जून 2013 की बात है. गोवा में हुई भारतीय जनता पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक में नरेंद्र मोदी को लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार अभियान समिति का प्रमुख बनाए जाने का फैसला हुआ. नरेंद्र मोदी तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे. इस फैसले से उस वक्त पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेता माने जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी इतने नाराज हुए कि वे खराब सेहत का हवाला देकर बैठक में गए ही नहीं. तब भाजपा के कई वरिष्ठ नेता कुछ दिनों तक उन्हें मनाने में लगे रहे थे. भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग बताते हैं कि उस वक्त संकटमोचक की भूमिका स्वामीनाथन गुरुमूर्ति ने निभाई. उन्होंने आडवाणी को इस बात के लिए राजी किया कि चुनाव तक उन्हें नरेंद्र मोदी के मुद्दे पर सार्वजनिक तौर पर कुछ बोलने से बचना चाहिए.

मई, 2014 में भाजपा को पहली बार अपने बूते केंद्र में सरकार बनाने का बहुमत मिल गया. इसके बावजूद लालकृष्ण आडवाणी ने पार्टी सांसदों के एक कार्यक्रम में कह दिया कि इस बात की समीक्षा करनी होगी कि इस जीत के लिए किसी व्यक्ति के पक्ष में बनी लहर जिम्मेदार है या फिर कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार के खिलाफ लोगों में पनपा गुस्सा. उनके बाद जब नरेंद्र मोदी के बोलने का अवसर आया तो उन्होंने अपने अंदाज में इसका प्रतिवाद किया था.

कभी भाजपा के लौहपुरूष कहे जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी की ओर से सार्वजनिक तौर पर नरेंद्र मोदी के खिलाफ दिया गया यह आखिरी बयान था. इसके बाद उन्होंने चुप्पी ओढ़ ली. बीते दिनों ही खबर आई है कि पिछले पांच साल के दौरान लालकृष्ण आडवाणी संसद में 296 दिन उपस्थित रहे, लेकिन बोले कुल मिलाकर सिर्फ 365 शब्द. सदन में सबसे आगे की कतार में बैठने वाले और भाजपा के प्रखर वक्ताओं में गिने जाने वाले इस दिग्गज के बारे में कभी किसी ने शायद ही यह सोचा हो.

इस चुप्पी के कारणों पर खूब अटकलें लगीं. पहली तो यही थी कि आडवाणी अब राष्ट्रपति बनना चाहते हैं. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भाजपा और संघ में कई लोगों की यह इच्छा थी कि 2017 में लालकृष्ण आडवाणी को राष्ट्रपति बनाया जाए. भाजपा के वरिष्ठ नेता नितिन गडकरी ने कुछ मौकों पर कहा भी कि राष्ट्रपति बनने के लिए जिन खासियतों की जरूरत होती है, वे सभी लालकृष्ण आडवाणी में हैं.

भाजपा के कुछ नेता यह दावा भी करते हैं कि पार्टी या पार्टी के बाहर के जो भी लोग लालकृष्ण आडवाणी के करीब थे, उनमें से अधिकांश लोगों ने उनको यही सलाह दी कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर उन्हें कुछ नहीं बोलना चाहिए. ये लोग आडवाणी को यह समझाने में कामयाब हो गए थे कि इससे उनकी राष्ट्रपति बनने की संभावनाएं कमजोर पड़ जाएंगी.

इसे 2016 की एक घटना के जरिए समझा जा सकता है. लालकृष्ण आडवाणी के साथ लंबे समय तक काम करने वाले विश्वंभर श्रीवास्तव ने एक किताब लिखी - ‘आडवाणी के साथ 32 साल.’ इस किताब में कुछ ऐसी बातें थी जिनसे राजनीतिक तौर पर विवाद पैदा हो सकता था. माना जाता है कि इस आशंका को देखते ही आडवाणी ने सार्वजनिक तौर पर यह बयान जारी कर दिया कि न तो इस किताब को लिखने के लिए उनसे कोई सहमति ली गई और न ही उन्हें इसकी पांडुलिपि दिखाई गई.

उधर, विश्वंभर श्रीवास्तव ने इस बात को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि यह किताब आडवाणी की सहमति से लिखी गई है. अपनी बात को सही साबित करने के लिए उन्होंने एक तस्वीर जारी की जिसमें वे आडवाणी के साथ खड़े थे और यह किताब भी तस्वीर में स्पष्ट तौर पर दिख रही थी. उस वक्त हर किसी ने माना कि लालकृष्ण आडवाणी ने इस पुस्तक से इसलिए दूरी बना ली कि विवाद में पड़कर राष्ट्रपति बनने की उनकी संभावनाओं पर ग्रहण न लगे.

भाजपा के लौहपुरुष और 2002 के गुजरात दंगों के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के गुस्से से नरेंद्र मोदी को बचाने वाले आडवाणी ने भले ही इस मामले में परहेज बरता, लेकिन उनके हाथ निराशा लगी. उन्होंने आडवाणी के मुकाबले पार्टी में अपेक्षाकृत कम अहम जिम्मेदारियों को निभाने वाले रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद के लिए भाजपा का उम्मीदवार बना दिया.

2017 में जब राष्ट्रपति चुनाव हो रहे थे तो आडवाणी 90 साल की उम्र पूरा करने के काफी करीब थे. जब उन्हें राष्ट्रपति नहीं बनाया गया तो उनकी उम्र को देखते हुए इसकी कोई संभावना नहीं बची कि अब उन्हें आगे इस पद पर आने का मौका मिलेगा. प्रधानमंत्री पद की दावेदारी से तो वे 2014 में ही पूरी तरह बाहर हो गए थे. इसके बाद माना जा रहा था कि अब वे आम लोगों से जुड़े मसलों पर या पार्टी से जुड़े मसलों पर खुलकर बोलना शुरू करेंगे. लेकिन वे ऐसा नहीं कर पाए. बल्कि कुछ घटनाएं ऐसी हुईं जिनसे यह लगता है कि आडवाणी अब पहले के मुकाबले कहीं अधिक डरने लगे हैं.

उदाहरण के लिए दिसंबर, 2018 में दिल्ली विधानसभा का रजत जयंती समारोह की बात करते हैं. इस कार्यक्रम के लिए दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष रामनिवास गोयल ने लालकृष्ण आडवाणी को बतौर मुख्य अतिथि आने का न्यौता दिया. उन्होंने इसे स्वीकार लिया. इसके बाद भाजपा के कुछ नेता यह कहकर आडवाणी का विरोध करने लगे कि आम आदमी पार्टी के प्रभाव वाले इस कार्यक्रम में उनके जाने से भाजपा और नरेंद्र मोदी के खिलाफ माहौल बनेगा. इसके बाद आडवाणी ने कार्यक्रम के ठीक पहले अपने निजी सहायक के जरिए यह सूचना दिलवा दी कि वे निजी वजहों से इस कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाएंगे.

अब सवाल यह उठता है कि जब उपप्रधानमंत्री रहे लालकृष्ण आडवाणी के सामने प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनने की संभावनाएं न के बराबर बची हों तो फिर उन्हें किस बात का डर लग रहा है. हाल ही में आडवाणी से मिलने गए एक वरिष्ठ पत्रकार ने उनसे कहा कि पार्टी से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों या आम लोगों से जुड़े मुद्दों पर अब उन्हें खुलकर बोलना चाहिए. इसके मुताबिक इस सलाह पर आडवाणी ने लंबी चुप्पी साध ली.

कभी लालकृष्ण आडवाणी के साथ काम करने का अनुभव रखने वाले कुछ भाजपा नेताओं से बातचीत करने पर इसकी तीन वजहें समझ में आती हैं. पहली तो यह कि आडवाणी नियमों के दायरे में चलने वाले नेता रहे हैं. अभी वे भाजपा के सांसद हैं. इसलिए उन्हें लगता है कि अगर वे पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठाएंगे तो इसका सही राजनीतिक मतलब नहीं निकाला जाएगा. लेकिन कइयों को यह तर्क दमदार नहीं लगता. उनके मुताबिक अगर आडवाणी इतने ही पार्टी के नियमों पर चलने वाले होते तो 2013 में मोदी का विरोध नहीं करते क्योंकि मोदी को चुनाव प्रचार अभियान समिति का अध्यक्ष बनाना पार्टी का सामूहिक निर्णय था.

आडवाणी के अब भी डरने की दूसरी वजह यह बताई जाती है कि कहीं न कहीं उनकी बेटी प्रतिभा आडवाणी की राजनीतिक महत्वकांक्षाएं उन्हें मुखर होने से रोक रही हैं. पिछले कुछ चुनावों से यह देखा जा रहा है आडवाणी के संसदीय क्षेत्र गांधीनगर में चुनाव प्रचार अभियान के प्रबंधन का पूरा काम प्रतिभा आडवाणी ही देखती आ रही हैं. ऐसे में यह चर्चा कई बार चली है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में गांधीनगर से आडवाणी की जगह उनकी बेटी प्रतिभा आडवाणी उम्मीदवार बन सकती हैं. ऐसे में लालकृष्ण आडवाणी को लगता है कि अगर वे मुखर होते हैं तो इससे उनकी बेटी के राजनीतिक भविष्य पर नकारात्मक असर पड़ सकता है.

आडवाणी के डर की एक तीसरी वजह भी बताई जाती है. वह यह कि अगर 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद कोई ऐसी स्थिति बनती है कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री न बनें और भाजपा के किसी और नेता के प्रधानमंत्री बनने की संभावना पैदा हो तो उस वक्त 91 साल की उम्र में भी आडवाणी बेहद अहम हो सकते हैं. कुछ की मानें तो आडवाणी को यह लगता है कि अगर वे मोदी सरकार के खिलाफ मुखर हो जाएंगे तो संघ को भी वे खटकेंगे और अगर चुनावों के बाद मोदी के प्रधानमंत्री न बनने की संभावना पैदा हुई तो उस वक्त संघ आडवाणी का साथ नहीं देगा.

तो इसका क्या एक मतलब यह भी निकाला जाए कि 91 साल के आडवाणी क्या ऐसी परिस्थिति में अब भी खुद के लिए प्रधानमंत्री बनने की कोई उम्मीद देखते हैं और इसी वजह से चुप्पी साधे रखते हैं? राजनीति की अनिश्चितता को देखते हुए किसी ऐसी संभावना को सिरे से खारिज भी नहीं किया जा सकता. इस संदर्भ में मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद का उदाहरण प्रासंगिक है. बीते साल ही वे 93 साल की उम्र में मलेशिया के प्रधानमंत्री बने हैं.