सुधीर कुमार स्वतंत्र पत्रकार हैं और उत्तराखंड के हल्द्वानी में रहते हैं.


यह 1970 के दशक की शुरुआत की बात है. मुझे अच्छी शिक्षा दिलवाने के लिए गांव से हल्द्वानी भेज दिया गया था. मैं शुरुआत में एक चालनुमा मोहल्ले में अपने पिता और चाचाओं के साथ रहा. बाद में मां भी हल्द्वानी आ गईं. फिर हम एक कथित ‘भद्रलोक’ में किराए का मकान ढूंढ़कर वहीं रहने लगे. उस वक़्त इस कस्बे में किराए के लिए बहुत कम ही घर हुआ करते थे और उन्हें किराये पर चढ़ाते वक़्त जाति-धर्म का बहुत ध्यान रखा जाता था.

फिर भी, उत्तराखंड की शिल्पकार उपजाति से होने के बावजूद हमें किसी दयालु मकान मालिक ने सहर्ष मकान दे दिया. सब कुछ ठीक से चल रहा था कि इस बीच दूसरे किरायेदारों को हमारे परिवार से विभिन्न किस्म की दिक्कतें होने लगीं. हालांकि बड़ा होने पर ही मुझे यह समझ आया कि वे दिक्कतें सामाजिक भेदभाव की उपज थीं.

बहरहाल, बाबूजी डीजल मैकेनिक थे और कस्बे के अधिकांश ट्रांसपोर्टर सिख, सो जल्द ही हमें सिखों के एक मोहल्ले में घर मिल गया. सिखों के इस बड़े से मोहल्ले में हमारा अकेला हिंदू परिवार रहने लगा. यहां हमें हिंदू नहीं बल्कि पहाड़ी कहा जाता था. सामाजिक भेदभाव विहीन इस मोहल्ले में बचपन ख़ुशगवार हो चला.

हमारा यह छोटा-सा घर गुरुद्वारे के बहुत नजदीक था तो वहां के ग्रंथियों और सेवादारों से जल्दी ही मेरी पहचान हो गई. इस दोस्ती की बुनियाद थी क्रिकेट. गुरुद्वारे के परिसर में टीवी नहीं लग सकता था तो वहां रहने वाले क्रिकेट के शौक़ीन ग्रंथी हमारे घर मैच देखने आया करते थे. शायद उन्हें सिख समुदाय के सामने यह भी दिखाना होता था कि वे टीवी नहीं देखा करते.

यहां जल्दी ही मैंने अन्य बच्चों के साथ शौकिया तौर पर गुरमुखी सीखना शुरू कर दी और इसकी लिपि देवनागरी से मिलती-जुलती होने की वजह से उस साल के अपने बैच में अव्वल भी आया. उसके बाद मोहल्ले के बच्चों के साथ नानकमता के कुछ दिनों के टूर पर भी गया. फिर वह एक दिन भी आया जब हिम्मत कर मैंने गुरुद्वारे में कांपते हुए अरदास पढ़ डाली. अरदास के बाद मुझे ईनाम में खासी रकम मिली, जिससे मैं एक सेकेंड-हैंड साइकिल खरीद सका. किसी बच्चे का एक अदद साइकिल का मालिक होना उस दौर में बहुत रुतबे की बात हुआ करती थी.

इसी मौज-बहार में एक दिन मैंने बाबूजी और मां को चिंतित होकर बात करते पाया. मोहल्ले में भी एक रहस्मयी मुर्दा सन्नाटे के बीच अजीबो-गरीब गहमागहमी दिखाई दे रही थी. जल्दी ही मुझे इस बदले हुए माहौल की वजह भी पता लग गई. देश की प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी का उनके सिख अंगरक्षकों ने क़त्ल कर दिया था. समूचा देश दंगों की चपेट में आ गया था और जल्द ही तब उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहे इस पहाड़ी राज्य के तराई वाले शहरी-कस्बाई हिस्से भी इस आग में झुलसने लगे.

खबर आई कि हल्द्वानी शहर का सबसे बड़ा गुरुद्वारा आग के हवाले कर दिया गया है. यह मेरे मोहल्ले से सिर्फ डेढ़ किमी दूर था. शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया. जैसा कि मैंने बताया कि मेरा मोहल्ला सिख ट्रासपोर्टरों का मोहल्ला था तो हर घर का कोई-न-कोई सदस्य ट्रक भी चलाता ही था या उसके साथ चलता था. सभी परिवार ऐसे बेटों के लिए चिंतित थे. जल्द ही ऐसे नौजवानों की घर वापसी भी शुरू हो गई जिनकी दाढ़ी-मूंछ मूंड दी गई थी और बाल क़तर दिए गए थे. या उन्होंने जिन्दा रहने के लिए खुद ही ऐसा कर दिया था और लौटकर बताया कि दंगाइयों ने उनका यह हाल कर दिया है.

मोहल्ले का माहौल जहरीला और दमघोंटू हो गया था. मेरे घर में भी लगातार इस बात पर विचार हो रहा था कि अब क्या किया जाए. बाबूजी को डर था कि इस मोहल्ले का अकेला हिंदू परिवार होने की वजह से हम सिखों की स्वाभाविक प्रतिक्रिया का शिकार हो सकते हैं. भारी मन से बाबूजी ने यह फैसला लिया कि शहर के ही दूसरे छोर पर रहने वाले अपने भाई के घर चले जाएंगे. रातों-रात हम लोगों ने अपना सामान समेट लिया और सुबह का इंतजार करने लगे. मां और बाबूजी तो शायद सोए भी नहीं. रातभर गुरुद्वारे के पहरे में लगे मोहल्ले के नवयुवकों की जरा भी चहलकदमी या उठा-पटक हम लोगों के भीतर एक सिहरन पैदा कर जाती.

सुबह बाबूजी मुख्य सड़क पर ड्यूटी कर रहे पुलिसकर्मियों से बातचीत कर कर्फ्यू के बावजूद इस छोटी सी यात्रा की जुगत बैठा आये. अभी हम सामान लेकर गली में निकले ही थे कि मोहल्ले के एक बुजुर्ग मिले और उन्होंने पूछा कि हम लोग कहां जा रहे हैं. बाबूजी ने बहाना बनाया कि गांव से पिताजी भाई के घर आए हुए हैं सो वहीं जा रहे हैं. उन बुजुर्ग ने असलियत भांपते हुए बाबूजी से कहा कि अगर हमारा परिवार वहां से गया तो उनके मोहल्ले और समुदाय के लिए बेहद शर्मिंदगी की बात होगी.

जल्दी ही इस बातचीत में मोहल्ले के और लोग भी जुट गए और हमें हौसला-भरोसा दिया. मोहल्ले की महिलाएं भी मां को अपने घर के भीतर ले जाकर समझाने लगीं. जाहिर है इनमें बाबूजी के दोस्त और मां की सहेलियां भी थीं. ये रिश्ते कई सालों से यहां रहते हुए बने थे. बाबूजी को मोहल्ले के कई लोगों से घिरा देख मेरा जी किसी अनिष्ट की आशंका से घबराने लगा. मुझे लगा कि उन पर किसी भी समय हमला किया जा सकता है. इस दौरान हम सभी भाई-बहन एक ओर सहमे से खड़े रहे. उनमें मैं ही था जो मामले को थोड़ा-बहुत समझ रहा था बाकि सभी बस आशंकित थे.

आखिरकार भारी क़दमों से बाबूजी लौटकर हमारे पास आए और हम सभी दोबारा घर में दाखिल हो गए. इस दिन के बाद हर रोज मोहल्ले के लोग नियमित तौर पर हमारे घर आने लगे और बातचीत कर ढांढस बंधाने लगे. मुझे खुद भी गुरुद्वारे की सुरक्षा करने के लिए बनाई गई टीमों में ड्यूटी पर लगा दिया गया. हिंदू बहुल मोहल्ले से भी बुजुर्ग लोग सिखों के साथ अपनी एकजुटता दिखाने आने लगे. दंगों की शिकार एक कौम का उस वक़्त का यह व्यवहार मैं बहुत बड़ा होने के बाद समझ पाया. लेकिन उन दिनों ने मुझे जिंदगीभर के लिए सबक दिया कि हर धर्म में कुछ लोग वैमनस्य पैदा करने वाले होते हैं और ज्यादातर सहिष्णु. बचपन के उस दौर ने मुझे इंसानियत का ऐसा सबक दिया जो सैकड़ों ग्रंथों की शिक्षा पर भारी है. उन दंगों के बाद भी हम लगभग 18 साल उसी मोहल्ले में रहे.