साइंस फिक्शन जॉनर के साथ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री कुछ खास न्याय नहीं कर पाई है. ‘मिस्टर इंडिया’ (1987) जैसी कुछ फिल्मों के अलावा मौलिक साइंस फिक्शन फिल्में हमारे यहां कम ही मिलती हैं. जो मिलती हैं वे हॉलीवुड की परले दर्जे की मूर्ख नकल से लेकर अच्छी शक्ल वाली नकल ही ज्यादा होती हैं. बॉलीवुड के इतर हॉलीवुड की खासियत है कि अगर वहां महाकाय बजट वाली वीएफएक्स से लदी-फदी कमर्शियल साइंस फिक्शन फिल्में खूब बनती हैं, तो बेहद कम बजट की इंडी फिल्में भी बढ़-चढ़कर इस जॉनर को एक्सप्लोर करती हैं.

साइंस फिक्शन जॉनर के बारे में अक्सर कहा जाता है कि यह ‘महंगा’ फिल्म जॉनर है, क्योंकि इसमें फिल्म बनाने के लिए विजन के अलावा ढेर सारा धन चाहिए होता है. कल्पनाओं के घोड़े किताब के पन्नों पर दौड़ाना आसान है, लेकिन सिनेमा के परदे पर उन्हें रचना बेहद मुश्किल. वीएफएक्स तकनीक के इस दौर में इसीलिए साइंस फिक्शन फिल्मों का ज्यादातर बजट कम्प्यूटरों पर इन कल्पनाओं को साकार करने में खर्च होता है.

वैसे जब वीएफएक्स तकनीक अपने शुरुआती बाल दौर में थी, तब भी हॉलीवुड अपने अति महत्वाकांक्षी विजन को पूरा करने के रास्ते निकाल लेता था. शुरुआती साइंस फिक्शन फिल्मों के वक्त से ही वह अति के महंगे विहंगम सेट, विशालकाय स्पेसक्राफ्ट, अत्याधुनिक हथियार, विचित्र रोबोट आदि इत्यादि का वास्तविक निर्माण किया करता था. ‘2001 : अ स्पेस ऑडिसी’, ‘स्टार वॉर्स’ और ‘स्टार ट्रैक’ जैसी शुरुआती मशहूर साइंस फिक्शन फिल्में व फ्रेंचाइजी उदाहरण हैं कि पन्नों पर लिखी फंतासी दुनिया को सफलता से परदे पर रचने के लिए 60-70 के दशक का हॉलीवुड तक बिना पैसों की परवाह किए नायाब रास्ते निकालने में जुटा रहता था.

कहने का मतलब है कि हॉलीवुड ने ही साइंस फिक्शन जॉनर को इस कदर विशालकाय बना दिया कि ऐसी फिल्मों का बेहद सीमित बजट में कहानी कहना मुश्किल हो गया. मौजूदा दौर की ‘इंसेप्शन’, ‘इंटरस्टेलर’, ‘अवतार’, ‘मैट्रिक्स’, ‘ग्रेविटी’, ‘द मार्शियन’, नयी वाली ‘स्टार वॉर्स’, ‘स्टार ट्रैक’ तथा ‘ब्लेड रनर’ जैसी विजुअली रिच और सिनेमा के परदे को अलौकिक कर देने वाली विज्ञान फंतासी फिल्मों ने दर्शकों के बीच यह धारणा मजबूती से स्थापित कर दी कि विराट स्तर पर बनी साइंस फिक्शन फिल्में ही प्रभावशाली और यादगार होने का दम-खम रखती हैं.

लेकिन, 21वीं सदी की शुरुआत से ही कई छोटी साइंस फिक्शन इंडिपेंडेंट फिल्में केवल अपने मारक आइडिया, कंटेंट और विजन के दम पर इन विराट फिल्मों के समकक्ष खड़ी हो रही हैं. सीमित संसाधनों, सीमित लोकेशनों, और सबसे बड़ी बात कि न के बराबर स्पेशल इफेक्ट्स का उपयोग कर ये फिल्में कैरेक्टर डेवलपमेंट पर जोर दे रही हैं और इनकी कहानी की खासियत वीएफएक्स की जरूरत को ही नगण्य कर रही हैं. माइक्रो बजट वाली टाइम ट्रेवल फिल्म ‘प्राइमर’ (2004), ‘टाइमक्राइम्स’ (2007), ‘मून’ (2009), स्कारलेट जोहानसन की ‘अंडर द स्किन’ (2013), ‘द मैन फ्रॉम अर्थ’ (2007), ‘सेफ्टी नॉट गारंटिड’ (2012), ‘प्रीडेस्टिनेशन’ (2014) जैसी सीमित बजट की ब्रिलियंट इंडिपेंडेंट फिल्में विजुअली नयनाभिराम नहीं होने के बावजूद अपनी अलहदा कहानी और बुद्धिमत्ता से देखने वालों के होश उड़ा रही हैं!

‘कोहिरेंस’ (Coherence) इन्हीं बुद्धिमान साइंस फिक्शन फिल्मों में से एक कम प्रसिद्ध इंडी फिल्म है. 2013 में आई यह अमेरिकी फिल्म आयात हुईं बाकी विराट अमेरिकी साइंस फिक्शन फिल्मों के बीच बेहद कम हिंदुस्तानी दर्शकों तक पहुंच पाई. लेकिन अमेरिकी निर्देशक जेम्स वार्डबर्किट (James Ward Byrkit) ने अपनी इस डेब्यू फिल्म में साइंस फिक्शन वाली एक कहानी में हॉरर और थ्रिलर जॉनर के एलीमेंट्स समाहित किए हैं और दिमाग के पाये हिला देने वाली फिल्म बनाई है.

कहानी इतनी ही बताई जा सकती है कि एक धूमकेतु (मिलर्स कॉमेट) के पृथ्वी से होकर गुजरने वाली रात आठ दोस्त एक घर में साथ डिनर करने के लिए मिलते हैं, और जल्द ही अजीब-अजीब सर घुमाने वाले वाकये होने शुरू हो जाते हैं. डेढ घंटे की यह फिल्म शुरुआती 15 मिनट में ही अपने कलाकारों और उनके आपसी संबंधों को कहानी में स्थापित कर देती है, और इसके बाद आपको चौंकाने का बेहद लंबा सिलसिला शुरू करती है.

इसे देखते वक्त आपको एक पुरानी ब्रिटिश-ऑस्ट्रेलियन इंडी थ्रिलर फिल्म ‘ट्राइएंगल’ (2009) भी याद आ सकती है. बस यह फिल्म उसके अलहदा आइडिया को उम्दा तरीके से साइंस फिक्शन के दायरे में बांधकर अलग तरह से एक्सप्लोर करती है.

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‘कोहिरेंस’ के बारे में ज्यादा कुछ कहना घनघोर स्पॉइलर देना होगा. इसलिए इसकी कहानी पर बात करने की जगह इसकी एक दिलचस्प थीम और फिल्ममेकिंग के तौर-तरीकों पर तफ्सील से बात करते हैं.

एक बाहरी ऑब्जेक्ट (extraterrestrial object) के पृथ्वी के करीब से गुजरने या करीब आने पर इंसानों के बदलते व्यवहार की थीम को ‘कोहिरेंस’ ने खासे जहीन अंदाज में उकेरा है. कौन असली है कौन किसी और जगह का असली है, यह जानने में देखने वालों की समझ के पसीने निकल जाते हैं! एक धूमकेतु के पृथ्वी से होकर गुजरते वक्त आठ दोस्तों का व्यवहार वक्त के साथ धीरे-धीरे बदलता जाता है और आखिर ही में आप समझते हैं कि अगर इनका व्यवहार शुरू से सामान्य रहता तो उनके साथ वह सब होता ही नहीं जो आखिरकार इन्हें भुगतना पड़ा.

इस थीम को निर्देशक लार्स वॉन ट्रिया (Lars von Trier) ने भी ‘मेलनकोलिया’ (Melancholia, 2011) नामक बेहतरीन फिल्म में बड़ी कुशलता से एक्सप्लोर किया था. उस फिल्म में मेलनकोलिया नामक एक रहस्यमयी ग्रह पृथ्वी से टकराने वाला होता है और ऐसा होने से पहले पात्रों के व्यवहार में मनोवैज्ञानिक बदलाव आने शुरू हो जाते हैं.

अवसाद इस धीमी फिल्म की मुख्य थीम थी और नायिका उस अवसाद का उदास चेहरा जिसे कि लार्स वॉन ट्रिया जैसे दुर्लभ फिल्मकार ने कविता की खूबसूरती से परदे पर उकेरा था. ‘कोहिरेंस’ का अवसाद से तो कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन वह एक धूमकेतु के करीब से गुजरने की वजह से अपने पात्रों में आ रहे मनोवैज्ञानिक बदलाव को चित्रित करते वक्त इस मास्टरपीस की याद अवश्य दिलाती है.

‘कोहिरेंस’ को उसकी कम बजट की बंदिशों में नहीं बंधने वाली फिल्ममेकिंग के लिए भी सराहा जाता है. निर्देशक जेम्स वार्ड बर्किट ने पहले ‘पायरेट ऑफ द कैरेबियन’ फ्रेंचाइजी की शुरुआती तीन मशहूर फिल्मों में बतौर स्टोरी-बोर्ड आर्टिस्ट काम किया हुआ था, लेकिन जब वे अपनी पहली फीचर फिल्म निर्देशित करने निकले तो हॉलीवुड स्टूडियोज से उन्हें कोई मदद नहीं मिली.

आखिरकार उन्होंने अपने घर के अंदर ही फिल्म को बिना किसी स्क्रिप्ट के शूट करने की ठानी. आठ अंजान एक्टर इकट्ठा किए जो उनके दोस्त और पहचान वाले थे, किसी भी कलाकार को स्क्रिप्ट पूरी नहीं दी, नैचुरल एक्सप्रेशन निकलवाने की चाहत में किरदारों को दूसरे किरदारों के रिएक्शन नहीं बताए, और फिर बिना किसी क्रू की मदद लिए केवल दो कैमरों से अपनी माइंड बेंडिंग कहानी (यानी, दिमाग घुमा देने वाली!) को फिल्माया. ‘कोहिरेंस’ केवल पांच रातों में शूट हुई थी और केवल आठ हजार डॉलर में इसकी यह मुख्य शूटिंग पूरी हुई थी. यह आज के हिसाब से हमारे यहां के केवल पौने छह लाख रुपए होते हैं!

सिनेमेटोग्राफर के अलावा शूटिंग के वक्त निर्देशक ने ही दूसरा कैमरा भी संभाला, और साथ ही साथ कलाकारों को लगातार निर्देश भी देते रहे. कलाकारों को दृश्य रचने की पूरी स्वतंत्रता दी गई ताकि लगे कि पल-पल बदल रही परिस्थितयों से गुजरने वाले कुछ असली लोग ही आपस में बातचीत कर रहे हैं. कैमरे ने बस इन कलाकारों को टाइट क्लोजअप के साथ घर में फॉलो किया और इसीलिए फिल्म का कैमरा मूवमेंट इतना ज्यादा हिलता-डुलता हुआ नजर भी आता है (शैकी कैमरावर्क).

असली फिल्म लेकिन, एडीटिंग टेबल पर बनी – जैसा कि इस तरह शूट हुई फिल्मों के साथ अक्सर होता है. ‘कोहिरेंस’ की भी पांच रातों की शूटिंग में इकट्ठा हुई 24 घंटे की फुटेज से डेढ़ घंटे की एक फीचर फिल्म बनाने में चार महीने का लंबा एडीटिंग टाइम लगा. इस पोस्ट-प्रोडक्शन के खर्चे के लिए निर्देशक ने फिल्म की फुटेज अमीर लोगों को दिखा-दिखाकर अलग से पैसों का इंतजाम किया.

फिल्म ने विज्ञान के कुछ सिद्धांतों को भी कहानी में शामिल किया. लेखक-निर्देशक ने क्वांटम फिजिक्स की एक थ्योरी डीकोहिरेंस को लिया और उसका विलोम विचार तैयार कर उसे कहानी की मुख्य धुरी बनाया. टाइटल इसी विलोम नाम कोहिरेंस से आया जिसका एक मतलब होता है सबका साथ आना, या सारे यथार्थों का साथ घटित होना.

और, ऐसा कोहिरेंस जब फिल्म में घटित होता है तो देखने वाले के होश फाख्ता हो जाते हैं. फिल्म देखिए, आपके भी होंगे!

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