ब्रज के इलाकों में घूम आइये. मंदिरों में, गलियों में, घरों में बड़े-बूढ़े जवान, बच्चे और फ़कीर कृष्ण के गीत गाते मिल जाएंगे. ये किसने बनाए? कब बनाए? पहले इन बातों को जानना ज़रूरी नहीं था. क्योंकि फ़र्क नहीं पड़ता था, अब पड़ता है. तो साहिबे-मसनद, जैसा कि होता ही है इन गीतों और कविताओं में कई रचनाएं ऐसी हैं जो एक मुसलमान शायर की जुबान से निकली हैं. जिसका नाम है नज़ीर अकबराबादी. अच्छा अगर बता दिया जाए तो क्या उन गीतों को हटवा देंगे?

जो नज़ीर अकबराबादी को नहीं जानते, उन्हें बताने का फ़र्ज़ बनता है कि वे अमीर ख़ुसरो, मलिक मुहम्मद जायसी या रसखान की परंपरा वाले हैं. मिली-जुली तहज़ीब के सबसे मुकम्मल हस्ताक्षरों में से एक भी. हर मौज़ूं पर, हर छोटी-बड़ी बात पर लिखने वाले थे नज़ीर अकबराबादी. ‘बंजारानामा’ और ‘रोटियां’ जैसी कालजयी नज्में रचने वाले थे नज़ीर अकबराबादी.

नज़ीर से जुड़ी बुनियादी बातों की सच्चाई क्या है?

नज़ीर अकबराबादी का असली नाम वली मुहम्मद और उपनाम ‘नज़ीर’ था. ‘नज़ीर’ के साथ उन्होंने ‘अकबराबादी’ जोड़ लिया. उनकी जन्मतिथि को लेकर विद्वानों में मतभेद है. लेकिन अधिकतर 1735 में उनका जन्म हुआ मानते हैं. उनके क़लाम पर पहले शोधकर्ता प्रोफ़ेसर अब्दुल गफ़ूर शहवाज़ के समय तक नज़ीर की नवासी विलायती बेगम जिंदा थीं. उन्होंने ‘ज़िंदगानी बेनज़ीर’ के लिए काफ़ी कुछ सामग्री दी. पर जन्म का दिन और महीना उन्हें भी नहीं मालूम था. विकीपीडिया भी ख़ामोश है. पर आगरा के लोग बताते हैं कि उनका जन्म 1735 में बसंत पंचमी को हुआ था और हर साल उस दिन को उनकी मज़ार पर लोग फूल चढ़ाने आते हैं. गूगल में उस साल का कैलेंडर खंगालें तो तारीख मिलती है 29 जनवरी, 1735.

अब बात थी जन्मस्थान की. सो यहां भी स्थिति साफ़ नहीं. लोग बंटे हुए हैं. प्रोफेसर शहवाज़, मखमूर अकबराबादी, फ़रतुल्लाह बेग और कई अन्य विद्वान दिल्ली को नज़ीर का पैदाइशी शहर मानते हैं. ‘कुल्लियाते नज़ीर’ लिखने वाले मौलाना अब्दुलवारी आसी एक साक्षात्कार में कहते हैं, ‘नज़ीर शहर देहली (दिल्ली) में 1735 में पैदा हुए. बड़े पुरआशोब (उथल-पुथल से भरे) ज़माने में होश संभाला. 1748 से लेकर 1764 तक दिल्ली पर अहमद शाह अब्दाली के तीन हमले हुए थे. इसलिए नज़ीर अपनी मां और नानी के साथ 22-23 साल की उम्र में तर्के-वतन ((छोड़ना) पर मजबूर हुए और आगरा में मिठाई पुल के पास रहने लगे.’

दूसरी तरफ़ शेफ़्ता, डॉ गुरमुख राम टंडन और मैकश अकबराबादी जैसे कुछ विद्धान नज़ीर की पैदाइश आगरा में मानते हैं. इसके पीछे उनकी सोच है कि नज़ीर की मां आगरा के किलेदार की बेटी थीं और फिर उनका तख़ल्लुस ‘अकबराबादी’ (आगरा का दूसरा नाम) था. पर प्रोफ़ेसर शहबाज़ के शोध के आधार पर दिल्ली को उनका जन्मस्थान माना जाता है. यह बात अलग है कि नज़ीर को आगरा से बेइंतिहा मुहब्बत थी. उन्होंने लिखा भी है:

‘आशिक कहो, असीर कहो, आगरे का है,

मुल्ला कहो, दबीर (लेखक) कहो, आगरे का है

मुफ़लिस कहो, फ़क़ीर कहो, आगरे का है

शायर कहो, नज़ीर कहो, आगरे का है.’

उनकी मौत को लेकर भी एकराय नहीं है. बकौल प्रोफेसर शहबाज़ जब नज़ीर मरे तो उनकी उम्र नवासी की थी. ख़ुद नज़ीर का अपने पर शेर है.

‘ए यार सौ बरस की हुई अपनी उम्र आकर

और झुर्रियां पड़ी हैं सारे बदन के ऊपर’.

पहले 90-95 की उम्र के आदमी को 100 बरस का मान लिया जाता था. मिर्ज़ा फ़रतुल्लाह बेग ने नज़ीर की मृत्यु का दिन 26 सफर 1246 हिजरी यानी एक अगस्त 1830 माना है. वहीं इंतज़ाम उल्लाह शहाबी इसे 16 अगस्त 1830 मानते हैं. ‘नज़ीर ग्रंथावली’ के संपादक डॉ नज़ीर मुहम्मद लिखते हैं, ‘1827 में उन्हें लकवा हुआ और तीन साल बाद एक अगस्त 1830 को इनका इंतकाल हो गया. जनाज़े की नमाज़ शिया और सुन्नियों ने अपने-अपने ढंग से पढ़ी. जनाज़े की चादर हिंदू भी ले गए. घर के पेड़ों की ही छाया में नज़ीर को दफ़नाकर मज़ार बना दिया गया.’

गंगा जमुना तहज़ीब के दस्तखत

उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ‘नज़ीर ग्रंथावली’ में ज़िक्र है कि नज़ीर सरल स्वभाव के थे. जब घर से निकलते तो अक्सर लोग रास्ता रोककर खड़े हो जाते. उनकी घोड़ी ऐसी सध गयी थी कि जहां लोगों ने सलाम किया वहीं खड़ी हो जाती. सब कहते मियां पहले कविता सुनाएं, तब आगे जाने देंगे. नज़ीर वहीं कविता बनाते और घंटों सुनाते. फेरी लगाकर माल बेचने वाले उनसे कविताएं लिखवा ले जाते और उन्हें गली-कूचों में गा-गाकर अपना माल बेचते. ककड़ी बेचने वाला पीछे पड़ा तो ‘आगरे की ककड़ी’ नामक रचना दी.

‘क्या ख़ूब नर्मोनाज़ुक इस आगरे की ककड़ी.

और जिसमें ख़ासकर फिर, इस्कंद की ककड़ी.’

भीख मांगने वाले जोगी ने निवेदन किया तो उन्होंने ‘कन्हैया का बालपन’ कविता कही और वह कड़ा बजाकर उसे गा-गाकर भीख मांगने लगा

‘क्या-क्या कहूं किशन कन्हैया का बालपन

ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन.’

नज़ीर ने कृष्ण चरित के साथ रासलीला का वर्णन किया है, तो कृष्ण के बड़े भाई बलदेव पर ‘बालदेव जी का मेला’ कविता लिखी. और तो और ‘तारीफ़ भैरों की’ भी लिखी है:

‘तेरी सरन गही है कर तू निहाल भैरों

ए पर्तपाल देवत मदमस्त काल भैरों.’

होली को राष्ट्रीय त्यौहार मानने वाले नज़ीर ने इस पर्व पर 20 से अधिक कविताएं लिखी हैं. आगरा शहर की हर गली में होली किस तरह से खेली जाती है इसका वर्णन उन्होंने किया है. इसके अलावा, दिवाली, राखी, बसंत, कंस का मेला, लाल जगधर का मेला जैसे पर्वों पर भी उन्होंने जमकर लिखा. दुर्गा की आरती, हरी का स्मरण और भगवान् के अवतारों का जगह-जगह बयान है उनकी कविताओं में. गुरु नानक देव पर उनकी कविता प्रसिद्ध है. पर जब नज़ीर अकबराबादी कृष्ण की तारीफ़ में लिखते हैं तो उन्हें सबका ख़ुदा बताते हैं:

‘तू सबका ख़ुदा, सब तुझ पे फ़िदा, अल्ला हो ग़नी, अल्ला हो ग़नी

हे कृष्ण कन्हैया, नंद लला, अल्ला हो ग़नी, अल्ला हो ग़नी

तालिब है तेरी रहमत का, बन्दए नाचीज़ नज़ीर तेरा

तू बहरे करम है नंदलला, ऐ सल्ले अला, अल्ला हो ग़नी, अल्ला हो ग़नी.’

एक कविता में नज़ीर कृष्ण पर लिखते हैं:

‘यह लीला है उस नंदललन की, मनमोहन जसुमत छैया की

रख ध्यान सुनो, दंडौत करो, जय बोलो किशन कन्हैया की.’

नज़ीर रास्ते चलते हुए नज्में कहा करते थे. न कहीं लिखा, न जमा किया. हां, लोग, जिनमें भिखारी और फेरी वालों से लेकर कोठे वालियां तक थीं, उनके कलामों को दिल में संजोकर रखते थे और आज भी उन्हें ही गाते हैं

जनकवि नज़ीर

नज़ीर अकबराबादी की ज़्यादातर शायरी उर्दू में है. अट्ठारहवीं सदी का वह ऐसा दौर था जब मुल्क में फ़ारसी की जगह उर्दू ले रही थी. ऐसा इसलिए कि फ़ारस यानी ईरान के राजा नादिर शाह के आक्रमण (सन 1739) ने हिंदुस्तान को हिलाकर रख दिया था. लोग जुबां से भी नफ़रत करने लगे थे. तब मजहर, सौदा, दर्द और मीर तकी मीर जैसे नाम-चीन शायर हुए जिन्होंने उर्दू में क़लाम पढ़े. बाद में फ़ारसी यूं बेगानी हुई कि आने वाले वक्त में ग़ालिब ने भी इसे छोड़कर उर्दू अपनाई.

प्रोफेसर शहबाज़ लिखते हैं कि जब नज़ीर दिल्ली से आगरा आये तो उस वक़्त मीर तकी मीर की धाक थी. किसी मुशायरे में नज़ीर ने मीर की मौजूदगी में उनकी ही तर्ज़ पर एक ग़ज़ल कही जिसका मिसरा कुछ यूं था:

‘नज़र पड़ा एक बुत परीवश निराली सजधज नयी अदा का

जो उम्र देखी तो दस बरस की ये कहर आफत ग़ज़ब ख़ुदा का.’

हालंकि अब 10 बरस की बच्ची के लिए कोई ऐसी बात कहे तो लंपट कहलायेगा पर वह दौर अलग था. कम उम्र की बच्चियों की शादी होना तब आम बात थी. खैर, जब मीर ने यह ग़ज़ल सुनी, तो उन्होंने नज़ीर को अपने पास बुलाया और शाबाशी दी. इस वाकये के बाद नज़ीर आगरा में बतौर शायर प्रसिद्ध हो गए.

शोहरत तो मिली पर पेट से गीला कपड़ा बांधकर सोने के हालात रहे. उस दौर में शाहों और नवाबों की शान में लिखकर शायरों के गुज़ारे होते थे. नज़ीर ने ऐसा कोई काम नहीं किया. जो कुछ भी लिखा जनता के लिए लिखा. रियाया की बात कही. बताते हैं कि लखनऊ के नवाब सआदत अली खां का बुलावा और पैसे भी उन्होंने ने यह कहकर ठुकरा दिए थे कि वे महलों में नहीं झोपडी में खुश हैं. नज़ीर ने समाज पर लिखा, उसके दर्द पर लिखा. मसलन ‘आदमी’ में वे कहते हैं:

‘यां आदमी पे जान वारे है आदमी

और आदमी पे तेग़ (तलवार) को मारे है आदमी

पगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमी

चिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमी

और सुन के दौड़ता है सो है वो भी आदमी’

रोटी पर भी उनकी कई नज्में हैं तो कबूतर, रीछ (भालू), गिलहरी और बुलबुल भी उनके विषय रहे.

अब कोई ऐसे विषयों पर शायरी करेगा तो ‘चलताऊ शायर’ क़रार दिया जायेगा. ऐसा ही हुआ. उन्होंने मीर की तरह इश्क़ और दर्द पर नहीं लिखा. ग़ालिब की तरह मुहब्बत, शराब और ज़िंदगी के फ़लसफ़े की भी बात नहीं की. पर यह भी तय है कि आत्मसम्मान उनमें ग़ालिब से कम नहीं था. और ग़ालिब के जितना न सही पर उनकी सूफ़ियाना नज़्में जैसे ‘बंजारानामा’ या ‘दुनिया धोखे की टट्टी है’ या ‘मौत की फ़िलासफ़ी’ इस जीवन को निर्लिप्त होकर देखने की बात करती हैं. कोई नया फ़लसफ़ा उन्होंने ईजाद नहीं किया था. हालांकि अली सरदार जाफ़री के मुताबिक़ ग़ालिब की शायरी में भी नया दृष्टिकोण नहीं है. लेकिन नज़ीर की शायरी आज भी ‘इलीट’ वर्ग को नहीं छूती इसलिए ढाई सदी से हाशिये पर रख छोड़ी गयी है.

ग़ालिब से नज़ीर का क्या राब्ता था?

अब जब बात नज़ीर (1735-1830) और ग़ालिब(1797-1869) ही की हो रही है तो कुछ बातें और हो जाएं. दोनों दिग्गजों के बीच ज़बरदस्त इतेफ़ाक हैं. दिल्ली में जन्मे नज़ीर आगरा बस गए थे. आगरा में पैदा हुए ग़ालिब दिल्ली में जमे रहे. मीर तकी मीर दोनों से वाबस्ता (जुड़े) थे. दोनों ही के पिता सिपहसालार थे. ग़ालिब के वालिद को अलवर के राजा के यहां 60 घोड़ों की रिसालदारी मिली हुई थी. बताते हैं कि नज़ीर के वालिद भी कुछ समय के लिए अलवर के किसी दूसरे राजा के यहां भर्ती रहे.

आख़िरी बात पर आपमें से बहुत चौंक जाएंगे. मिर्ज़ा ग़ालिब की शुरुआती तालीम नज़ीर अकबराबादी की शागिर्दी में हुई थी! इस बात न ज़िक्र न तो कहीं ग़ालिब ने किया है और न उन पर लिखने वाले बाद वक्तों के लेखकों ने. बतौर संपादक अली सरदार जाफ़री भी ‘दीवाने-ग़ालिब’ में इस बात का ज़िक्र नहीं करते. पर प्रोफ़ेसर शहबाज़ के हवाले से ‘नज़ीर ग्रंथावली में ज़िक्र है, ‘उस समय आगरा में ख़लीफा मुअज़्ज्म और मियां नज़ीर दो ही-मुमताज़ मुल्लाओं में थे. ग़ालिब को इन्हीं दो की तरफ़ जाना पड़ा. चर्चित लेखक कुतुबुद्दीन बातिन ने भी अपनी किताब गुलिस्ताने बेखिज़ां में मिर्ज़ा ग़ालिब को नज़ीर का चेला बताया है’.

कुल मिलाकर नज़ीर अकबराबादी उस सदी के इकलौते शायर लगते हैं जो आम समाज और निचले तबके के लोगों की बात करते हैं. वे हिंदी आधुनिक काल के शुरुआती कवि भी कहे जा सकते हैं. नज़ीर उस दौर के इकलौते नुमाइंदे लगते हैं जो ‘राग दरबारी’ नहीं गाते बल्कि कदमताल करते हुए किसी भिखारी, साधु, ठेले वाले या किसी बच्चे के साथ अपने गीत गाते हुए नज़र आते हैं. ये लोग शायद थक जायें पर नज़ीर अगले मोड़ पर खड़े हुए किसी हारे हुए के साथ नज़र आने को बेक़रार हैं.

लेख को नज़ीर की उन लाइनों से खत्म करते हैं जिनका आखिरी हिस्सा सावन में समूचे उत्तर भारत में गूंजता है.

जब आसा तिश्ना दूर हुई, और आई गत सन्तोख भरी।
सब चैन हुए आनन्द हुए, बम शंकर बोलो हरी हरी