‘द जंगल बुक’ के बारे में कौन नहीं जानता. छोटी सी कहानी है, पर 1894 में लिखी रुडयार्ड किपलिंग की इस किताब ने पूरी दुनिया को मोहित करके रखा हुआ है. एनिमेशन फ़िल्म वालों के लिए तो यह कहानी सोने का खज़ाना है. वाल्ट डिज़्नी स्टूडियो ने इस पर कई फ़िल्में बनाई हैं. कई दूसरे छोटे-मोटे प्रोड्यूसरों ने भी इस पर काम किया है. गुलज़ार का इसी कहानी पर गीत ‘चड्डी पहनके फूल खिला है...’ कालजयी बन गया है. दक्षिण भारत के जंगल में एक बच्चे मोगली की दास्तां के बारे में कई किवदंतियां जन्म ले चुकी हैं. उधर, कुछ लोग मानते हैं कि विध्यांचल के जंगलों में एक ऐसा लड़का था.

एक किंवदंती के मुताबिक 1268 में कन्नौज से गहड़वाल वंश के पैर उखड़ने के बाद इस घराने का एक नन्हा राजकुमार छिपते-छिपाते जंगलों में ही भटक गया था. उसी दौर में मारवाड़ (राजस्थान) में मेर (एक जाति) लुटेरों के अत्याचार से परेशान पालीवाल ब्राह्मण सहायता मांगने अलग-अलग राज्यों का दौरा कर रहे थे. उनमें से एक समूह ने पहली बार उस गहड़वाल राजकुमार को जंगल में शेरों और भेड़ियों के साथ खेलते देखा. इन हतप्रभ ब्राह्मणों ने उसी बच्चे को अपना संरक्षक बनाने की ठानी. शेर यानी सिंहों के साथ खेलने की वजह से उसे ‘सीहा’ नाम दिया. सीहा को राज और युद्ध कौशल की सारी विधाएं सिखाई गईं.

आगे चलकर इसी बच्चे ने जोधपुर में राठौड़ वंश की स्थापना की और राव सीहा के नाम से जाना गया.बाद में शेर और भेड़ियों से खेलते सीहा के बचपन को जोधपुर किले में चित्रकारी के रूप में उकेरा गया. बताया जाता है कि जब रुडयार्ड किपलिंग जोधपुर आए तो वे इन तस्वीरों से खासे प्रभावित हुए और राव सीहा के बचपन को ही उन्होंने मोग़ली के किरदार में ढालकर, जंगलबुक जैसी कालजयी रचना रच दी. अपनी इस यात्रा में जोधपुर किले के विशाल आकार और भव्यता को देखकर किपलिंग ने कहा था, ‘यह इंसानों का काम नहीं हो सकता, कोई दैवीय शक्ति ही इस किले को बना सकती है.’

पर यह मामला किवदंती से ज़्यादा कुछ और भी प्रतीत होता है. जानकारों का मानना है कि रुडयार्ड किपलिंग को इस कहानी की प्रेरणा कुछ हकीक़त के किस्सों से मिली है. किपलिंग ने अपनी किताब ‘समथिंग ऑफ़ माइसेल्फ़’ में इसे क़बूल भी किया है कि उन्हें हेनरी हैगार्ड के ‘नाडा दा लिली’ से इस कहानी का प्लाट मिला था. उधर, किपलिंग के समकालीन ब्रिटिश सैन्य अफ़सर सर विलियम स्लीमन ने अपनी किताब ‘जर्नी थ्रू अवध’ में कुछ ऐसे किस्सों का जिक्र किया है जिनमें भेड़िए इंसानी बच्चे उठाकर जंगलों में ले गए थे. ज़्यादातर बच्चे तो उन्होंने खा लिए पर कुछ उनके साथ रहते पाए गए. दीना सनीचर ऐसा एक बच्चा बताया जाता है जिसे जंगलों में से लाया गया था. ये बच्चे अक्सर हाथों और पैरों के बल चलते थे और इनका पूरा बर्ताव जानवरों जैसा ही था. स्लीमन ने ऐसे कुल छह बच्चों का ज़िक्र किया है.

इसमें कोई दो राय नहीं कि रुडयार्ड किपलिंग प्रतिभाशाली थे. गद्य और पद्य दोनों ही में उन्हें महारत हासिल थी. वे सबसे कम उम्र में नोबेल पुरुस्कार प्राप्त करने वाले लेखक हैं. 1907 में जब उन्हें यह पुरस्कार मिला तो उनकी उम्र 41 साल थी. हालांकि जितनी शोहरत रुडयार्ड किपलिंग को ‘द जंगल बुक’ से मिली वह किसी और चीज से नहीं.

रुडयार्ड किपलिंग बॉम्बे में पैदा हुए थे. उनके पिता जेजे स्कूल ऑफ़ आर्ट्स में वास्तुकला पढ़ाते थे. किपलिंग की चमकदार जिंदगी की किताब में एक काला पन्ना भी है. वे उसी जमात के अंग्रेज़ हैं जो भारत और दक्षिण एशिया के बारे में अलग राय रखती थी. विलियम हंटर, विलियम स्टुअर्ट, कैथेरीन मायो और बेवर्ली निकोलस इसी श्रेणी के विद्वान् हैं जिनका यह मानना रहा कि अंग्रेज़ या गोरा होना ईश्वरीय वरदान है.

रुडयार्ड किपलिंग घोर रंगभेदी व्यक्ति थे. पश्चिम को श्रेष्ठ मानते हुए उन्होंने कहा था कि पूर्व और पश्चिम दो अलग हिस्से हैं जो कभी नहीं मिलेंगे. अपनी एक कविता- द वाइट मैंस बर्डन’- में तो वे साफ़ तौर पर कहते हैं कि अमेरिका और यूरोप के लोगों पर एशिया और अफ्रीका के महाद्वीप के लोगों का भार है. यानी गोरों को दूसरी नस्ल के लोगों के लिए कुर्बानी देनी पड़ेगी. यह कविता पहली बार 10 फ़रवरी 1899 को न्यू यॉर्क टाइम्स में छपी थी. इसके छपते ही दुनिया भर में प्रतिक्रियाएं हुईं. जहां एक तरफ़ ख़ुद को ‘पीड़ित’ पाकर पश्चिमी जगत फूला नहीं समा रहा था वहीं अन्य लोगों को यह अपमानजनक लगा. अमेरिका में भी इसका विरोध हुआ था. कई लोगों ने विरोधस्वरुप ‘द पुअर मैंस बर्डन’ या ‘द ब्लैक मैंस बर्डन’ जैसी कविताएं लिखी.

साबुन बनाने वाली कंपनी पियर्स ने इस कविता को चरितार्थ करते हुए विज्ञापन निकाला. इसमें एक तस्वीर थी जिसमें नेपथ्य में एक अश्वेत व्यक्ति को गोरे के हाथों पियर्स साबुन को लेता हुआ दिखाया गया था और आगे एक गोरा आदमी कंपनी के साबुन से हाथ धो रहा था. नीचे बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था- स्वच्छता का पाठ पढ़ाना गोरे व्यक्तियों पर एक भार है. जैसे-जैसे सभ्यता पृथ्वी के अंधेरों में जायेगी, पियर्स का साबुन उन अंधेरों को साफ़ करेगा.

रुडयार्ड किपलिंग ने जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के सबसे बड़े अभियुक्त आर डायर का समर्थन किया था. उनके मुताबिक़ डायर ने लोगों को मारकर हिंदुस्तान को बचाया था. डायर पर मुक़द्दमा तो हुआ था पर उसे बिना किसी सज़ा दिए सिर्फ़ नौकरी से बर्खास्त कर ब्रिटेन भेज दिया गया था. जब वह इंग्लैंड आया तो किपलिंग ने उसके लिए ‘क्राउड फंडिंग’ करवाई थी. मशहूर लेखक आरके नारायण ने कभी कहा था कि रुडयार्ड किपलिंग की हिंदुस्तान के आदमियों और बाज़ारों से ज़्यादा समझ जंगलों और जानवरों की है. मशहूर व्यंगकार जॉर्ज ऑरवेल ने उनके बारे में कहा था कि किपलिंग ब्रिटिश उपनिवेशवाद के सबसे बड़े पैरोकारों में से एक हैं.

‘गंगादीन’, ‘किम’, ‘इफ़’ और ‘रिक्की- टिक्की-टवी’ रुडयार्ड किपलिंग की अन्य यादगार कृतियों में गिनी जाती हैं. उनके समकालीनों की नज़र में वे सबसे बेहतरीन लेखक थे जिसके पास लेखन की हर विधा मौजूद थी. अंतिम दिनों में रुडयार्ड काफ़ी बीमार रहे. एक बार तो उनके जिंदा रहते ही उनके देहांत की ख़बर पूरे इंग्लैंड में फ़ैल गई थी. बताते हैं कि मज़ाकिया स्वाभाव के किपलिंग ने एक अख़बार को लिखकर कहा, ‘मुझे ख़बर हुई है कि मैं मर गया हूं. आपसे निवेदन है कि मुझे अपनी सब्सक्राइबर की फेहरिस्त में से हटाना मत भूलिएगा. कुछ समय बीमार रहने के बाद 18 जनवरी, 1936 को इस लेखक ने आखिरी सांस ली.