निर्देशक : इवान आयर

लेखक : इवान आयर, किसलय

कलाकार : गीतिका विद्या, सलोनी बत्रा, विकास शुक्ला, मोहित चौहान

रेटिंग : 4/5

अभी कुछ वक्त पहले ही हमने ‘सिंबा’ नामक कॉप ड्रामा देखकर सर पीटा था. फिर यह देखकर और पीटा कि हमारे दर्शकों के पास क्वालिटी सिनेमा का इस कदर अकाल पड़ा हुआ है कि वे मनोरंजन के नाम पर किसी भी तरह के सर्कस के मुरीद हो रहे हैं. ‘सिंबा’ की घोर सफलता और इस सफलता का घनघोर सेलिब्रेशन ये आगाह करने के लिए काफी है कि हिंदी सिनेमा अब भी केवल सुंदर-सजीले, चुस्त-दुरुस्त नायकों के भरोसे चल रहा है और इस बॉलीवुड के बदल जाने का मुगालता पालना अभी-भी दिवास्वप्न ही है.

18 जनवरी 2019 को नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई दो महिला पुलिसकर्मियों की कहानी कहने वाली ‘सोनी’ देखकर ‘सिंबा’ की फिर से याद आई. ‘सिंबा’ की तरह ‘सोनी’ भी एक तरह से कॉप ड्रामा है, लेकिन उसका विलोम होकर धीमी गति का उत्कृष्ट सिनेमा है. ऐसा सिनेमा जिसे किसी सुंदर समय में ‘सिंबा’ से ज्यादा सेलिब्रेट किया जाता और नेटफ्लिक्स पर थोड़ी-बहुत जनता द्वारा न देखकर थियेटरों में जिसे देखने के लिए लंबी-लंबी कतारें लगतीं.

लेकिन, जिस तरह धर्म जनता के लिए अफीम होता है उसी तरह महंगी पलायनवादी मसाला फिल्में भी सिनेमा के अनेक दर्शकों के लिए अफीम है. हिंदुस्तानी दर्शक अब यही नशा करने के लिए थियेटर जाना पसंद करता है.

‘सोनी’ को पहली बार फीचर फिल्म निर्देशित कर रहे इवान आयर ने बनाया है और किसलय नामक सज्जन के साथ मिलकर इसकी पटकथा लिखी है. इसके क्रेडिट्स में ‘अन्हे घोड़े द दान’ और ‘चौथी कूट’ जैसी अद्भुत फिल्में बनाने वाले गुरविंदर सिंह का खास शुक्रिया अदा किया गया है जो यह बताने के लिए काफी है कि ‘सोनी’ किस सेंसिबिलिटी की फिल्म है. धीमी गति का यह सिनेमा आपको एक बॉलीवुड फिल्म दिखाने की जगह ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन अनातोलिया’ (2011) जैसी अद्भुत धीमी फिल्म की तरह अपने किरदारों के ठीक बीच में खड़ा कर देता है और आप भूल जाते हैं कि यथार्थ नहीं, सिनेमा देख रहे हैं. यह उस दर्जे का यथार्थवादी सिनेमा है. और पूरी तरह हिंदुस्तानी जायके वाला सिनेमा है.

पितृसत्तामक समाज और उसी मानसिकता के पायों पर खड़ी पुलिस बिरादरी में काम करने वालीं दो सशक्त महिला पुलिसकर्मियों की कहानी कहने वाली ‘सोनी’ की नायिका सोनी (गीतिका विद्या) गरम दिमाग की सब-इंस्पेक्टर है. अन्याय का विरोध करने से वो खुद को रोक नहीं पाती और महिला सुरक्षा के नाम पर होने वाली खोखली बयानबाजी के बीच अक्सर नियम-कायदे ताक पर रख बैठती है. ‘सिंबा’ के नायक की तरह उसे ऐसा करने के लिए शाबाशी नहीं मिलती (अगर हमारी तरह आप भी ‘सोनी’ और ‘सिंबा’ की समानांतर तुलना करते चलेंगे तो पता चलता जाएगा कि बॉलीवुड हमें किस तरह कूपमंडूक बना रहा है), बल्कि अधिकारी उसका तबादला बार-बार पुलिस कंट्रोल रूम में कर देते हैं.

पुलिस कंट्रोल रूम वो घुटन भरी जगह है जहां शिकायतों के लिए फोन करने वाले नागरिक महिला पुलिसकर्मियों की आवाज सुनकर उनका निजी फोन नम्बर मांगने लग जाते हैं. सोनी का दर्द केवल एक युवा आईपीएस अफसर कल्पना (सलोनी बत्रा) समझती हैं और सीनियर-जूनियर की इक्वेशन होने के बावजूद दोनों के बीच की अबोली दोस्ती ही इस फिल्म को बेइंतिहा रोशन करती है.

इस फेमिनिस्ट फिल्म को देखते वक्त आपको आजकल की फिल्मों में उपयोग होने वाले ऑन योर फेस बाजारू नारीवाद पर तरस आएगा. ‘सोनी’ बेहद सटल अंदाज में दो महिलाओं की दोस्ती को प्रमुखता से उभारती है, महिलाओं के खिलाफ होने वाले अन्यायों को रेखांकित करती है, पॉवरफुल मर्दों के सामने उनकी आवाज की पिच में आने वाला बदलाव तक हमें महसूस करवाती है, और धारदार संवादों में हमारे वक्त की हकीकत को सामने रखती है. लेकिन कभी भी भाषणबाजी की शक्ल अख्तियार नहीं करती.

ऐसा होता इसलिए है क्योंकि फिल्म नारीवादी घोषणापत्र न होकर सोनी और कल्पना नाम के दो किरदारों की कैरेक्टर स्टडी ज्यादा है. यह निर्देशक इवान आयर का हुनर है कि उन्होंने महिला मन में इतनी कुशलता से झांका है कि ‘सोनी’ देखते हुए यह बहस ही बेमानी लगती है कि मजबूत और रियलिस्टिक महिला किरदारों को सिनेमा में पुरुष नहीं, केवल महिला निर्देशक बेहतर पोट्रे कर सकती हैं. इवान ने पुरुष होकर नारी मन को बहुत खूब समझा है.

सोनी और कल्पना के रोल में दोनों ही अंजान अभिनेत्रियां अभूतपूर्व काम करती हैं. यह कहना कि वे अभिनय कर रही थीं तो जैसे उनके साथ ज्यादती करना होगा. गीतिका विद्या और सलोनी बत्रा नाम की ये अभिनेत्रियां असल में अपने किरदारों को जी रही थीं और उनके साथ उनकी कहानियों को हम जी रहे थे.

दुबली-पतली काया वाली विद्रोही नायिका सोनी के रोल में गीतिका विद्या ने रिबेलियस किरदारों से जुड़े बॉलीवुड क्लीशे नहीं अपनाकर एक अलहदा छवि पेश की, और तनाव वाले वक्त में उनके द्वारा व्यक्त किए एक्सप्रेशन्स खासतौर पर कमाल रहे. सह-नायिका सलोनी बत्रा के पास सहानुभूति रखने वाला सहृदय किरदार आया था और अमूमन ऐसे किरदारों के पास कुछ नया करने का स्कोप नहीं होता. लेकिन यह उनकी काबिलियत है कि कल्पना के किरदार में उन्होंने ढेर सारी मानवीयता और फिक्र भरकर उसे अति का प्रभावी बनाया.

इन दोनों बेमिसाल नायिकाओं की बीच के दृश्य भी धीरे-धीरे परवान चढ़ती दोस्ती को ऑर्गेनिक तरीके से व्यक्त करते हैं, और जब हाथ में रसीदी टिकट थाम लेते हैं तो फिल्म का सबसे कमाल फलसफा हमारी नजर करते हैं.

‘सोनी’ की एक बहुत बड़ी खूबी उसकी अद्भुत सिनेमेटोग्राफी है (सिनेमेटोग्राफर - डेविड बोलन). इस फिल्म का ‘हर’ सीन सिंगल टेक में फिल्माया गया है! छोटी अवधि के दृश्यों से लेकर छह-आठ मिनट लंबे दृश्यों तक में केवल एक कैमरा लगातार सीक्वेंस शूट करता है और कलाकार जहां जाते हैं उनके साथ चलता जाता है. अमूमन फिल्में या तो चतुर एडिटिंग का प्रयोग कर ऐसा आभास देती हैं जैसे वे पूरी की पूरी सिंगल टेक में फिल्माई गई हैं (‘बर्डमैन’), या फिर कई फिल्में किसी बेहद महत्वपूर्ण सीन को ही लंबे सिंगल टेक में रचती हैं और यह सीन आगे चलकर खासा मशहूर हो जाता है (‘हंगर’, ‘चिल्ड्रन ऑफ मैन’).

लेकिन सोनी इन सबसे अलग हटकर कल्पनाशीलता को ऊंची उड़ान देती है और हर एक सीन को बड़ी मेहनत से सिंगल टेक में फिल्माती है. फिल्म देखते वक्त आपको भी समझ आएगा कि आखिर क्यों यह इतना मुश्किल काम है, क्योंकि न तो यह तकनीकी प्रवीणता के शो-ऑफ के लिए किया गया है, और न ही यह मुश्किल तरीका सरलता से फिल्म देखने के आड़े आने दिया गया है. हैंड-हैल्ड कैमरा का मूवमेंट कभी हिचकोले नहीं खाता और कभी आपको नहीं लगता कि कैमरा कहानी में दखलंदाजी कर रहा है. सबसे खास बात, कि अगर सिनेमा के इतिहास के मशहूर सिंगल टेक शॉट्स के प्रति आपकी पहले से कोई खास रुचि नहीं है तो हो सकता है कि ‘सोनी’ खत्म हो जाए और आपको पता भी न चले कि यह सैकड़ों सिंगल टेक दृश्यों से मिलकर बनी है! इसका कैमरावर्क इतना तरल है.

‘सोनी’ फटाफट नेटफ्लिक्स पर देख लीजिए. कैमरे के इस ब्रिलियंट उपयोग की वजह से ही आप फिल्म के किरदारों की दुनिया का हिस्सा आसानी से बन पाएंगे. उनकी दुनिया में जैसे ‘ट्रांसपोर्ट’ हो जाएंगे, दिल्ली के कुछ पुलिसकर्मियों की जिंदगी और उनके पुलिस स्टेशन को सांस लेते हुए महसूस कर पाएंगे. क्योंकि जनाब आप कोई सिनेमा नहीं, दो अजनबी जिंदगियों के यथार्थ को उनके बीच मौजूद रहकर घटते हुए देखने वाले हैं.