लेखक: पिया सुकन्या, माइकल ई वार्ड, आरती बागडी

निर्देशक: पिया सुकन्या

कलाकार: राधिका आप्टे, अक्षय ओबेरॉय, आदिल हुसैन, अमित सियाल, रवि किशन

रेटिंग: 2/5

‘बॉम्बैरिया’ देखना रोलर-कोस्टर राइड लेने जैसा है. मतलब कि इस पर बैठने के बाद आप किसी पल तो खूब मजे लेते हैं और किसी पल घबराहट में यह सोचते हैं कि आप यहां आए ही क्यों? इस क्रम में फिल्म के खत्म होते ही आप खुद से पहला सवाल पूछते हैं कि आखिर यह क्या था, तो जवाब मिलता है भसड़. भसड़ यानी अराजकता का अपना सौंदर्य तो होता है लेकिन उसकी अपनी सीमाएं भी होती हैं. यही वजह है कि ‘बॉम्बैरिया’ सिनेमा के ज्यादातर पैमानों पर खरी नहीं उतर पाती है.

अपनी दो घंटे से दस मिनट कम लंबाई में ‘बॉम्बैरिया’ कई बार चौंकाती है, बीच-बीच में हंसाती है, कभी-कभी डराती भी है, फिर कुछ मौकों पर बोर भी कर देती है. लेकिन यह सब करने के बावजूद यही नहीं बता पाती कि यह खुद किस जॉनर की फिल्म है. हालांकि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि यह मनोरंजक नहीं है या देखे जाने लायक नहीं है, बस भीड़ से अलग है इसलिए आपके वक्त के साथ आपका थोड़ा धैर्य भी चाहती है.

इस फिल्म में ढेर सारा ‘केओस’ है. मसलन अगर राजनीति है तो उसमें नेताओं की साजिशें भी हैं और कोशिशें भी, या फिल्म इंडस्ट्री है तो उसमें अभिनेताओं के टैंट्रम्स भी हैं और मजबूरियां भी और अगर मुंबई शहर है तो झुग्गियां भी हैं और ऊंची बिल्डिंग्स भी. इसी तरह अगर शादी है तो एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर भी हैं और अगर प्रोफेशनल्स हैं तो हाथ बढ़ाकर यूं ही मदद करने वाले अजनबी भी. कुल मिलाकर मुंबई शहर के नाम से आपको जो कुछ भी याद आता हो इस फिल्म में सब कुछ है और यह सब मिलकर खूब सारा शोर रचते हैं. इस शोर को आप क्या, कब, कैसे, कहां और क्यों जैसे बहुत सारे सवालों के साथ परदे पर आते-जाते देखते रहते हैं. और अगर इसे बगैर दिमाग लगाए देखा जाए, बिना किसी उम्मीद के देखा जाए तो यह काम भर का मजा दे देता है.

अभिनय पर आएं तो आदिल हुसैन के बारे में कहा जा सकता है कि एक ही फ्रेम में, एक ही मूड में, एक ही तरह की बातें करते हुए पूरा ध्यान खींचने वाला अभिनय कैसे किया जाता है, वे बखूबी जानते हैं. वहीं, पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ से हैरान-परेशान पीआर (पब्लिक रिलेशन) का काम करने वाली लड़की की भूमिका में राधिका आप्टे टिपिकल बंबई गर्ल बनती हैं और अपने कम नजर आने वाले ग्लैमरस लुक से लुभाती हैं. राधिका के काम में अलग या नया कहा जा सकने जैसा तो कुछ भी नहीं है लेकिन वे इतनी नैचुरल हैं कि गड्ड-मड्ड कहानी में भी मिसफिट नहीं लगतीं. इन दोनों के अलावा रवि किशन, अमित सियाल और अक्षय ओबेरॉय भी अपने-अपने हिस्से का शोर पैदाकर पर्याप्त ध्यान खींचते हैं.

बतौर निर्देशक डेब्यू कर रही पिया सुकन्या की ‘बॉम्बैरिया’ आखिर में इंसानों के आपस में एक-दूसरे बिना डोर जुड़े होने की फिलॉसफी का जिक्र करती है और इसके साथ ही गवाहों की सुरक्षा पर बने कानून पर कॉमेंट भी करती है. हालांकि ये बातें इस केओस को जस्टिफाई करने के लिए कही गई लगती हैं. ये फिल्म के आखिरी चौथाई हिस्से पर ही लागू होती हैं, इसलिए जरा कम ही समझ आती हैं. यह भी एक वजह है कि बॉम्बेरिया एक बढ़िया आइडिया पर बनी सार्थक मनोरंजक फिल्म बनने से पहले ही खत्म जाती है.