हाल के समय में कर्ज की उपलब्धता में हुए इजाफे को देखें तो अर्थव्यवस्था में सुधार साफ दिखता है. लेकिन अतीत के उलट इस दौरान प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र में कर्ज की विकास दर सुस्त बनी हुई है. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक बीते 18 महीनों के दौरान यह इकाई के अंक से आगे नहीं बढ़ सकी. अखबार के मुताबिक इससे अंदाजा लग जाता है कि क्यों नोटबंदी और जीएसटी के बाद ग्रामीण क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में छाई सुस्ती अब भी जारी है.

अखबार ने भारतीय रिजर्व बैंक के पिछले पांच सालों के डेटा विश्लेषण के आधार पर यह जानकारी दी है. उसके मुताबिक प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र का ऋण बकाया, सकल बैंक ऋण की तुलना में ज्यादा तेजी से बढ़ता रहा है. इसे क्षेत्र के तहत कृषि और उससे संबद्ध गतिविधियों के अलावा सूक्ष्म व लघु उद्योग, गरीबों के लिए घर, छात्रों की शिक्षा, कम आय वाले समूह और कमजोर वर्ग आते हैं. आरबीआई के नियमों के मुताबिक बैंकों को अपने ऋण में से 40 प्रतिशत हिस्सा इस क्षेत्र के लिए अलग से रखना पड़ता है. ऐसा अर्थव्यवस्था के समग्र विकास के उद्देश्य के तहत किया जाता है. नोटबंदी से पहले यह ऋण देने की दर सकल बैंक क्रेडिट की तुलना में सामान्य रूप बढ़ रही थी. लेकिन नोटबंदी और जीएसटी के बाद इसमें गिरावट दर्ज की गई, खास तौर पर कृषि क्षेत्र में.