उत्तर भारत में एक कहावत है- ‘भय माता ने लिख दिए छठी रात के अंक, राइ घटे न तिल बढ़े रह-रह होत निसंग’. कहने का मतलब यह है कि जो चाहे कर लो, जैसी नींव पड़ेगी, इमारत वैसी ही बनेगी. जब भारत आज़ाद हो रहा था, तभी से जवाहरलाल नेहरू ने देश को चलाने वाले संस्थानों की इबारत लिखनी शुरू कर दी थी. उनमें से भारतीय सेना भी एक थी. कुछ मौके छोड़ दिए जाएं, जैसे कि मौजूदा, तो भारतीय सेना ग़ैर-राजनैतिक ही रही है. इसके पहले भारतीय जनरल थे कोडनडेरा मडप्पा करिअप्पा. वे फ़ौज का भारतीयकरण करने के लिए जाने जाते हैं. पर कुछ हवालों से ऐसा लगता है कि केएम करिअप्पा नेहरू की पहली पसंद नहीं थे.

मेजर जनरल वीके सिंह अपनी किताब ‘लीडरशिप इन द इंडियन आर्मी’ में लिखते हैं कि एक जनवरी 1948 को जब ब्रिटिश मूल के जनरल रॉय बूशे रिटायर हुए तो तीन सबसे वरिष्ठ अधिकारी थे- करिअप्पा, नाथू सिंह और राजेंद्र सिंहजी. नाथू सिंह करिअप्पा से लगभग ढाई साल छोटे थे और सेना में भी इतने ही साल कनिष्ठ. राजेन्द्र सिंहजी करिअप्पा से यूं तो नौकरी में सिर्फ़ एक साल ही जूनियर थे, पर उम्र में वे उम्र में करिअप्पा से छह महीने बड़े थे. तो इस लिहाज़ से मौका करिअप्पा को ही मिलाना चाहिए था.

पर मामला कुछ और ही था. 1946 में अंतरिम सरकार नाथू सिंह को यह पद देना चाहती थी. तत्कालीन रक्षा मंत्री बलदेव सिंह ने उनको सेनाध्यक्ष बनने की पुष्टि भी कर दी थी. तब ब्रिगेडियर रहे नाथू सिंह ने करिअप्पा के रहते इससे मना कर दिया था. अगला मौका तत्कालीन गुजरात राजपरिवार के राजेंद्र सिंहजी को दिया गया. उन्हें जंग का भी तजुर्बा था. विशिष्ट सेवा पदक पा चुके थे. उनका मिलिट्री रिकॉर्ड भी करिअप्पा से बेहतर था. पर राजेंद्र सिंहजी के मुताबिक़ करिअप्पा इस पोस्ट के बड़े हकदार थे, लिहाजा उन्होंने भी सेनाध्यक्ष बनने से मना कर दिया. इन दोनों वरिष्ठ अधिकारियों के मना करने के बाद करिअप्पा ही बचते थे.

आख़िर ऐसा क्या था कि जवाहरलाल नेहरू किप्पर (करिअप्पा का उपनाम) को यह मौका नहीं देना चाहते थे? दरअसल, केरल के कुर्ग से ताल्लुक रखने वाले एक सैनिक परिवार में जन्मे किप्पर बेबाक किस्म के जनरल थे और इसकी वजह से उनकी छवि कुछ और ही बन जाती थी. मिसाल के लिए, इंग्लैंड के सैंडहर्स्ट कॉलेज में सैनिक ट्रेनिंग के दौरान उन्होंने अंग्रेज़ अधिकारियों को हिंदुस्तानी सेना को हिंदुस्तानी बनाने का प्रस्ताव दिया था जिससे वह सक्षम बन सके. उन्होंने कहा कि सेना में भारतीय अफ़सर वरिष्ठ पदों तक नहीं जाएंगे तो फ़ौज कैसे सक्षम बनेगी. यह विचार अंग्रेजों को पसंद नहीं आया. उनके हिसाब से यह राजनीति से प्रेरित बात थी. इस पर करिअप्पा की खिंचाई कर दी गयी. उन दिनों ब्रिटिश और भारतीय सेना अधिकारियों की तनख्वाह और भत्तों में भी अंतर था.

इसी तरह एक बार लार्ड माउंटबेटन से मुलाकात में केएम करिअप्पा ने कहा कि भारतीय सेना में वरिष्ठ अधिकारियों की कमी के चलते फ़ौज का विभाजन उचित नहीं है और दोनों फ़ौजों को मज़बूत होने में कम-से-कम पांच साल का वक़्त लगेगा. इस बात ने सभी को हैरानी में डाल दिया. उन्होंने नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना से अलग-अलग मुलाक़ातों में कहा कि सेना के विभाजन से दोनों मुल्कों की सेनाएं कमज़ोर हो जायेंगी और ऐसे में दुश्मन से लड़ने में दिक्कत आ सकती है. नेहरू ने इस बात पर चुप्पी ओढ़े रखी और जिन्ना ने हंसते हुए कहा था कि अगर कभी भारत पर हमला हुआ तो पाकिस्तानी सेना उसकी मदद को आएगी! बहुत संभव है कि इन कारणों के चलते वे नेहरू की पहली पसंद नहीं रहे हों.

केएम करिअप्पा और जवाहरलाल नेहरू के बीच रिश्ते खट्टे-मीठे थे. सेनाध्यक्ष बनने के कुछ समय बाद ही उन्होंने सेना के अलावा आर्थिक और राजनैतिक मसलों पर राय देना शुरू कर दिया था. इससे नेहरू सरकार की किरकिरी होती थी. कई कैबिनेट मंत्रियों को किप्पर से भय होने लग गया कि कहीं वे कोई राजनैतिक शक्ति न बन जाएं. नेहरू ने उन्हें पत्र लिखकर सेना के मुद्दों पर ही बात करने की सलाह दी. इसका फ़ौरी तौर पर असर हुआ और जब किप्पर 1953 में रिटायर हुए तो विदाई भाषण में उन्होंने फ़ौज को ग़ैर-राजनैतिक बने रहने की सलाह दी.

दरअसल, नेहरू लोकतांत्रिक शक्तियों में विश्वास रखते थे. मिसाल के तौर पर तीन मूर्ति भवन की रिहाइश के मामले को देखा जा सकता है. इसका निर्माण ब्रिटिश इंडिया के सेनाध्यक्ष के निवास के उद्देश्य से किया गया था. तब इसे ‘फ्लैगस्टाफ़ हाउस’ कहा जाता था. देश के आख़िरी वायसराय और पहले गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन को गांधी ने वायसराय भवन के बजाए कहीं और रहने की सलाह दी थी. जेबी कृपलानी की किताब ‘पॉलिटिकल थिंकर्स ऑफ़ मॉडर्न इंडिया’ में ज़िक्र है कि गांधी की सलाह पर विचार करते हुए माउंटबेटन ने नेहरू को सुझाया कि वे फ्लैगस्टाफ़ हाउस को अपना निवास स्थान बनाने पर विचार रहे हैं. नेहरू ने यह कहकर मना कर दिया कि वे (माउंटबेटन) कुछ ही महीनों के लिए देश में रहेंगे और इतने कम समय के लिए निवास बदलना बेहतर सुझाव नहीं है. बाद में नेहरू इस भवन में रहे और यह तीन मूर्ति भवन कहलाया. पाकिस्तान के भौतिकशास्त्री परवेज़ हुडबॉय ने मिलिट्री पत्रकारिता के स्तंभ कहे जाने वाले स्टीवन विलकिंसन के साथ एक इंटरव्यू में इस बारे में बात की थी. उनके मुताबिक नेहरू इससे यह संकेत देना चाहते थे कि भारत में संसद सेनाध्यक्ष से ऊपर है.

रिटायरमेंट के बाद भी केएम करिअप्पा के राजनैतिक शक्ति बनने की संभावना को देखते हुए नेहरू ने उन्हें ऑस्ट्रेलिया का उच्चायुक्त (हाई-कमिश्नर) बनाकर भेज दिया ताकि भारतीय उन्हें भूल जाएं. वे 1956 में वापस हिंदुस्तान आ गए और जाने-अनजाने हलचल पैदा करने लग गए. 1958 में पाकिस्तान के जनरल अयूब खान ने एक और जनरल इस्कंदर मिर्ज़ा के साथ तख़्ता पलटकर फ़ौजी सरकार बनाई तो करिअप्पा ने पाकिस्तानी जनरलों के कदम की सहराना करते हुए कहा कि दो जांबाज़ अफसरों से अपने देश की बर्बादी नहीं देखी गयी.

वीके सिंह की मानें तो केएम करिअप्पा ने कई बार जवाहर लाल नेहरू से कहा कि चीन की तरफ़ ध्यान देने की ज़रूरत है. नेहरू ने इसके उलट उनसे कहा कि वे कश्मीर और पाकिस्तान पर ध्यान दें. 1962 के हादसे के बाद करिअप्पा ने कुबूल किया कि उनसे ग़लती हो गयी कि वे नेहरू को समझा नहीं पाए, वरना यह हादसा नहीं होता. 1962 की लड़ाई में रिटायर्ड जनरल करिअप्पा ने सरकार को ख़त लिखकर बतौर सैनिक अपनी सेवाएं देने का प्रस्ताव भी दिया था.

किप्पर एकीकृत भारत की फ़ौज के कमांडर थे. 1965 के भारत-पाक युद्ध के फ़ौरन बाद वे बॉर्डर पर गए और राजपूत यूनिट के जवानों से मिले. अपने जनरल और कभी यूनिट के कमांडर को देखकर सैनिकों ने यूनिट का नारा इतनी ज़ोर से लगाया कि पाकिस्तान के अफ़सर ने दोबारा लड़ाई छिड़ने की आशंका से मोर्चा संभाल लिया. मामला खुलने पर उसने भारत के अफ़सर से अपील करके कहा कि उसकी टुकड़ी एक बार महान सेनानायक करिअप्पा से मिलना चाहती है. किप्पर उनसे बड़ी गर्मजोशी से मिले.

1965 की ही लड़ाई में केएम करिअप्पा के पायलट बेटे को पाकिस्तानी सेना ने बंदी बना लिया था. जब पाकिस्तानी जनरल को मालूम हुआ कि वह करिअप्पा का बेटा है तो उसने उन्हें ख़त लिखा. इसमें उनके बेटे की कुशलता और देखभाल करने का वादा किया गया था. इस पर करिअप्पा ने जवाब दिया ‘सिर्फ़ मेरा बेटा ही क्यों? बाकी सारे युद्धबंदी भी मेरे बेटे हैं. सभी का ध्यान रखना.’

1983 में जब केएम करिअप्पा फ़ील्ड मार्शल बनाये गये तब भी विवाद हुआ. कहा गया कि फ़ील्ड मार्शल कभी रिटायर नहीं होता और चूंकि करिअप्पा रिटायर हो चुके हैं तो वे इस सम्मान के हक़दार नहीं हो सकते. लेकिन भारत सरकार ने नियमों को दरकिनार कर उन्हें इस सम्मान से नवाज़ा.

पर यह बड़ी हैरानी की बात है कि भारत सरकार ने एक भी सैनिक को भारत रत्न सम्मान से नहीं नवाजा है. क्या यह सम्मान सिर्फ़ राजनेताओं तक ही सिमट कर रह जाने के लिए बना है? क्या देश के एक भी सैनिक ने ऐसा कोई महान कार्य नहीं किया जो इसका हक़दार हो?