आर्थिक तौर पर कमजोर सवर्णों को शिक्षा व नौकरियों में 10 फीसदी आरक्षण दिए जाने की व्यवस्था को द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) ने मद्रास हाई कोर्ट में चुनौती दी है. स्क्रोल डॉट इन के मुताबिक यह याचिका डीएमके के संगठन सचिव आरएस भारती ने दाखिल की है. इस याचिका में कहा गया है कि आरक्षण की व्यवस्था गरीबी हटाने जैसे किसी कार्यक्रम से संबंधित नहीं है. इसका उद्देश्य शिक्षा और रोजगार से वंचित रहे समुदायों के लोगों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ना है.

इस बारे में आरएस भारती के वकील पी विलसन ने कहा है कि तमिलनाडु में पहले से ही 69 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था लागू है. अगर सवर्ण आरक्षण को भी राज्य में लागू किया जाता है तो यह सीमा बढ़कर 79 फीसदी पर पहुंच जाएगी जो कि असंवैधानिक है. विलसन ने आगे कहा कि इस याचिका के जरिये उन्होंने अदालत से इस पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की है.

डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन पहले से ही सवर्ण आरक्षण को लेकर विरोध जताते आए हैं. इसी महीने की आठ तारीख को उन्होंने तमिलनाडु सरकार से इसके विरोध में राज्य विधानसभा में एक प्रस्ताव लाने को भी कहा था. इसके अलावा तब उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा लाए सवर्ण आरक्षण विधेयक को ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ भी बताया था.

इधर, आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को दस फीसदी आरक्षण का लाभ देने वाला यह विधेयक इसी महीने की आठ तारीख को लोकसभा में पारित हुआ था. तब संसद के निचले सदन में इसके पक्ष में 323 जबकि विरोध में चार वोट पड़े थे. इसके अगले ही दिन इस विधेयक को राज्यसभा में भी मंजूरी मिल गई थी. राज्यसभा में संबंधित विधेयक सात के मुकाबले 156 वोटों से पारित हुआ था.

हालांकि, संसद में इस विधेयक के पारित होने के बाद यूथ फॉर इक्वलिटी नाम के एक संगठन ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है. इस याचिका में भी कहा गया है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था को लागू नहीं किया जा सकता और यह कदम असंवैधानिक है.