निर्देशक : अभिजीत पानसे

लेखक : संजय राउत, अभिजीत पानसे

कलाकार : नवाजुद्दीन सिद्दीकी, अमृता राव

रेटिंग : 1/5

किसी हिम्मती वक्त में अगर बाल ठाकरे पर फिल्म बनती तो वरिष्ठ पत्रकार सुजाता आनंदन की किताब उसके लिए सही प्रेरणास्रोत साबित होती. सुजाता आनंदन ने लंबे अरसे तक शिवसेना बीट की रिपोर्टिंग की है और अपने अनुभवों को आधार बनाकर 2014 में ‘हिंदू हृदय सम्राट - हाउ द शिवसेना चेंज्ड मुंबई फॉरएवर’ नामक उम्दा किताब लिखी है. इसमें मराठी मानुष की आड़ लेकर नफरत की राजनीति करने वाले बाल ठाकरे के हर पहलू को टटोला गया है और बेहद तफ्सील से वक्त के साथ बदलती उनकी राजनीतिक मौकापरस्ती पर बात की गई है.

यह किताब आपको बताएगी कि बाल ठाकरे का परिवार मध्य प्रदेश से ताल्लुक रखता था और उनके दादा काम की ही तलाश में महाराष्ट्र आए थे. बाल ठाकरे की नफरत की राजनीति भले ही दक्षिण भारतीयों, उत्तर भारतीयों, बिहारियों वगैरह को महाराष्ट्र में बाहरी बताकर अपमानित करती रही, लेकिन वे स्वयं भी इन प्रवासियों की तरह एक बाहरी थे. किताब दावा करती है कि उनके मराठी भाषी पिता ने अपना सरनेम ठाकरे रखा क्योंकि वे वैनिटी फेयर जैसे उपन्यास लिखने वाले ब्रिटिश लेखक विलियम मेकपीस थैकरे (Thackeray को मराठी में ठाकरे कर लिया गया था) के मुरीद थे. भाजपा की हमराह होने से पहले कई-कई सालों तक शिवसेना को सबसे बड़ा सपोर्ट कांग्रेस से मिलता था, और इसी पार्टी ने साठ के दशक में मुंबई मिल कर्मचारियों की वामपंथी ट्रेड यूनियनों की कमर तोड़ने के लिए ठाकरे का जमकर उपयोग किया था.

किताब इस बात पर भी जोर देती है कि बाल ठाकरे को जेल जाने से बहुत डर लगता था. दुनिया के सामने जो निडरता उनमें नजर आती थी, और शेर से जिस तरह उनकी तुलना शिवसेना करती थी, वो मेहनत से गढ़ी गई एक छवि थी. डर की ही वजह से उन्होंने इंदिरा गांधी की इमरजेंसी का सपोर्ट किया था और बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद दिए गए अपने इस बयान से पलट गए थे कि शिव सैनिकों ने मस्जिद गिराई है. मराठी मानुष की अस्मिता की रक्षा के बहाने बाल ठाकरे ने तकरीबन हर समुदाय को अपना दुश्मन माना था - क्या मुस्लिम, क्या बिहारी, क्या गुजराती, क्या उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय, और क्या ही दलित - और किताब इन समुदायों से उनके फ्रिक्शन पर अध्याय दर अध्याय सिलसिलेवार बात करती है.

किताब की सबसे उल्लेखनीय बात है, कि मौजूदा दौर के मराठी मानुष की सामाजिक स्थिति की पड़ताल कर वह इस नतीजे पर पहुंचती है कि बाल ठाकरे के आंदोलन और शिवसेना की अति की आक्रामकता ने मराठियों की स्थिति को समाज में कोई खास बेहतर नहीं किया.

संजय राउत निर्मित ‘ठाकरे’ जाहिर तौर पर यह सब नहीं दिखाती. यह विशुद्ध प्रोपेगेंडा फिल्म है जो बाल ठाकरे का अविरल स्तुतिगान करती है और केवल शिव सेना की विचारधारा में यकीन करने वालों को ही रास आएगी. शिव सेना सांसद संजय राउत इस पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ के भी संपादक हैं और उनके बारे में सर्वविदित है कि जब बाल ठाकरे ने ‘सामना’ के रोजमर्रा वाले कामों में दिलचस्पी लेना कम कर दिया था, तो वे ही बाल ठाकरे के नाम से इसमें संपादकीय लिखा करते थे. पाठक उन्हें बाल ठाकरे द्वारा लिखा हुआ लेख समझकर पढ़ते थे और पार्टी के लोग कहा करते थे कि बाल ठाकरे के मन की बात सबसे बेहतर तरीके से संजय राउत ही समझते हैं! आज संजय राउत ने ठीक उसी तर्ज पर ठीक उसी तरह बाल ठाकरे को पेश करके ‘ठाकरे’ बनाई है, जैसी कि बायोपिक खुद दिवगंत शिव सेना सुप्रीमो अपने लिए चाहते रहे होंगे.

‘सामना’ की तरह ही ‘ठाकरे’ में बाल ठाकरे के हर विरोधी की आलोचना की गई है और उसे शिव सेना प्रमुख से कमतर दिखाया गया है. बाल ठाकरे के कई मोनोलॉग फिल्म में हैं जो कि ‘सामना’ में लिखे उनके संपादकीय की तरह ही विवादास्पद बातें करते हैं. लोकतंत्र में विश्वास न रखने से लेकर हिटलर जैसा होने की उनकी ख्वाहिश तक को फिल्म में जोर-शोर से रेखांकित किया गया है. दक्षिण भारतीयों को निशाना बनाने के लिए दिए उनके नारे ‘बजाओ पुंगी, हटाओ लुंगी’ से लेकर एंटी-मुस्लिम बातें भी खूब कहीं गई हैं (यह समझने की कोशिश में सर चकरा जाता है कि मुस्लिम अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने ऐसे संवाद बोलना क्यों स्वीकारा होगा).

फिल्म में कहीं भी बाल ठाकरे की छवि को बदलकर उन्हें नरम नेता की तरह पेश करने की कोशिश नहीं हुई है - जैसा कि दिवगंत नेताओं की बायोपिक में किया जाता है ताकि वे ज्यादा से ज्यादा लोगों के दिलों को छू सकें – बल्कि फिल्म अपने कट्टरवाद को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नजर आती है. शिव सैनिकों द्वारा हिंसा किए जाने वाले दृश्यों को बार-बार महिमामंडित किया जाता है और उनके द्वारा बाल ठाकरे के विरोधियों की हत्या तक करने को आराम से दिखा दिया जाता है. यह प्रोपेगेंडा फिल्म आखिर तक अपने सुप्रीमो और उनके सैनिकों द्वारा बरते गए वायलेंस को जस्टीफाई करती है और उसे किसी तरह की कोई हिचक इस पार्टी के हिंसक इतिहास को परदे पर चित्रित करने में नहीं होती.

फिल्म खुद को लिबरल और मुसलमानों का दोस्त दिखाने की भी कोशिश करती है! आप मानेंगे नहीं, लेकिन यह सच है कि जब फिल्म में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मुंबई में दंगे भड़के, तो एक मुसलमान परिवार आसरा मांगने ‘मातोश्री’आया और बाल ठाकरे ने अपने घर में उसे नमाज अदा करने तक की जगह दी. जब यह हृदय की विशालता दिखाने वाला सीन फिल्म में आता है तो आपको सुजाता आनंदन जैसे लेखकों की किताबों की अहमियत ज्यादा समझ आती है. क्योंकि जिन दर्शकों को इतिहास नहीं पता, वे न जाने इस प्रोपेगेंडा फिल्म को देखकर इतिहास का क्या ही निचोड़ निकालेंगे.

सुजाता आनंदन किताब में बताती हैं कि पहले तो बाल ठाकरे ने बाबरी विध्वंस (1992) के तुरंत बाद यह गैरजिम्मेदाराना बयान दिया कि उनके शिव सैनिकों ने मस्जिद गिराई है. यह खबर फैलते ही कि मस्जिद गिराने में बाल ठाकरे का हाथ है, मुंबई में दंगे और तेजी से भड़क गए जो कि कई दिनों बाद ही शांत हो पाए. बाद में सच सामने आया कि बाबरी मस्जिद गिराने में शिव सैनिकों का हाथ नहीं था क्योंकि विध्वंस से पहले ही बाल ठाकरे ने अपने सैनिकों को वापस मुंबई बुला लिया था. वह भी सिर्फ इसलिए कि अयोध्या में सारे अच्छे होटल और रुकने की बाकी जगहें भाजपा और विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने घेर रखी थीं और शिव सैनिकों को ठहरने की उत्तम व्यवस्था नहीं मिली थी! भाजपा द्वारा शिव सेना को गंभीरता से नहीं लेने पर ठाकरे नाराज हो गए और उत्तम व्यवस्था न होने की वजह से अपने सैनिकों को तुरंत मुंबई बुला लिया.

और प्रोपेगेंडा का स्तर देखिए! ‘ठाकरे’ फिल्म की शुरुआत और अंत बाबरी मस्जिद विध्वंस केस में हुई उस अदालती सुनवाई से होता है जिसमें बाल ठाकरे कठघरे में खड़े होकर मारक जवाब देते हैं और हिंदुत्व, मराठी मानुष की अस्मिता, हथियार उठाए जाने की जरूरत तथा मस्जिद गिराए जाने को बढ़-चढ़कर जस्टीफाई करते हैं.

जबकि किताब बताती है कि चूंकि बाल ठाकरे को जेल जाने से हमेशा डर लगता था – मोरारजी देसाई की वजह से साठ-सत्तर के दशक में वे तीन महीने के लिए जेल जा चुके थे – इसलिए कोर्ट का समन आते ही उन्होंने नया बयान जारी कर दिया, जिसके अनुसार मस्जिद शिव सैनिकों ने नहीं, भाजपा के कार सेवकों ने ही तोड़ी थी. और वह तो भाजपा यह जिम्मेदारी लेने की हिम्मत नहीं दिखा पा रही थी, इसलिए उन्होंने आगे बढ़कर जिम्मेदारी स्वीकार की! जाहिर तौर पर ‘ठाकरे’ हमें यह सच नहीं दिखाती, और कटघरे में खड़े बाल ठाकरे को अपनी विचारधारा का पुरजोर बखान करने वाले महानायक की तरह प्रस्तुत कर खत्म होती है.

नवाजुद्दीन सिद्दीकी का अभिनय एक बार फिर उम्दा है. उन्होंने परदे पर बाल ठाकरे को यकीनन जिंदा कर दिया है, भले ही वृत्तचित्र रूपी इस फिल्म में वह रोचकता नहीं है जो दर्शकों को बांध कर रख पाए. नवाज की आवाज बाल ठाकरे से नहीं मिलती, न ही चेहरा उन जितना लंबा है, लेकिन वे ऐसे अनोखे अभिनेता हैं जो किसी भी रियल लाइफ शख्सियत के रूप में ढलते वक्त खुद को ढेर सारा उस किरदार में बचाए रखते हैं. ऐसी नकल कभी नहीं करते कि इमिटेशन लगे, बल्कि मैनरिज्म सीखने के बाद किरदार की रूह पकड़ते हैं, और ऊपर शरीर अपना सिलते हैं.

बस, कभी-कभी यह भूल जाते हैं कि नफरत बोने-उगाने वाली प्रोपेगेंडा फिल्मों और ‘मंटो’ में अंतर होता है! उन्हें भी सुजाता आनंदन की किताब पढ़ लेनी चाहिए थी. आपको भी.