लेखक: केवी विजयेंद्र प्रसाद (पटकथा), प्रसून जोशी (संवाद)

निर्देशक: कृष, कंगना रनोट

कलाकार: कंगना रनोट, अंकिता लोखंडे, डैनी डेंग्जोप्पा, अतुल कुलकर्णी, मोहम्मद जीशान अय्यूब

रेटिंग: 2.5/5

‘मणिकर्णिका - द क्वीन ऑफ झांसी’ की रिलीज से कुछ दिन पहले कंगना रनोट ने फिल्म के एक गाने को लेकर करणी सेना की आपत्ति पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था, ‘मैं राजपूत हूं... उन्हें (करणी सेना) खत्म कर दूंगी.’ उनके इस तेवर ने रानी लक्ष्मीबाई के मशहूर उद्घोष ‘मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी’ की बखूबी याद दिलाई थी. हालांकि बाद में करणी सेना ने अपनी आपत्ति वापस ले ली लेकिन कंगना को इस बयान के लिए माफी मांगने को कहा. इस पर कंगना का जवाब आया कि करणी सेना को अपना ‘ईगो कार्ड’ उनके साथ नहीं खेलना चाहिए और वे किसी बात के लिए माफी नहीं मांगेंगी. ‘मणिकर्णिका - द क्वीन ऑफ झांसी’ रिलीज होने के ठीक एक दिन पहले दिया गया कंगना रनोट का यह बयान, ये बताने के लिए काफी है कि क्यों बॉलीवुड में केवल उन्हें ही ‘झांसी की रानी’ का खिताब दिया जा सकता है.

‘मणिकर्णिका’ पर आएं तो इस फिल्म के कण-कण में कंगना हैं. इसे देखते हुए कम ही मौके ऐसे आते हैं जब वे फ्रेम में नहीं होतीं और जैसे ही आपका ध्यान इस पर जाता है, वे ओज से भरा कोई संवाद बोलती हुई दोबारा नजर आने लगती हैं. फिल्म की शुरुआत में गुड़िया सी खूबसूरत और चंचल दिख रहीं कंगना मध्यांतर के पहले गरिमामय महारानी का अवतार बखूबी लेती हैं. यहां पर उस दृश्य का खासतौर पर जिक्र किया जा सकता है जिसमें लक्ष्मीबाई, अपने पति गंगाधर राव की मृत्यु के बाद विधवा-वेश अपनाने और बनारस जाने से इंकार कर, सीधे झांसी के राजसिंहासन पर जा बैठती हैं. इस पूरे सीक्वेंस में कंगना का अभिनय शरीर में झुरझुरी पैदा करने वाला है.

लक्ष्मीबाई जैसे किरदारों या उन्हें निभाने वाली नायिकाओं से देवी दुर्गा जैसा प्रभाव पैदा करने की उम्मीद की जाती है. इन पैमानों पर तौलें तो कंगना रनोट का छरहरा शरीर, अपेक्षाकृत छोटी आंखें और उनकी पतली आवाज उन्हें इसके लिए मिसफिट बनाती हैं. लेकिन लक्ष्मीबाई के किरदार की वास्तविक विशेषताओं पर जाएं तो महज 29 साल की उम्र में लड़ते हुए मौत को गले लगानी वाली उन्नीसवीं सदी की एक युवती पर ये खासियतें खूब फबती हैं. हालांकि युद्धघोष करते हुए कई बार कंगना की आवाज उनका पूरा-पूरा साथ नहीं देती. लेकिन जरा ठहरकर बोले गए संवादों में वे जरूरत भर का प्रभाव पैदा कर जाती हैं.

‘मणिकर्णिका’ जैसी बेहद जानी-पहचानी कहानियों के साथ अक्सर यह मान लिया जाता है कि इसके सारे किरदारों और उनकी खासियतों से लोग पहले से वाकिफ होंगे. ऐसे में मुख्य किरदार के अलावा बाकी किरदारों को स्थापित करने की जरूरत नहीं समझी जाती. इसे ‘मणिकर्णिका’ की सबसे बड़ी खामी कहा जा सकता है. तात्या टोपे, सदाशिव राव, काशी बाई और झलकारी बाई जैसे महत्वपूर्ण किरदारों को फिल्म सिर्फ छूकर गुजरती है. यहां तक कि अगर अतुल कुलकर्णी, तात्या टोपे और अंकिता लोखंडे, झलकारी बाई नहीं बनी होतीं तो शायद ही कोई इन किरदारों को नोटिस करता, जैसे काशीबाई या सुंदर-मुंदर के किरदारों को नहीं कर पाता.

इसके अलावा लोखंडे से एक आइटम सॉन्ग सरीखा डांस करवाया जाना भी ऐतिहासिक किरदार पर बनी एक फिल्म में टाट के पैबंद जैसा अनुभव ही करवाता है. कुल मिलाकर फिल्म अतुल कुलकर्णी, जीशान अय्यूब, डैनी डैंग्जोप्पा और अंकिता लोखंडे जैसे बेहद प्रतिभाशाली कलाकारों को बुरी तरह जाया करती है.

बाद बाकी, इतिहास से जमकर की गई छेड़छाड़ तो है ही. लेकिन इसमें भी कुछ चीजें ऐसी शामिल हैं जो बुरी तरह अखरती हैं. उदाहरण के लिए - गंगाधर राव और लक्ष्मीबाई की अति रोमैंटिक केमिस्ट्री, ग्वालियर के किले पर नाटकीय कब्जा और महारानी के शहीद होने का तरीका. हालांकि केवी विजयेंद्र प्रसाद की लिखी इस पटकथा में अंग्रेजों और छोटी-छोटी रियासतों के संबंध, युद्ध के तरीके और राजदरबार की कार्यवाही जैसी चीजें समझ में आने वाले तरीके से दिखाई-बताई गई हैं, हालांकि प्रसून जोशी के संवाद इन्हें जरूरी ऊंचाई नहीं दे पाते. जनमानस की कल्पनाओं में हमेशा रहने वाले लक्ष्मीबाई से जुड़े कुछ दृश्य देखने में बहुत प्रभावी होते हुए भी संवादों के छिछलेपन के चलते अखर जाते हैं. यहां तक कि जोशी ‘मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी’ जैसी अमर पंक्ति को भी सही तरह से इस्तेमाल नहीं कर पाए.

इसके अलावा संवादों में भाषा-संस्कृति बचाने पर जोर दिया जाना, जरूरत से ज्यादा हर-हर महादेव के नारे, ‘बेटी पढ़ाओ...’ से प्रेरित संवाद, सिंधिया घराने से रानी की बातचीत जैसी कई और बातें आशंका पैदा करती हैं कि प्रसून जोशी ने पार्टी विशेष के प्रति अपने झुकाव के चलते ऐसा किया है. इस फिल्म पर भले ही सीधे-सीधे प्रोपेगेंडा सेट करने का आरोप न लगाया जा सके, लेकिन यह तो कहा ही जा सकता है कि उन्होंने कंगना के कंधे पर बंदूक धर कर एक वर्ग विशेष को खुश करने वाला निशाना लगाने की कोशिश की है. खरे-खरे शब्दों में कहा जाए तो ‘मणिकर्णिका’ अगर बतौर अभिनेत्री कंगना रनोट का कद कई गुना बढ़ा देती है तो बतौर (संवाद) लेखक प्रसून जोशी का कद उतना ही छोटा भी कर देती है. हां, बतौर गीतकार वे अब भी कमाल हैं जिसकी मिसाल ‘भारत ये रहना चाहिए’ गीत है.

इस फिल्म में इस्तेमाल किए गए बढ़िया वीएफएक्स इफेक्ट, जुबान पर ठहरने और मन में बजते रह जाने वाले गीत और बेहतरीन लोकेशन्स तारीफ के लायक हैं. हिंदी के साथ तमिल और तेलुगु में भी बनी इस फिल्म का एक बड़ा हिस्सा तेलुगु निर्देशक राधाकृष्ण जगरलामुड़ी (कृष) ने और बाकी कंगना रनोट ने निर्देशित किया है. इसलिए निर्देशन की खामियों का ठीकरा किसके सिर फोड़ा जाए, यह कहना मुश्किल है. लेकिन फिल्म से जुड़ी चर्चाओं में अक्सर इस बात का जिक्र रहा है कि जरूरी एक्शन दृश्यों को कंगना रनोट ने दोबारा निर्देशित किया है. सच्चाई का पता नहीं लेकिन ये दृश्य हैं कमाल के. तलवारबाजी, घुड़सवारी और युद्ध के हिंसक दृश्यों में कंगना का अभिनय जहां अप्रतिम है, वहीं निर्देशन भी बेहतरीन कहा जा सकता है.

इस सबके बावजूद ‘मणिकर्णिका’ में वह चीज गैरमौजूद नज़र आती है, जिसे फिल्म की आत्मा कहा जा सके. अगर यह फिल्म किसी भी वजह से देखी जानी चाहिए तो वह केवल इसका रानी लक्ष्मीबाई पर आधारित होना और उनकी भूमिका में कंगना रनोट का जानदार अभिनय है. जैसे रानी लक्ष्मीबाई ने जो किया वह केवल वे ही कर सकती थीं, उसी तरह कंगना ने जो किया वह भी केवल उन्हीं के बस में था.