंट्स डॉट इन पर प्रकाशित हुआ था.