ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरेसा मे को यूरोपीय संघ के साथ ब्रेक्जिट मसौदा तैयार करने में ढाई साल का समय लगा, लेकिन दो हफ्ते पहले इसे वहां की संसद ने एक झटके में बड़े अंतर से खारिज कर दिया है. सांसदों को इस मसौदे में कही गई कई बातों पर भारी आपत्ति है. इसके तीन दिन बाद प्रधानमंत्री मे ने संसद को ब्रेक्जिट यानी ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने को लेकर अपना ‘प्लान बी’ बताया. ‘प्लान बी’ के तहत वे ब्रेक्जिट मसौदे में शामिल आपत्ति वाले मसलों को सुलझाने के लिए यूरोपीय संघ (ईयू) से बातचीत करेंगी. साथ ही वे आपत्ति जताने वाले अपने और विपक्षी लेबर पार्टी के सांसदों को मनाने के लिए उनके साथ बैठकें भी करेंगी.

ब्रेक्जिट मामले पर नजर रख रहे जानकारों का मानना है कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री ‘प्लान बी’ के तहत वही सब करने जा रही हैं, जो पिछले दिनों वे कर चुकी हैं. टेरेसा मे ‘प्लान बी’ के तहत ब्रेक्जिट मसौदे के सबसे विवादित पक्ष ‘बैकस्टॉप’ पर यूरोपीय संघ को मनाने की कोशिश करेंगी. लेकिन, ‘बैकस्टॉप’ के मुद्दे पर तो वे बीते दिसंबर में ईयू को मनाने का पूरा प्रयास कर चुकी हैं. ईयू साफ़ तौर पर कह चुका है कि यह ब्रेक्जिट मसौदा आखिरी है और अब इसमें कोई बदलाव नहीं होगा.

विशेषज्ञों के मुताबिक अब ब्रिटेन को ईयू से कोई रियायत मिलने की उम्मीद न के बराबर ही है जिस वजह से ‘नो-डील ब्रेक्जिट’ की संभावना काफी प्रबल हो गई है.

‘नो-डील ब्रेक्जिट’ क्या है?

29 मार्च, 2019 को ब्रिटेन को ईयू से अलग होना है. अगर इस तारीख़ से पहले तक ब्रेक्जिट मसौदा ब्रिटिश संसद में पास नहीं होता तो भी ब्रिटेन ईयू से अलग हो जाएगा. यह स्थिति ही ‘नो-डील’ ब्रेक्जिट कहलाएगी. ‘नो-डील’ ब्रेक्जिट की स्थिति में ब्रिटेन बिना किसी समझौते के एक झटके में ईयू से अलग होगा जिस वजह से दोनों के भविष्य के संबंधों को लेकर कुछ भी तय नहीं हो सकेगा. जानकारों की मानें तो यह स्थिति ब्रिटेन के लिए किसी बड़ी आपदा से कम नहीं होगी.

ब्रिटिश संसद में ब्रेक्जिट पर बहस के दौरान प्रधानमंत्री टेरेसा मे | फोटो : एएफपी
ब्रिटिश संसद में ब्रेक्जिट पर बहस के दौरान प्रधानमंत्री टेरेसा मे | फोटो : एएफपी

‘नो-डील ब्रेक्जिट’ के जरिये अलग होने पर ब्रिटेन ईयू की ‘कस्टम यूनियन’ और ‘एकल बाजार प्रणाली’ से भी बाहर हो जाएगा. इससे दोनों के बीच उत्पाद, पूंजी, लोग और सेवाओं के मुक्त आवागमन पर रोक लग जाएगी. साथ ही इसके बाद ब्रिटेन को व्यापार के लिए विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों का पालन करना होगा. इन नियमों के तहत ईयू से ब्रिटेन आने वाले उत्पादों पर शुल्क लगना शुरू हो जाएगा जिससे ब्रिटेन के बाजार में कीमतों में भारी इजाफा होगा. हालांकि, कुछ ऐसा ही हाल ईयू के उन सदस्य देशों का भी होगा जो बड़ी मात्रा में ब्रिटेन से माल आयात करते हैं.

ब्रिटिश मीडिया के मुताबिक इस समय ब्रिटेन में 30 फीसदी से ज्यादा ताजा खाना यानी कच्चा मांस, बीफ और सब्जियां ईयू सदस्य देशों से आते हैं. लेकिन नो-डील ब्रेक्जिट के बाद सीमा पर गहन चेकिंग शुरू होगी और ट्रकों की लंबी-लंबी कतारें लगने की वजह से खाने का यह सामना ट्रकों में सड़ने लगेगा. ऐसा ही कुछ हाल आयरलैंड गणराज्य जैसे ईयू सदस्य देशों का भी होगा जो रोजमर्रा की जरूरतों के लिए काफी हद तक ब्रिटेन पर निर्भर हैं.

इसके अलावा ब्रिटेन में निर्मित कई उत्पादों को यूरोपीय संघ द्वारा नए प्राधिकरण और प्रमाणन की बात कहकर खारिज भी किया जा सकता है. इन आशंकाओं के चलते अधिकांश कंपनियां ‘नो-डील ब्रेक्जिट’ की स्थिति में ब्रिटेन छोड़ने का मन बना चुकी हैं. एक सर्वे के मुताबिक हर पांच में से एक कंपनी ने अपना सामान समेटना भी शुरू कर दिया है और अधिकांश कंपनियों ने कुछ महीनों के लिए अपने कई कारखाने बंद करने की भी घोषणा कर दी है. बताया जाता है कि अगर ऐसा हुआ तो इसका सबसे बड़ा खामियाजा ब्रिटेन के नागरिकों को भुगतना पड़ेगा. एक सर्वेक्षण के मुताबिक इससे सात लाख से ज्यादा लोगों को बेरोजगारी की मार झेलनी पड़ेगी.

ब्रिटेन में प्रवासियों का आना एक बड़ा मुद्दा है और यह वह वजह भी है जिसके चलते जनता ने ब्रेक्जिट के विकल्प को चुना था. ऐसे में जाहिर है कि ईयू से तलाक होते ही ब्रिटेन आव्रजन के नियम सख्त करेगा और इसके बदले में ईयू सदस्य देश भी अपने यहां आने वाले ब्रिटेन के नागरिकों के साथ सख्ती बरतेंगे. ब्रिटेन के लोगों को ईयू सदस्य देशों में जाने के लिए नए पासपोर्ट की जरूरत होगी, साथ ही वहां गाडी चलाने के लिए भी नया ड्राइविंग लाइसेंस बनवाना होगा. यूरोपीय संघ के देशों में इस समय 13 लाख ब्रिटिश और ब्रिटेन में 37 लाख यूरोपीय नागरिक हैं, ऐसे में यह परेशानी कितनी बड़ी होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है.

इसके अलावा एक अहम मुद्दा ब्रिटेन के राज्य उत्तरी आयरलैंड और पड़ोसी देश आयरलैंड गणराज्य की सीमा का होगा. जानकारों की मानें तो ‘नो-डील ब्रेक्जिट’ के बाद न चाहते हुए भी दोनों देशों को कस्टम चेकिंग और तस्करी वगैरह रोकने के लिए अपने बीच में सीमा बनानी पड़ेगी. ब्रिटिश मीडिया की मानें तो इससे उन अलगाववादियों को फिर हवा मिल सकती है, जो उत्तरी आयरलैंड को ब्रिटेन से अलग कर आयरलैंड गणराज्य में विलय करवाने की मंशा पाले हुए हैं. जबकि कुछ साल पहले ही शांति स्थापित करने और अलगाववाद की स्थिति को खत्म करने के लिए ब्रिटेन और आयरलैंड गणराज्य ने अपने बीच सीमा न बनाने का निर्णय लिया था.