दिल्ली पुलिस ने कुछ दिन पहले जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार व नौ अन्य लोगों के खिलाफ राजद्रोह के मामले में चार्जशीट दायर की है. लोकसभा चुनाव से पहले उसकी इस कार्रवाई पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं आई हैं. इनमें यह सवाल भी शामिल है कि क्या इस मामले में 1,200 पेज की चार्जशीट तैयार करने के बाद भी पुलिस कन्हैया कुमार व अन्य आरोपितों को सजा दिला पाएगी. सरकारी आंकड़े देखें तो राजद्रोह के मामले पुलिस पर सवाल खड़े करते हैं.

इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि बीते तीन साल के दौरान राजद्रोह से जुड़े केवल 18 मामलों में ट्रायल पूरा हुआ और केवल दो को दोषी करार दिया गया. बाकी सभी पर लगे राजद्रोह के आरोप या तो खारिज कर दिए गए या उन्हें बरी कर दिया गया. अखबार ने नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के डेटा के आधार पर यह जानकारी दी है.

रिपोर्ट के मुताबिक एनसीआरबी पर राजद्रोह के कुल 179 मामलों का डेटा उपलबध है. वहीं, वार्षिक रिपोर्ट के लिहाज से केवल 2014 से 2016 के दौरान दर्ज हुए मामलों के आंकड़े उपलब्ध हैं. खबर के मुताबिक 2016 के अंत तक पुलिस 80 प्रतिशत मामलों में चार्जशीट दायर नहीं कर पाई. देश भर की अदालतों में राजद्रोह के 90 प्रतिशत मामले लंबित पड़े हैं.

एनसीआरबी के डेटा पर गौर करने पर पता चलता है कि 2014 की शुरुआत से राजद्रोह के आरोप के तहत गिरफ्तारियां बढ़ी हैं. उस समय तक केवल नौ लोग ऐसे थे जो इस आरोप के चलते या तो हिरासत में थे या जांच के दौरान जमानत पर थे. लेकिन साल खत्म होने तक 58 नई गिरफ्तारियां दर्ज की गईं. हालांकि पुलिस केवल 16 मामलों में चार्जशीट दायर कर पाई. उस साल अदालतों में कुल 29 राजद्रोह के आरोपितों को पेश किया गया. लेकिन केवल चार के खिलाफ ट्रायल पूरा हो सका. 77 प्रतिशत मामले लंबित रहे और तीन आरोपित बरी हो गए.

इसी तरह 2015 में राजद्रोह के तहत नई गिरफ्तारियों की संख्या बढ़ कर 73 हो गई. लेकिन पुलिस केवल 13 मामलों की जांच पूरी कर सकी. तीन मामलों में कोर्ट ने आरोपितों को रिहा कर दिया. उस साल 38 आरोपित राजद्रोह के मामलों में अदालत में पेश किए गए. लेकिन केवल 11 की सुनवाई पूरी हो सकी और किसी को भी अपराधी करार नहीं दिया गया. साल खत्म होने तक कुल लंबित मामलों की संख्या 108 रही.

उसके बाद 2016 में 48 नई गिरफ्तारियां रिकॉर्ड की गईं. इन्हें पिछले लंबित मामलों से मिला कर कुल पेंडिंग केसों की संख्या 156 हो गई. उस साल 26 मामलों में चार्जशीट दायर की गई और 83 प्रतिशत मामले लंबित ही रहे. 2016 में केवल तीन मामलों का ट्रायल पूरा हो सका. उनमें एक आरोपित को दोषी करार दिया गया और दो बरी हो गए.

इसे लेकर रिपोर्ट में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, ‘आतंकवाद से जुड़े कुछ मामलों को छोड़ दें, तो ज्यादातर राजद्रोह के मामले राजनीति से प्रेरित हैं. उन्हें या तो किसी सामाजिक कार्यकर्ता पर थोपा गया या कुछ समूह या सरकार का विरोध कर रहे छात्रों के खिलाफ शुरू किया गया. पुलिस को पता है कि इन मामलों का क्या होना है. वह तब तक इन मामलों पर ध्यान नहीं देती जब तक कि उस पर दबाव नहीं बनाया जाता. क्योंकि वे पहले ही कमजोर आधार पर अदालत में ले जाए जाते हैं और असफल रहते हैं.’