साल 1993 में शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने मशहूर पत्रकार रजत शर्मा के टीवी शो में शिरकत की थी. इस दौरान तमाम पॉलिटिकल सवाल-जवाबों के बाद उनसे पूछा गया कि वे फिल्मी हस्तियों के सम्पर्क में तो खूब रहते हैं लेकिन, क्या कभी फिल्मों में अभिनय करने की इच्छा भी रखते हैं. जवाब में अपने चिर-परिचित अंदाज में बाल ठाकरे का कहना था, ‘अगर किया भी तो मुझे विलेन की भूमिका ही मिलेगी.’

बाल ठाकरे के इस अंदाजे से उलट उन्हें लार्जर दैन लाइफ हीरो की तरह दिखाने वाली फिल्म ‘ठाकरे’ आते शुक्रवार को रिलीज होने वाली है. शिवसेना लीडर और राज्यसभा सांसद संजय राउत के प्रोडक्शन तले बनी यह फिल्म हिंदी के साथ-साथ मराठी में भी बनाई गई है. बीते महीने इसका ट्रेलर रिलीज होने के साथ ही यह चर्चा जोरों पर हो रही थी कि ‘हिंदू हृदय सम्राट’ की छवि रखने वाले बाल ठाकरे की भूमिका उत्तर प्रदेश से आए एक मुसलमान कलाकार नवाजुद्दीन सिद्दीकी से करवाई जा रही है. वह भी तब जब बाल ठाकरे और शिवसेना हमेशा ही यूपी-बिहार के लोगों और मुसलमानों से खास तौर पर आपत्ति के चलते सुर्खियों में रहे.

इस फिल्म से शिवसेना का सीधा जुड़ाव होने के बाद भी अगर ऐसा हुआ है तो सवाल उठता है कि क्या पार्टी की विचारधारा में कोई बड़ा बदलाव आया है. या फिर यह माना जा चुका है कि कोई मराठी कलाकार बतौर अभिनेता वह कद या हुनर नहीं रखता जो उत्तर प्रदेश से आए नवाजुद्दीन सिद्दीकी के पास है? यह पहला सवाल है जो कई मानते हैं कि महाराष्ट्र के लोगों को शिवसेना से पूछना चाहिए.

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इस मसले पर मीडिया और सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं में यह बात शामिल रही कि नवाजुद्दीन की कास्टिंग की वजह उनकी प्रतिभा के साथ-साथ, उनकी उपस्थिति से राजनीतिक हितों का सध जाना भी थी. बहुत से लोगों का मानना है कि ऐसा कर शिवसेना अपनी उदार छवि पेश करने की कोशिश में है. इसके अलावा फिल्मों के जानकार यह भी कहते नज़र आए कि ‘ठाकरे’ कोई क्षेत्रीय फिल्म नहीं है और किसी बड़े चेहरे को न लेने पर फिल्म का देश भर में व्यवसाय कर पाना मुश्किल होता. इसलिए दूसरे नंबर पर यह पूछा जाना चाहिए कि इन बातों के बाद क्यों इस फिल्म को शिवसेना का प्रोपेगेंडा सेट कर देने वाली फिल्म नहीं माना जाना चाहिए. अच्छी बात है कि यह बात हर आम-ओ-खास समझ और समझा रहा है लेकिन फिर भी यह मराठी भाषियों द्वारा शिवसेना से पूछा जाने वाला जरूरी सवाल है.

इसके बाद तीसरा सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि मराठी और हिंदी के ट्रेलर में इतना अंतर क्यों रखा गया है. मराठी में जारी किया गया ट्रेलर ‘योंडू-गोंडुओं’ (दक्षिण भारतीयों) से पार पाने और मराठी अस्मिता की रक्षा करने की बात कहता है. इसके यूट्यूब डिस्क्रिप्शन में भी कहा गया है कि ‘मराठी माणूस दबला नाही, कारण बाळासाहेब ‘ठाकरे’ झुकले नाही’ (मराठी व्यक्ति दबा नहीं क्योंकि बाल ठाकरे झुके नहीं). इसके उलट हिंदी ट्रेलर में यह बात नज़र नहीं आती. एक संवाद में तो शिवसेना के बनने की वजह भी ‘जनता की सेवा’ करने की इच्छा बताई गई है. बाकी झलकियों में भी बाबरी मस्जिद, क्रिकेट और सीमा पर तैनात जवानों का जिक्र किया गया है, यानी वे सब मुद्दे जिनसे आजकल राष्ट्रीय राजनीति चलायमान हो रही है.

सवाल है कि क्यों हिंदी और मराठी संवादों में अंतर कर महाराष्ट्र के सबसे बड़े नायक की छवि देश के सामने कुछ और तरह से रचने की कोशिश की गई है और उसके राज्यवासियों के सामने कुछ और. क्या ऐसा कर शिवसेना दिखाना चाहती है कि वह खुद इस बात से मुतमईन नहीं है कि बाल ठाकरे का कद इतना बड़ा है कि वे अपनी मराठी नेता की पहचान और दो-टूक वाले अंदाज के दम पर देश भर के लोगों को प्रभावित कर सकते हैं? अगर ऐसा नहीं है तो हिंदी ट्रेलर में उनकी छवि किसी आम नेता जैसी क्यों दिखती है, यह चौथा सवाल है!

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