अभी इसी महीने की शुरूआत की बात है. केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने दो जनवरी को केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में एक विधेयक को मंज़ूरी दी थी. यह है- ट्रेड यूनियन (संशोधन) विधेयक. इसके जरिए मोदी सरकार ने 1926 के ट्रेड यूनियन कानून में संशोधन करने की तैयारी की है. इस संशोधन के जरिए पुराने कानून में धारा-10 ए जोड़ी जा रही है. उम्मीद की जा रही है कि संसद के आने वाले बजट सत्र में यह विधेयक संभवत: पारित भी हो जाएगा. इसके बाद केंद्र और राज्यों की सरकारों को अधिकार मिल जाएगा कि वे सिर्फ़ मान्यता प्राप्त यूनियनों से जुड़े संघ-संगठनों से ही औद्योगिक व श्रम नीतियों, कानूनों आदि पर बातचीत करें.

केंद्रीय श्रम मंत्री संतोष गंगवार की मानें तो ‘ट्रेड यूनियन कानून’ में संशोधन की मांग मज़दूर यूनियनों की ही है. वह भी पुरानी. लिहाज़ा इसे मानते हुए हम सुनिश्चित कर रहे हैं कि सरकारों से विभिन्न मसलों पर त्रिपक्षीय वार्ता में सिर्फ़ मान्यता प्राप्त यूनियनें ही बैठें. इससे मसलों का हल जल्द होगा. आए दिन होने वाली हड़तालों आदि से निज़ात मिलेगी. ऐसे में जाहिर तौर पर उत्पादकता भी बढ़ेगी.’ यानी संतोष गंगवार के हिसाब से तो संशोधन विधेयक में मोटे तौर पर कोई परेशानी नज़र नहीं आती. इसका विरोध तो दूर की बात है. लेकिन इसके बावज़ूद विरोध हुआ. यहां सिर्फ़ ध्यान दिलाना ही काफ़ी है कि तमाम श्रम संगठनों ने जनवरी की आठ-नौ तारीख़ को जो ‘भारत बंद’ आयोजित किया था, वह इसी मसले पर था क्योंकि उन्हें सरकार की मंशा में कुछ और भी छिपा नज़र आया.

तो संदेह का आधार कहां से तैयार हो रहा है?

श्रम संगठनों की मानें तो इस संशोधित कानून में ऐसी गुंज़ाइश जानबूझकर छोड़ी गई हैं जिनकी मदद से आने वाले समय में सरकारें आसानी से कामग़ारों की आवाज़ दबा सकेंगी. मसलन- अभी परंपरा है कि श्रम नीति, कानून या मांग आदि से जुड़े मसलाें पर तीन पक्षों में बातचीत होती है. पहला- संबंधित विभाग या कंपनी यानी नियोक्ता के प्रतिनिधि, दूसरा- कर्मचारियों यानी विभागीय श्रम संगठनों के लोग, तीसरा- सरकार के प्रतिनिधि. इस त्रिपक्षीय बातचीत में सर्वसम्मति से ही संबंधित मसले का हल किया जाता है. लेकिन अब जानकारों की मानें तो ट्रेड यूनियन कानून संशोधित होने के बाद बातचीत के लिए पक्ष तो तीन ही बैठेंगे लेकिन मर्ज़ी सरकारों की चलेगी.

इसकी वज़ह दो बताई जा रही हैं. पहली ये कि संशोधित कानून त्रिपक्षीय वार्ता में सरकारों को कुछ विशेषाधिकार देने वाला है. दूसरा- सरकारें श्रम यूनियनों को किन-किन मापदंडों और पात्रताओं को पूरा करने पर मान्यता देंगी, इस बारे में संशोधित कानून में कोई ज़िक्र नहीं है. यानी वहां भी शायद सरकारों को अपने हिसाब से मापदंड तय करने की गुंज़ाइश रहेगी. इसी तरह की कुछ चीजें और हैं, जिनसे श्रम संगठनों में आशंका पैदा हुई है कि संशोधित कानून श्रमिकाें/कर्मचारियों के शोषण का हथियार बन सकता है.

यहीं से रेल यूनियनों की चिंता भी शुरू होती है

यही दिक्क़त रेल यूनियनों की भी है. उन्हें आशंका है कि संशोधित ट्रेन यूनियन कानून के प्रावधान लागू होने पर उनकी मौज़ूदा व्यवस्था में भी व्यापक फेरबदल हो सकता है. उनके मामलाें में सरकार की दख़लंदाज़ी बढ़ जाएगी. कैसे? इसका उत्तर जानने से पहले यह जानना ज़रूरी है कि वर्तमान में रेलवे में यूनियनों की मान्यता के नियम पहले से ही बने हुए हैं. दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के 2007 के एक आदेश के बाद उसी साल से भारतीय रेलवे के इतिहास में पहली बार यूनियन चुनाव की प्रक्रिया हुई थी. गुप्त मतदान के ज़रिए चुनाव का बंदोबस्त हुआ. इसके ज़रिए रेल कर्मचारी यह चुनाव करने लगे कि उनकी प्रतिनिधि यूनियन/यूनियनें कौन सी होंगी, जो सरकार के सामने उनका पक्ष रखेंगी.

चुनाव प्रक्रिया शुरू हुई तो उसके नियम-क़ायदे भी तय किए गए. इनके मुताबिक हर छह साल में पंजीकृत रेल यूनियनाें की मान्यता का चुनाव होना तय हुआ. इस हिसाब से अब तक 2007 और 2013 में दो बार चुनाव हो चुके हैं. इनमें 2013 के चुनाव के समय यूनियनों की मान्यता के लिए जो तौर-तरीके (मॉडेलिटीज़) तय किए गए थे, उनमें तीन स्थितियों में यूनियनों को मान्यता के पात्र माना गया. पहला- चुनाव के दौरान उन्हें कुल मतदाताओं (रेल कर्मचारी) के 30 प्रतिशत का समर्थन मिला हो. या दूसरा- चुनाव के समय जितने वोट डाले गए, उनमें से 35 फ़ीसदी वैध मत मिले हों. या फिर तीसरा- कुल मतदान का 35-35 फ़ीसद वोट भी किसी को न मिले तो कम से कम 20 प्रतिशत वोट पाने वाली यूनियनों को मान्यता दी जाएगी. यानी उन्हीं यूनियनों से संबद्ध केंद्रीय श्रम संगठन (सीटीयू) सरकार से बातचीत के लिए अधिकृत होंगे.

इन नियमों के हिसाब से 2007 और 2013 में एआईआरएफ (ऑल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन) और एनएफआईआर (नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन रेलवेमेन्स) ने राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता हासिल की. क्योंकि उनसे संबंधित यूनियनों से अधिकांश रेलवे ज़ाेन में 35-35 फ़ीसदी या उससे ज़्यादा वोट हासिल हुए थे. लेकिन इस बार ऐसी आशंका जताई जा रही है कि मोदी सरकार ट्रेड यूनियन कानून में संशोधन की आड़ में कम से कम 35 फ़ीसदी वोट हासिल करने की अनिवार्यता को शिथिल कर सकता है. इसे घटाकर 20 प्रतिशत वोट की अनिवार्यता तक नीचे लाया जा सकता है. ताकि दो यूनियनों- वाम समर्थित एआईआरएफ और कांग्रेस के समर्थन वाली एनएफआईआर का वर्चस्व ख़त्म किया जा सके. कहा जा रहा है कि इससे सबसे बड़ा फ़ायदा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े बीआरएमएस (भारतीय रेल मज़दूर संघ) को हो सकता है.

ऐसी कोशिशें पहले भी हाे चुकी हैं, जिनका मक़सद शुद्ध सियासी

वैसे ये कोई पहला मौका नहीं है जब रेल यूनियनों में केंद्र की सरकारों ने इस तरह की दिलचस्पी दिखाई हो. पूर्व में इसी तरह नियमों में बदलाव कर कांग्रेस ने एक के बज़ाय दो यूनियनों को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाने की व्यवस्था बनाई थी. इस तरह उससे संबद्ध एनएफआईआर की इस क्षेत्र में आमद हुई. फिर 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने भी इसी तरह की कोशिश की. ताकि बीआरएमएस को भी इस व्यवस्था में शामिल कराया जा सके. लेकिन तब मामला कोर्ट में चला गया, जिस पर 2007 में फ़ैसला हुआ और चुनाव के जरिए मान्यता का बंदोबस्त किया गया. और अब इस चुनावी प्रक्रिया में ही बदलाव किए जाने की अटकलें लगाई जा रही हैं.

ऐसे में सवाल लाज़िमी है कि आख़िर सरकारों की रेलवे यूनियनों के चुनाव या मान्यता आदि में इतनी दिलचस्पी क्यों है? इसका सीधा सा ज़वाब है- सियासत. शुद्ध चुनावी सियासत. दरअसल रेलवे भारत सरकार का सबसे बड़ा उपक्रम है. इसकी पंजीकृत यूनियनाें के साथ लगभग 13-14 लाख कर्मचारी संबद्ध बताए जाते हैं. यानी एक कर्मचारी के परिवार में औसतन तीन सदस्यों को ही वोट देने लायक मानें तो यह संख्या 35-40 लाख के आसपास हो जाती है. सो, जाहिर तौर पर इतनी बड़ी तादाद में जिस उपक्रम के पास मतदाता वर्ग हो, उसे सरकारें अपने शीशे में उतारने की कोशिश तो करेंगी ही. आगामी बजट सत्र में ट्रेड यूनियन कानून में अगर बदलाव होता है, जिसकी संभावना पर्याप्त है, तो उसे इसी कोशिश का हिस्सा माना जा सकता है. अलबत्ता यह भी तय है कि बदलाव के असर लोक सभा चुनाव के बाद ही दिखेंगे.