स्विट्ज़रलैंड के शहर जेनेवा के पास स्थित यूरोपीय परमाणु भौतिकी प्रयोगशाला ‘सेर्न’ और उसके नए मूलकण त्वरक (सिंक्रोट्रॉन) ‘एलएचसी’ (लार्ज हैड्रन कोलाइडर) के अस्तित्व को दुनिया ने पूरी गंभीरता के साथ पहली बार 2008-2009 के दौरान महसूस किया था. उन दिनों वहां एक अपूर्व प्रयोग होने जा रहा था. इसके बारे में यह अफ़वाह भी फैल गई थी कि इससे एक ऐसा ‘ब्लैक होल’ भी बन सकता है जो देखते ही देखते सब कुछ निगलकर हमारी पृथ्वी को भी ‘ब्लैक होल’ में बदल देगा. इस डर से इस प्रयोग को रोकने के लिए जर्मनी सहित कई देशों के न्यायालयों में याचिकाएं तक दायर की गई थीं.

फिर दुनियाभर के लोगों ने तब राहत की गहरी सांस ली जब 10 सितंबर 2008 को ‘एलएचसी’ की 27 किलोमीटर लंबी भूमिगत रिंग में परमाणु के प्रोटॉन कणों की पहली किरण (बीम) दौड़ाई गई और कुछ नहीं हुआ. लेकिन दस ही दिनों में संसार की इस सबसे बड़ी और महंगी मशीन में कुछ ऐसी गड़बड़ी भी आ गई कि मरम्मत के लिए नवंबर 2009 तक इसे बंद रखना पड़ा. मीडिया में इसकी एक बार फिर ज़ोरदार चर्चा तब हुई, जब चार जुलाई 2012 के दिन ख़बर आई कि ‘एलएचसी’ के दो डिटेक्टरों ने परमाणु के मूलकणों को भार प्रदान करने वाले और ‘गॉड पार्टिकल’ या कहें कि ‘ब्रह्मकण’ के नाम से प्रसिद्ध हो गए ‘हिग्स-बोसॉन’ के अस्तित्व की पुष्टि करने वाले आंकड़े दर्ज किए हैं. मार्च 2013 में इस खोज की अंतिम पुष्टि भी हो गई.

पीटर हिग्स और सत्येंद्र नाथ बोस ने इस कण की कल्पना की थी

ब्रिटिश भौतिकशास्त्री पीटर हिग्स और भारत के सत्येंद्रनाथ बोस की भविष्यवाणियों और उनके नामों पर आधारित ‘हिग्स-बोसोन’ की पुष्टि को भौतिकशास्त्र के क्षेत्र में एक बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है. इसके लिए पीटर हिग्स को तो 2013 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार भी मिला, जबकि सत्येन्द्रनाथ बोस ख़ाली हाथ रह गए. असल में नोबेल पुरस्कार केवल जीवित व्यक्तियों को दिया जाता है. बोस का 80 वर्ष की आयु में 1974 में देहांत हो चुका था. वे इतने काबिल भौतिक विज्ञानी थे कि उनका नाम पदार्थ की अब तक ज्ञात पांच अवस्थाओं में से एक ‘बोस-आइनश्टाइन कन्डेनसैट’ में भी आता है. यह अवस्था गैसों को परमशून्य (–273.15डिग्री सेल्सियस) तक ठंडा करने पर देखी जाती है. इस क्वान्टम अवस्था की भविष्यवाणी सबसे पहले सत्येन्द्रनाथ बोस ने ही की थी.

‘सेर्न’ 23 देशों के ‘यूरोपीय नाभिकीय शोध संगठन’ के फ्रेंच भाषा के मूल नाम ‘कौंसेल एरोपें पौर ला रेशेर्श नुक्लीएर’ का शॉर्ट फॉर्म है. जनवरी 2017 से भारत भी ‘सेर्न’ के पांच सह-सदस्यों में से एक है और उसके बजट के लिए क़रीब एक करोड़ 68 लाख 50 हज़ार यूरो (एक यूरो = करीब 80 रुपये) का अंशदान करता है. वहीं भारतीय वैज्ञानिक भी ‘सेर्न’ की शोध-सुविधाओं का लाभ उठाते हैं. उसके मूलकण त्वरक ‘एलएचसी’ में भारतीय उपकरण भी इस्तेमाल हुए हैं. करीब 21 प्रतिशत योगदान के साथ जर्मनी ‘सेर्न’ के बजट का सबसे बड़ा अंशदाता है. ब्रिटेन 16 प्रतिशत और फ्रांस 14 प्रतिशत के साथ क्रमशः दूसरे और तीसरे नंबर पर हैं.

एलएचसी में क्या होता है

‘एलएचसी’ की इस्पाती रिंग में परमाणु के प्रोटॉन कणों या सीसे (लेड) के आयनों को प्रचंड ऊर्जा देकर लगभग प्रकाश की गति से दौड़ाते हुए आपस में टकराया जाता है. इस टक्कर से उनके भीतर के और भी सूक्ष्म कण बहुत ही अल्पकाल के लिए टूटकर बिखर जाते हैं. इस तरह ऐसे और भी सूक्ष्म मूल कणों का पता चलता है, जो अब तक अज्ञात थे या जिन के अस्तित्व को अभी तक सिद्ध नहीं किया जा सका था. हिग्स-बोसोन के अस्तित्व को इसी तरह सिद्ध किया गया है.

‘एलएचसी’ की अब तक की उपलब्धियों से प्रोत्साहित ‘सेर्न’ के वैज्ञानिक और इंजीनियर अब उससे भी कहीं बड़ी और शक्तिशाली, एक दूसरी महाबली मशीन बनाना चाहते हैं जिसे ‘एफ़सीसी’ (फ्यूचर सर्क्युलर कोलाइडर) नाम दिया गया है. मूलकणों के बीच भिड़ंत कराने वाली इस नई मशीन की भूमिगत रिंग और सुरंग 100 किलोमीटर लंबी होगी और 100 मीटर की गहराई पर बनेगी. इसके निर्माण पर कुल 24 अरब यूरो के बराबर ख़र्च आने का अनुमान है. इसकी सहायता से ‘बिग बैंग’ कहलाने वाले उस ‘महाधमाके’ के प्रथम नैनो सेकंडों (एक अरब नैनो सेकंड = एक सेकंड) की रचना की जाएगी, जिसके साथ ब्रह्मांड की उत्पत्ति का श्रीगणेश हुआ था.

एफसीसी में क्या होगा

नये मूलकण त्वरक ‘एफ़सीसी’ के निर्माण के लिए हरी झंडी अभी नहीं दिखाई गई है. 2020 तक ‘सेर्न’ के यूरोपीय सदस्य़ देशों के वैज्ञानिकों को सुझाव देना है कि मूलकण भौतिकी में शोधकार्य को किस तरह आगे बढ़ाया जाना चाहिए. सदस्य देशों की सरकारों को तय करना है कि ‘एफ़सीसी को बनाया भी जाए या नहीं और यदि बनाया जाए, तो उस पर आने वाली लागत को सदस्य देशों के बीच कैसे बांटा जाए. अगर एफसीसी पर अंतिम फैसला 2020 में ले लिया जाता है तो इसके निर्माणकार्य का पहला चरण 2030 वाले दशक के अंत तक पूरा होने का अनुमान है. पहले चरण पर नौ अरब यूरो के बराबर ख़र्च आयेगा. दूसरा चरण 2055 तक पूरा हो सकता है और उस पर 15 अरब यूरो की लागत आएगी.

हरी झंडी मिलने पर नया त्वरक ‘एफ़सीसी’ भी लगभग उसी जगह बनेगा जहां इस समय 27 किलोमीटर लंबी सुरंग वाला ‘एलएचसी’ है. लेकिन नए त्वरक की सुरंग का व्यास कहीं अधिक होने से उसका एक हिस्सा जेनेवा झील के नीचे होगा. नए त्वरक की अभिकल्पना-टीम के प्रमुख मिशाएल बेनेडिक्ट का कहना है कि 27 किलोमीटर लंबाई वाला वर्तमान त्वरक अभी 20 साल और काम करता रह सकता है. बाद में उसे नए त्वरक के प्रारंभिक गतिवर्धक के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है. इस समय उसे रखरखाव संबंधी कार्यों की वजह से दो वर्षों के लिए बंद कर दिया गया है.

‘हाईलुमी’ परियोजना

करीब डेढ़ हफ्ते पहले मीडिया के साथ चर्चा में बेनेडिक्ट ने यह भी जानकारी दी है कि ‘एलएचसी’ को उच्च कार्यक्षमता वाली ‘हाईलुमी’ (HiLumi /High Luminosity) नाम की एक नई परियोजना के लिए अधिक शक्तिशाली चुम्बकों से भी लैस किया जाएगा. तब उसमें प्रोटॉन कणों की इस समय की प्रति सेकंड एक अरब के बदले पांच अरब टक्करें कराई जा सकेंगी. यह सारा काम 2025 तक पूरा होने की संभावना है. 15 वर्षों के इस्तेमाल के बाद ‘हाईलुमी’ की जगह एक ऐसा प्रोटॉन-त्वरक ले सकता है जो प्रोटॉन कणों के बीच टकराव की ऊर्जा और टक्करों के संख्या की दृष्टि से दस गुना अधिक क्षमतावान होगा

ब्रह्मांड की उत्पत्ति के प्रथम नैनो सेकंडों वाली दशा को समझने के लिए प्रस्तावित नए त्वरक ‘एफ़सीसी’ के बारे में मिशाएल बेनेडिक्ट का कहना है कि आरंभ में उसकी रिंग में इलेक्ट्रॉन और उसके प्रतिपदार्थरूपी (एन्टीमैटर) कण पॉज़िट्रॉन के बीच टक्कर कराई जाएगी. इस प्रयोग के समय भावी ‘एफ़सीसी’ की कार्यक्षमता, वर्तमान ‘एलएचसी’ की अपेक्षा एक लाख गुना अधिक होगी.

वहीं बाद में जब प्रोटॉन कणों या अन्य कणों के साथ प्रयोग शुरू होंगे तो इन कणों को अत्यंत शक्तिशाली कई हज़ार चुम्बकों की सहायता से त्वरण-रिंग के भीतर बेहद सटीक ढंग से अभिकेंद्रित (फ़ोकस) किया जाएगा. किसी प्रकाश-किरण जैसी ही गति और बारीक़ी वाली कण-रेखाएं भिड़ंत बिंदु (फोकल प्वाइंट) पर एक-दूसरे से टकराने से य़दि चूकती भी हैं तो यह चूक आठ माइक्रोमीटर (1000 माइक्रोमीटर = एक मिलीमीटर) से भी कम अंतर से एक-दूसरे की अगल-बगल से उनके निकल जाने से होनी चाहिये, इससे अधिक अंतर से नहीं. वैज्ञानिकों को आशा है कि इन प्रयोगों से लगभग 14 अरब वर्ष पूर्व के उस क्षण को जाना जा सकता है जब ब्रह्मांड के जन्मदाता महाविस्फोट को हुए कुछेक नैनो सेकंड ही बीते थे.

माना जाता है कि असीम और अपरिमित लगता हमारा रहस्यमय ब्रह्मांड वास्तव में अकल्पनीय घनीभूत ऊर्जा के एक – न कुछ के बराबर - अतिसूक्ष्म बिंदु में विस्फोट होने से बनना और फैलना शुरू हुआ था. कभी कुछ नहीं रहे होने से हुई सृष्टि की उत्पत्ति सहित आज का सब कुछ होने तक की ब्रह्मांडीय यात्रा एक ऐसी गुत्थी है, जिसे वैज्ञानिक समझते हैं कि वे ‘एफ़सीसी’ की सहायता से सुलझा लेंगे.

जर्मनी का ‘फ़ेयर’ संयंत्र यानी प्रयोगशाला में ब्रह्मांड

स्विट्ज़रलैंड के उत्तरी पड़ोसी जर्मनी के डार्मश्टाट में भी लगभग दो अरब यूरो की लागत से एक ऐसा मूलकण त्वरक बन रहा है जो अपने ढंग की विश्व की एक सबसे बड़ी शोध परियोजना है. इसका नाम है ‘फ़ेयर’ (एफ़एआईआर/फ़ैसिलिटी फ़ॉर एन्टीप्रोटॉन एंड आयन रीसर्च). यदि वह योजनानुसार 2025 तक बन कर तैयार हो गया तो वहां भी पदार्थ (अणु-परमाणु) की आंतरिक संरचना तथा ब्रह्मांड की उत्पत्ति और उसकी विकासयात्रा का अध्ययन किया जाएगा. जर्मनी के अतिरिक्त भारत, रूस, चीन सहित कुल 14 देश ‘फ़ेयर’ परियोजना में शामिल हैं. वे 2017 से चल रहे उसके निर्माणकार्य के पूरा होने की अधीरता से प्रतीक्षा कर रहे हैं. इसके निर्माणकार्य का 75 प्रतिशत ख़र्च जर्मनी उठा रहा है.

25 हेक्टर भूमि पर बन रहे ‘फ़ेयर’ की मुख्य विशेषता होगी 17 मीटर की गहराई पर बन रही 1.1 किलोमीटर लंबी उसकी दोहरी त्वरण रिंग ‘हैवी आयन सिंक्रोट्रॉन.’ इस रिंग में हाइड्रोजन जैसे हल्के तत्वों से लेकर यूरेनियम जैसे अति भारी तत्वों के विद्युत-आवेशधारी आयनों को त्वरित करते हुए लगभग प्रकाश जितनी गति (तीन लाख किलोमीटर प्रति सेकंड) पर दौड़ाया जाएगा. उन्हें आपस में या किसी फ़ोलियो अथवा जैवकोशिका से टकराया जायेगा. यहां प्रतिप्रोटॉन (एन्टीप्रोटॉन) और रासायनिक तत्वों के असाधारण समस्थानिक (आइसोटोप) भी पैदा किए जा सकेंगे. यहां प्रतिपदार्थ (एन्टीमैटर), प्लाज़्मा भौतिकी, सामग्री विज्ञान, जीवविज्ञान और जैवऔषधियों (बायोमेडिसिन) से संबंधित प्रयोग भी होंगे.

‘फ़ेयर’ की मुख्य त्वरण रिंग के अतिरिक्त अलग-अलग प्रयोगों के लिए कुछ अन्य रिंगों का भी निर्माण किया जाएगा. प्रयोगों के दौरान पैदा होने वाले रेडियोधर्मी विकिरण से बचाव के लिए प्रयोगशालाओं वाले भवनों की दीवारें आठ-आठ मीटर तक मोटे सीमेंट-कंक्रीट की बनी होंगी. ‘फ़ेयर’ के एक प्रवक्ता इंगो पेटर का कहना है, ‘यहां पदार्थ की ऐसी अवस्थाएं पैदा की जा सकेंगी जो ब्रह्मांड में तारों के सुपरनोवा विस्फोटों में या ग्रहों के गर्भ में ही बन पाती हैं. इसीलिए फ़ेयर को ‘प्रयोगशाला में ब्रह्मांड’ भी कहा जा रहा है.’ इसके बन जाने पर जर्मनी और भारत सहित 50 देशों के 3000 वैज्ञानिक यहां अपने शोधकार्य कर सकेंगे और बता सकेंगे की ब्रहमांड क्या सचमुच शून्य से ही उत्पन्न हुआ था!